झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की पत्नी और गांडेय विधायक कल्पना सोरेन के खिलाफ कथित तौर पर अश्लील और आपत्तिजनक फेसबुक पोस्ट करने के मामले में आरोपी 30 वर्षीय साहदेव उरांव को सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को जमानत दे दी. सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने कहा कि आरोपी एक साल से अधिक समय से हिरासत में है और उसके खिलाफ लगाए गए अपराधों में अधिकतम सजा तीन साल तक है. कोर्ट ने यह भी माना कि इस स्तर पर आरोपी से हिरासत में पूछताछ की जरूरत नहीं है.
साहदेव उरांव ने झारखंड हाईकोर्ट के 17 अप्रैल 2026 के उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें हाईकोर्ट ने उसकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी. मामले का संबंध फेसबुक अकाउंट “Adivasi Ladka Raju Oraon” से बताया गया है. अभियोजन के अनुसार इस अकाउंट से कल्पना सोरेन की तस्वीर के साथ कथित तौर पर अश्लील, अभद्र और अपमानजनक टिप्पणी पोस्ट की गई थी.
28 अगस्त को सामने आई थी पोस्ट, 29 अगस्त को दर्ज हुई FIR
पुलिस के मुताबिक कथित पोस्ट 28 अगस्त 2025 को सामने आई थी. इसके अगले दिन, 29 अगस्त 2025 को रांची के साइबर क्राइम थाना में एक पुलिस अधिकारी के बयान के आधार पर मामला दर्ज किया गया. यानी उपलब्ध कोर्ट रिकॉर्ड के अनुसार FIR सीधे कल्पना सोरेन की शिकायत पर दर्ज नहीं हुई थी.
साहदेव उरांव को 6 सितंबर 2025 को गिरफ्तार किया गया था और तब से वह न्यायिक हिरासत में था. उसके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 75, 78, 79 और 356(2) तथा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66C और 67 के तहत मामला दर्ज किया गया.
इन धाराओं में यौन उत्पीड़न, पीछा करना, महिला की गरिमा का अपमान, मानहानि, पहचान की चोरी और इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से अश्लील सामग्री प्रकाशित या प्रसारित करने से संबंधित प्रावधान शामिल हैं.
हाईकोर्ट में राज्य ने क्या कहा था?
साहदेव ने झारखंड हाईकोर्ट में जमानत की मांग करते हुए कहा था कि वह 6 सितंबर 2025 से जेल में है और उसके पास से मोबाइल फोन और SIM बरामद किया जा चुका है. उसकी ओर से यह भी दलील दी गई कि मामले की कई धाराएं जमानती प्रकृति की हैं.
वहीं राज्य सरकार ने जमानत का विरोध किया था. राज्य की ओर से कहा गया कि आरोपी ने फर्जी डिजिटल पहचान का इस्तेमाल कर एक महिला राजनेता, जो उस समय सिटिंग विधायक थीं, को निशाना बनाया. अभियोजन ने यह भी कहा कि गुमनाम पहचान के पीछे से कथित अभद्र और जेंडर आधारित हमला मामले की गंभीरता को बढ़ाता है.
17 अप्रैल 2026 को जस्टिस अनुभा रावत चौधरी की पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए जमानत देने से इनकार कर दिया था. हाईकोर्ट ने राज्य को निर्देश दिया था कि गवाहों को जल्द अदालत में पेश किया जाए, ताकि मुकदमे को आगे बढ़ाया जा सके.
इसी घटना से जुड़ा दूसरा केस भी
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान साहदेव की ओर से यह भी बताया गया था कि कथित घटना से संबंधित एक दूसरा FIR दर्ज हुआ था. यह मामला कांके प्रखंड समन्वय समिति के प्रमुख जावेद अंसारी की शिकायत से संबंधित था.
साहदेव को उस मामले में 13 फरवरी 2026 को जमानत मिल चुकी थी. उसकी दलील थी कि दोनों मामले एक ही कथित घटना से जुड़े हैं और इस तथ्य को उसकी हिरासत की अवधि पर विचार करते समय ध्यान में रखा जाना चाहिए. हालांकि, झारखंड हाईकोर्ट ने कहा कि दूसरे FIR में मिली जमानत अलग मामला है और उसके सामने वर्तमान FIR से संबंधित जमानत याचिका ही विचाराधीन है.
सुप्रीम कोर्ट में क्या दलील दी गई?
हाईकोर्ट से जमानत नहीं मिलने के बाद साहदेव ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया. 10 अगस्त 2026 को जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने उसकी याचिका पर झारखंड सरकार को नोटिस जारी किया था.
सुप्रीम कोर्ट में साहदेव की ओर से कहा गया कि: वह 6 सितंबर 2025 से लगातार हिरासत में है. जांच पूरी हो चुकी है और चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है. अभियोजन का मामला मुख्य रूप से इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों पर आधारित है, जो जांच एजेंसी के कब्जे में हैं.
इसलिए उसकी आगे की हिरासत की आवश्यकता नहीं है. उसके फरार होने, गवाहों को प्रभावित करने या साक्ष्यों से छेड़छाड़ करने की संभावना नहीं है. उसका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है. इसी घटना से संबंधित दूसरे मामले में उसे पहले ही जमानत मिल चुकी है.
सुप्रीम कोर्ट ने आज क्यों दी जमानत?
सुप्रीम कोर्ट ने 29 सितंबर को जमानत देते हुए मुख्य रूप से आरोपी की लंबी हिरासत और मामले की मौजूदा स्थिति को ध्यान में रखा. कोर्ट के मुताबिक साहदेव एक साल से अधिक समय से जेल में है, जबकि उसके खिलाफ लगाए गए अपराधों में अधिकतम सजा तीन साल तक है. कोर्ट ने यह भी कहा कि अब उसकी custodial interrogation यानी हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता नहीं है.

