जोहार लाइव ब्यूरो
रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने दुष्कर्म के आरोप में मार्च 2026 से ऑब्जर्वेशन होम में रह रहे एक नाबालिग को जमानत दे दी है. कोर्ट ने कहा कि किशोर न्याय अधिनियम के तहत नाबालिग को जमानत देना सामान्य नियम है, जबकि जमानत से इनकार करना अपवाद है. केवल अपराध की गंभीरता या नाबालिग की उम्र के आधार पर जमानत से इनकार नहीं किया जा सकता. इसके लिए कानून में निर्धारित आधारों पर ठोस कारण होना जरूरी है.
जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की अदालत ने 14 अक्टूबर 2026 को क्रिमिनल रिवीजन संख्या 977/2026 पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया. अदालत ने गिरिडीह के किशोर न्याय बोर्ड और विशेष बाल न्यायालय के उन आदेशों को रद्द कर दिया, जिनमें आरोपी की जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी.
दोनों अदालतों ने खारिज की थी जमानत याचिका
मामला गिरिडीह जिले के निमियाघाट थाना कांड संख्या 26/2026 से जुड़ा है. इसमें भारतीय न्याय संहिता की धारा 127(2), 65(2), 351(3) और पॉक्सो एक्ट की धारा 6/10 के तहत मामला दर्ज किया गया है. पीड़िता की मां ने प्राथमिकी दर्ज कराते हुए नाबालिग पर दुष्कर्म का आरोप लगाया था.
आरोपी की ओर से हाईकोर्ट में दलील दी गई कि कथित घटना के समय उसकी उम्र 17 साल, 9 महीने और 2 दिन थी. उसे गांव की राजनीति के कारण झूठे मामले में फंसाया गया है. वह एक छात्र है और 14 मार्च 2026 से ऑब्जर्वेशन होम में रह रहा है.
बचाव पक्ष ने यह भी बताया कि केस डायरी के पैरा 54 के अनुसार, पीड़िता ने मेडिकल जांच कराने से इनकार किया था. हालांकि, अदालत ने इस तथ्य को आरोप के गलत होने का निर्णायक प्रमाण नहीं माना.
इससे पहले 29 अप्रैल 2026 को किशोर न्याय बोर्ड, गिरिडीह ने जमानत याचिका खारिज कर दी थी. इसके बाद 16 जून 2026 को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश प्रथम सह विशेष न्यायाधीश, बाल न्यायालय, गिरिडीह ने भी निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखा था.
जमानत खारिज करने के ठोस कारण नहीं मिले
हाईकोर्ट ने पाया कि निचली अदालतों ने आशंका जताई थी कि रिहा होने पर नाबालिग अपराधियों के संपर्क में आ सकता है या उसे नैतिक, शारीरिक अथवा मानसिक खतरा हो सकता है. लेकिन इन आशंकाओं के समर्थन में ठोस आधार स्पष्ट नहीं किए गए थे.
अदालत ने किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 की धारा 12 का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी किशोर को जमानत से इनकार केवल तभी किया जा सकता है, जब उसकी रिहाई से उसके किसी ज्ञात अपराधी के संपर्क में आने, नैतिक, शारीरिक या मानसिक खतरे में पड़ने अथवा न्याय के उद्देश्य विफल होने की उचित आशंका हो.
कोर्ट के अनुसार, दोनों निचली अदालतें जमानत खारिज करने के लिए इन कानूनी शर्तों के संबंध में पर्याप्त कारण दर्ज करने में विफल रहीं. इसी आधार पर हाईकोर्ट ने दोनों आदेशों को कानून की नजर में टिकाऊ नहीं माना.
पिता की जिम्मेदारी पर मिलेगी जमानत
हाईकोर्ट ने नाबालिग को उसके पिता प्रेमचंद महतो के निजी मुचलके और समान राशि के दो रिश्तेदारों की जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया है. जमानत की औपचारिकताएं किशोर न्याय बोर्ड, गिरिडीह की संतुष्टि के अनुसार पूरी करनी होंगी.
अदालत ने पिता को शपथपत्र देकर यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि नाबालिग किसी ज्ञात अपराधी के संपर्क में नहीं आएगा, किसी तरह के नैतिक, शारीरिक या मानसिक खतरे में नहीं पड़ेगा और दोबारा अपराध नहीं करेगा. पिता को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि नाबालिग अपनी पढ़ाई जारी रखे और रचनात्मक गतिविधियों में भाग ले.
इसके अलावा, नाबालिग और उसके पिता को नवंबर 2026 के पहले सोमवार से प्रत्येक महीने के पहले सोमवार को परिवीक्षा अधिकारी के समक्ष उपस्थित होना होगा. यदि उस दिन अवकाश रहेगा, तो अगले कार्यदिवस पर रिपोर्ट करना होगा. परिवीक्षा अधिकारी नाबालिग की गतिविधियों पर निगरानी रखेंगे और सामाजिक जांच रिपोर्ट किशोर न्याय बोर्ड को सौंपेंगे.
Also Read : झारखंड : चाईबासा पुलिस लाइन में दंगा नियंत्रण का मॉक ड्रिल, आपात स्थिति से निपटने की तैयारी पर जोर

