जोहार लाइव ब्यूरो
रांची: हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे अनिल शर्मा की समयपूर्व रिहाई का रास्ता झारखंड हाईकोर्ट के एक अहम फैसले से फिर खुल गया है. हाईकोर्ट ने राज्य सजा पुनरीक्षण बोर्ड (State Sentence Review Board) के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें अनिल शर्मा की समयपूर्व रिहाई की मांग खारिज कर दी गई थी. अदालत ने कहा कि बोर्ड ने रिहाई की अर्जी खारिज करते समय पुराने आरोपों को ही आधार बनाया और बंदी के मौजूदा आचरण, सुधार की संभावना तथा समाज में दोबारा अपराध करने की आशंका जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं पर गंभीरता से विचार नहीं किया.
जस्टिस रंगोन मुखोपाध्याय की अदालत ने 13 अक्टूबर 2026 को यह फैसला सुनाया. कोर्ट ने राज्य सजा पुनरीक्षण बोर्ड को निर्देश दिया कि वह अनिल शर्मा की समयपूर्व रिहाई के मामले पर दोबारा विचार करे और सभी प्रासंगिक पहलुओं का विश्लेषण करते हुए विस्तृत एवं तर्कपूर्ण आदेश पारित करे. हालांकि, हाईकोर्ट ने अनिल शर्मा को सीधे रिहा करने का आदेश नहीं दिया है.
26 साल वास्तविक हिरासत, 29 साल की सजा में छूट जोड़कर अवधि
अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि अनिल शर्मा 26 साल की वास्तविक हिरासत पूरी कर चुके हैं. रिमिशन यानी सजा में मिली छूट को जोड़ने पर उनकी हिरासत की अवधि 29 साल हो चुकी है. इसके बावजूद राज्य सजा पुनरीक्षण बोर्ड कई बार उनकी समयपूर्व रिहाई की मांग खारिज कर चुका है.
बोर्ड ने अपने आदेशों में कहा था कि अनिल शर्मा ने जेल के भीतर एक अन्य कैदी की हत्या की थी. उनकी रिहाई से गैंगवार होने और समाज में शांति एवं कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका है. बोर्ड ने यह भी उल्लेख किया था कि वह पहले न्यायिक हिरासत से फरार हो चुके हैं.
हाईकोर्ट ने पाया कि बोर्ड ने अलग-अलग वर्षों में लगभग एक जैसे कारणों का इस्तेमाल करते हुए रिहाई की मांग खारिज की. आदेशों में संबंधित अधिकारियों की रिपोर्ट का उल्लेख तो किया गया, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया कि उन रिपोर्टों में क्या निष्कर्ष निकाले गए और रिहाई से गैंगवार की आशंका किस आधार पर बनी हुई है.
जेल में हत्या के मामले में मिली थी उम्रकैद
अनिल शर्मा के खिलाफ वर्ष 1999 में रांची के लोअर बाजार थाना में केस दर्ज हुआ था. आरोप था कि बिरसा मुंडा केंद्रीय कारागार में बंद रहने के दौरान उन्होंने अन्य आरोपियों के साथ मिलकर कैदी सुधीर सिंह उर्फ भोमा पर हमला किया था, जिससे उसकी मौत हो गई थी.
इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने 22 मार्च 2002 को अनिल शर्मा को भारतीय दंड संहिता की धारा 302/34 और 307/34 के तहत दोषी ठहराते हुए मृत्युदंड की सजा सुनाई थी. बाद में झारखंड हाईकोर्ट ने 29 नवंबर 2002 को दोषसिद्धि बरकरार रखी, लेकिन मृत्युदंड को उम्रकैद में बदल दिया. सुप्रीम कोर्ट ने 30 अप्रैल 2004 को उनकी अपील खारिज कर दी थी.
अनिल शर्मा की समयपूर्व रिहाई का मामला पहले भी कई बार राज्य सजा पुनरीक्षण बोर्ड के सामने आया. वर्ष 2018 में उनकी अर्जी खारिज होने के बाद उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. अदालत ने 19 अक्टूबर 2022 को मामले पर दोबारा विचार करने का निर्देश दिया. इसके बाद भी बोर्ड ने अलग-अलग मौकों पर उनकी रिहाई की मांग अस्वीकार कर दी.
प्रोबेशन अधिकारी की रिपोर्ट में क्या कहा गया?
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में प्रोबेशन अधिकारी की 18 सितंबर 2024 की रिपोर्ट का विशेष रूप से उल्लेख किया. रिपोर्ट के अनुसार, अनिल शर्मा की उम्र 63 वर्ष थी और वह कई बीमारियों से पीड़ित थे. रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि उनकी ओर से दोबारा अपराध किए जाने की आशंका काफी कम हो गई है.
प्रोबेशन अधिकारी ने बताया कि जेल में अनिल शर्मा का व्यवहार अच्छा रहा है. उन्हें कई बार पैरोल दी गई, लेकिन उनके आचरण को संतोषजनक पाया गया. वह जेल में चलने वाली सुधारात्मक गतिविधियों में भी उत्साह से भाग लेते हैं.
रिपोर्ट में उनके परिवार की सामाजिक और आर्थिक स्थिति का भी उल्लेख था. उनके परिवार के सदस्य कारोबार करते हैं और दो होटल चलाते हैं. पहले की रिपोर्टों में भी उनकी रिहाई के खिलाफ कोई स्पष्ट प्रतिकूल निष्कर्ष सामने नहीं आया था.
अदालत ने सवाल उठाया कि जब प्रोबेशन अधिकारी की रिपोर्ट में सुधार और दोबारा अपराध की कम आशंका का उल्लेख है, तो बोर्ड ने इन तथ्यों पर विचार किए बिना गैंगवार और सार्वजनिक शांति भंग होने की आशंका को बार-बार रिहाई खारिज करने का आधार कैसे बनाया.
अपराध की गंभीरता ही रिहाई रोकने का आधार नहीं
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले रोहित चतुर्वेदी बनाम उत्तराखंड राज्य का भी उल्लेख किया. अदालत ने कहा कि समयपूर्व रिहाई पर विचार करते समय केवल इस बात तक सीमित नहीं रहा जा सकता कि अपराध कितना गंभीर या जघन्य था. अपराध की गंभीरता को सजा सुनाते समय पहले ही ध्यान में रखा जा चुका होता है.
रिहाई के समय बंदी के वर्तमान व्यवहार, जेल में उसके सुधार, दोबारा अपराध करने की संभावना और समाज में पुनर्वास की संभावनाओं का आकलन जरूरी है. इसके साथ ही समाज की सुरक्षा और पीड़ित पक्ष से जुड़े प्रासंगिक पहलुओं को भी संतुलित तरीके से देखना होगा.
अदालत ने कहा कि सजा का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि अपराधी में सुधार लाना और उसे समाज में दोबारा शामिल होने का अवसर देना भी है. इसलिए समयपूर्व रिहाई के मामले में अधिकारियों को उपलब्ध सभी तथ्यों पर निष्पक्ष और तार्किक ढंग से विचार करना चाहिए.
अब नए सिरे से होगा रिहाई पर फैसला
अनिल शर्मा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अजीत कुमार ने पक्ष रखा. राज्य सरकार की ओर से उनकी रिहाई का विरोध किया गया. सरकार का कहना था कि अनिल शर्मा गैंगस्टर हैं और उनकी रिहाई से कानून-व्यवस्था प्रभावित हो सकती है. सरकार ने यह भी कहा कि 1984 की बिहार नीति के बजाय झारखंड की बाद की नीतियों के आधार पर उनके मामले पर विचार किया जाना चाहिए.
हाईकोर्ट ने 25 मार्च 2026 की अधिसूचना को अनिल शर्मा के मामले में रद्द करते हुए प्रकरण राज्य सजा पुनरीक्षण बोर्ड को वापस भेज दिया है. बोर्ड को निर्देश दिया गया है कि अगली निर्धारित बैठक में उनके मामले को रखा जाए और अदालत की टिप्पणियों तथा सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुरूप विस्तृत, स्पष्ट और कारणयुक्त आदेश पारित किया जाए.
इस फैसले का मुख्य संदेश यह है कि किसी बंदी की समयपूर्व रिहाई पर निर्णय लेते समय केवल उसके पुराने अपराध को दोहराना पर्याप्त नहीं है. संबंधित प्राधिकरण को उसके वर्तमान आचरण, सुधार की स्थिति और समाज में लौटने की संभावनाओं का भी निष्पक्ष आकलन करना होगा. अनिल शर्मा की रिहाई पर अंतिम निर्णय अब राज्य सजा पुनरीक्षण बोर्ड को लेना है.

