जोहार लाइव ब्यूरो
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने आज डिजिटल अरेस्ट से जुड़े अपराधों के आरोपियों को लेकर कड़ा रुख अपनाया. मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अगर कानून में इसकी गुंजाइश है, तो बुजुर्गों और सेवानिवृत्त लोगों को निशाना बनाने वाले ऐसे ‘निर्दयी अपराधियों’ को मुकदमे की सुनवाई पूरी होने से पहले ही सजा देने का प्रावधान अपनाया जाना चाहिए.
गुरूवार 29 अक्टूबर को डिजिटल अरेस्ट से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने टिप्पणी की, “अगर हमें मौका दिया जाए, तो हम किसी भी अदालत को डिजिटल अरेस्ट के आरोपी को जमानत पर रिहा करने की अनुमति नहीं देंगे. आप मामलों को एक जगह समेकित करने की बात कर रहे हैं. मौका मिला, तो हम जमानत के आदेश को रद्द कर देंगे. अगर कानून में मुकदमे से पहले ही उन्हें वास्तव में दंडित करने की कोई गुंजाइश है, तो उसे भी अपनाया जाना चाहिए.”
उन्होंने कहा, “वे जिस तरह के अपराध कर रहे हैं, वह वरिष्ठ नागरिकों और सेवानिवृत्त लोगों के खिलाफ किया जाने वाला सबसे नया अपराध है. इन निर्दयी अपराधियों के निशाने पर ऐसे लोग हैं और उनसे सबसे सख्त तरीके से निपटा जाना चाहिए. जबरन वसूली तो सबसे आसान तरीका है. प्रथम दृष्टया यह डिजिटल डकैती है.”
जांच के लिए क्षेत्राधिकार के सवाल पर न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने भी टिप्पणी की कि अदालत पीड़ित के साथ हुई घटना के स्थान को ध्यान में रखती है, न कि उस स्थान को जिसे आरोपी अपनी सुविधा के अनुसार चुनता है.
न्यायमूर्ति बागची ने कहा, “हम नहीं मानते कि मामलों को एक जगह समेकित करने का आपका अधिकार पीड़ितों या जांच एजेंसियों की परेशानियों से ऊपर है. सुविधा किसकी देखी जानी चाहिए? क्या पूरे देश के पीड़ितों को सिर्फ इसलिए दिल्ली बुला लिया जाए कि आपका कहना है कि इस संगठित गतिविधि में बड़े लोगों के प्रभाव में आकर आप भी किसी तरह ठगी के शिकार हुए?”
सीजेआई सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ देशभर में दर्ज उन एफआईआर को एक साथ जोड़ने की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जो डिजिटल अरेस्ट समेत कथित साइबर अपराधों से संबंधित थीं.
पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता दिल्ली में दर्ज मामलों को एक साथ जोड़ने के लिए दिल्ली हाईकोर्ट का रुख कर सकता है. याचिकाकर्ता का दावा था कि दिल्ली के सभी मामले मंदिर मार्ग थाने की पुलिस जांच रही है.
याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि एक खाते में 80 लाख रुपये और दूसरे खाते में 1.2 करोड़ रुपये से संबंधित आरोप उसके खिलाफ हैं. उसने दलील दी कि मामले में आरोपपत्र दाखिल किया जा चुका है और एक ही अपराध की जांच दो अलग-अलग एजेंसियां कर रही हैं. उसने यह भी कहा कि उसके बैंक खाते का इस्तेमाल ‘म्यूल अकाउंट’ यानी ठगी की रकम प्राप्त करने और आगे भेजने वाले खाते के रूप में किया गया, जिसकी जानकारी उसे नहीं थी. उसके मुताबिक, वह खुद भी पीड़ित था और उसने शिकायत दर्ज कराई थी.
इस पर न्यायमूर्ति बागची ने टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता की कंपनी आर्थिक संकट से गुजर रही थी और उसने अपने खातों का इस्तेमाल डिजिटल अरेस्ट से जुड़े अपराधों की रकम प्राप्त करने के लिए होने दिया. याचिकाकर्ता ने बचाव में कहा कि जैसे ही उसे खाते के दुरुपयोग की जानकारी मिली, उसने साइबर अपराध अधिकारियों के पास शिकायत दर्ज करा दी. हालांकि, पीठ उसकी दलीलों से संतुष्ट नहीं हुई. अंततः याचिकाकर्ता की याचिका वापस लेने की अनुमति देते हुए खारिज कर दी गई.
डिजिटल अरेस्ट के मामलों पर सुप्रीम कोर्ट पहले भी जता चुका है चिंता
गौरतलब है कि अक्टूबर 2025 में सीजेआई सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने डिजिटल अरेस्ट के बढ़ते मामलों पर स्वतः संज्ञान लिया था. इन मामलों में ठग खुद को पुलिस, जांच एजेंसियों या न्यायिक अधिकारियों के रूप में पेश कर लोगों से पैसे वसूलते हैं. खास तौर पर वरिष्ठ नागरिकों को निशाना बनाया जाता है.
यह कदम अंबाला की 73 वर्षीय महिला की शिकायत के बाद उठाया गया था. महिला ने आरोप लगाया था कि ठगों ने सुप्रीम कोर्ट के फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल कर उससे पैसे ऐंठे.
इस साल अप्रैल में भी सीजेआई ने इस बात पर चिंता जताई थी कि पढ़े-लिखे लोग भी डिजिटल अरेस्ट के जाल में फंस रहे हैं. उन्होंने एक ऐसी महिला का मामला बताया था, जिसने कथित तौर पर इस तरह की ठगी में अपनी सेवानिवृत्ति के बाद की पूरी बचत गंवा दी थी.
वहीं, अगस्त में सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय रिजर्व बैंक से बैंकों के लिए मानक संचालन प्रक्रिया तैयार करने को कहा था. इसमें साइबर ठगी से जुड़े खातों से अस्थायी रूप से पैसे निकालने पर रोक लगाने, शिकायतों के निपटारे और ठगी गई रकम वापस दिलाने की व्यवस्था जैसे उपाय शामिल करने को कहा गया था.
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