तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी लोकसभा सांसदों की सदस्यता रद्द करने की मांग से जुड़े मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को सुनवाई की. कोर्ट ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के सामने लगभग तीन महीने से लंबित इस कार्यवाही पर कड़ा सवाल उठाया और इतनी देरी को ‘रेड फ्लैग’ करार दिया.
हालांकि, अदालत ने स्पीकर के लिए कोई सख्त डेडलाइन तय नहीं की है, लेकिन उम्मीद जताई है कि इस मामले का जल्द से जल्द निपटारा किया जाएगा.
क्या है पूरा मामला
यह पूरा विवाद जून 2026 में तब शुरू हुआ जब TMC के 20 लोकसभा सांसदों ने पार्टी से अलग होकर ‘Nationalist Citizens Party of India’ (NCPI) के साथ जुड़ने का ऐलान किया और संसद में अलग बैठने की मांग की. इसके जवाब में 18 जून को TMC के लोकसभा नेता अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा स्पीकर के समक्ष अयोग्यता याचिकाएं दाखिल कर दीं.
पार्टी का तर्क है कि इन सांसदों ने दल-बदल विरोधी कानून (दसवीं अनुसूची) का उल्लंघन किया है, जबकि बागी सांसदों का दावा है कि TMC के 28 में से 20 सांसद उनके साथ हैं, जो कि दो-तिहाई बहुमत के आधार पर एक वैध विलय है.
स्पीकर के सामने क्या हुआ और सुप्रीम कोर्ट क्यों पहुंचा मामला?
अभिषेक बनर्जी की याचिकाओं पर स्पीकर की ओर से नोटिस जारी किए जाने के बाद जवाब देने के लिए समय बढ़ाया गया था, लेकिन इसी बीच मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया. बुधवार की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने देरी पर चिंता जताते हुए कहा कि ऐसी देरी से न केवल अयोग्यता का सवाल बल्कि अन्य लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं भी प्रभावित होती हैं.
अदालत ने वर्ष 2020 के ‘कीशम मेघचंद्र सिंह’ मामले का हवाला देते हुए याद दिलाया कि दल-बदल के मामलों का फैसला उचित समय यानी सामान्यतः तीन महीने के भीतर होना चाहिए. चूंकि इस मामले में भी लगभग तीन महीने बीत चुके हैं, इसलिए कोर्ट ने देरी को गंभीरता से लिया है.

फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट ने खुद कोई अंतिम फैसला नहीं सुनाया है और न ही सांसदों को अयोग्य घोषित किया है. मामला अभी भी लोकसभा स्पीकर के पास ही है, जो दोनों पक्षों को सुनने के बाद यह तय करेंगे कि दसवीं अनुसूची के तहत इन सांसदों पर क्या कार्रवाई बनती है.
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