झारखंड की राजनीति में मधु कोड़ा का नाम सिर्फ एक पूर्व मुख्यमंत्री के तौर पर नहीं लिया जाता. उनके नाम के साथ सत्ता का वह अध्याय जुड़ा है, जिसमें एक साधारण आदिवासी परिवार से निकला युवक निर्दलीय विधायक के दम पर मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचा और फिर उनका राजनीतिक सफर आरोपों, गिरफ्तारी और अदालत की सजा तक जा पहुंचा. आज ही के दिन, 18 सितंबर 2006 को मधु कोड़ा ने झारखंड के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी. इसलिए आज उनके उस पूरे सफर को पलटकर देखना जरूरी है, जो गुआ के एक छोटे से गांव से शुरू हुआ और झारखंड की सत्ता के सबसे ऊंचे मुकाम तक पहुंचा.
जिस नेता के पास कोई पार्टी नहीं थी, वही एक दिन राज्य का मुख्यमंत्री बन गया. न कोई बड़ा राजनीतिक कुनबा, न किसी राष्ट्रीय पार्टी का अपना टिकट. सिर्फ एक निर्दलीय विधायक की हैसियत और विधानसभा का ऐसा गणित, जिसमें उसकी जरूरत हर बड़े दल को थी. मधु कोड़ा ने भाजपा से अपना राजनीतिक सफर शुरू किया, मंत्री बने, फिर उसी भाजपा ने टिकट देने से इनकार किया. उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा, जीते और कुछ ही समय बाद वही निर्दलीय विधायक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा, जिसे पाने के लिए बड़े-बड़े दलों के पास भी साफ रास्ता नहीं था.
गुआ के गांव से शुरू हुआ सफर
मधु कोड़ा का जन्म पश्चिम सिंहभूम जिले के गुआ गांव में हुआ. वे हो जनजाति से आते हैं. उनके पिता रसिका कोड़ा आदिवासी किसान थे और परिवार की जिंदगी खेती-किसानी से जुड़ी थी. कोड़ा ने भुवनेश्वर स्थित इग्नू केंद्र से स्नातक की पढ़ाई की.
राजनीति में उनकी शुरुआत ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन के कार्यकर्ता के रूप में हुई. इसके बाद 2000 के बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा ने उन्हें जगन्नाथपुर से टिकट दिया. वे चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे. उस समय उनकी उम्र करीब 29 साल थी. 15 नवंबर 2000 को झारखंड अलग राज्य बना तो उनका निर्वाचन क्षेत्र भी नए राज्य का हिस्सा बन गया. बाबूलाल मरांडी की सरकार में कोड़ा को ग्रामीण अभियांत्रिकी संगठन (Rural Engineering Organization) का राज्य मंत्री, स्वतंत्र प्रभार दिया गया. एक युवा आदिवासी नेता के लिए यह राजनीतिक सफर की तेज शुरुआत थी.
भाजपा से मिला मंत्री पद, फिर उसी पार्टी से दूरी
झारखंड बनने के कुछ ही वर्षों बाद भाजपा के भीतर राजनीतिक खींचतान शुरू हो गयी. बाबूलाल मरांडी की सरकार के खिलाफ पार्टी के भीतर असंतोष बढ़ा और आखिरकार मार्च 2003 में अर्जुन मुंडा मुख्यमंत्री बने. मुंडा सरकार में मधु कोड़ा को पंचायती राज विभाग की जिम्मेदारी मिली.
लेकिन 2005 का विधानसभा चुनाव कोड़ा के राजनीतिक जीवन का बड़ा मोड़ साबित हुआ. भाजपा ने उन्हें टिकट देने से इनकार कर दिया. कोड़ा ने पार्टी से अलग होकर निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला किया. जगन्नाथपुर की जनता ने एक बार फिर उनका साथ दिया. कोड़ा निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव जीत गये और इस जीत के साथ उन्होंने यह साबित किया कि उनका राजनीतिक आधार सिर्फ पार्टी संगठन पर निर्भर नहीं था.
मुंडा सरकार गिराने मुहिम
अर्जुन मुंडा सरकार को मधु कोड़ा समेत चार निर्दलीय विधायक भी समर्थन कर रहे थे. तीन अन्य विधायक थे एनोस एक्का, कमलेश सिंह और हरिनारायण राय. समर्थन के बदले इन्हें भी मंत्री पद मिला था. मधु कोड़ा, अर्जुन मुंडा के दिये जख्म को भूले नहीं थे. वे मुख्यमंत्री की कार्यशैली से भी खफा थे. मधु कोड़ा ने एनोस एक्का, कमलेश सिंह और हरिनारायण राय को अपने साथ मिला लिया. ये चारों मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा के खिलाफ बयानबाजी करने लगे.
कांग्रेस का सहयोग मांगने के लिए दिल्ली कूच
सितम्बर 2006 में घटनाक्रम तेजी से बदलने लगा. अर्जुन मुंडा की सरकार को गिराना मधु कोड़ा का मकसद बन गया.लेकिन यह काम कांग्रेस और झारखंड मुक्ति मोर्चा के समर्थन के बिना नहीं हो सकता था. तब मधु कोड़ा, एनोस एक्का, हरिनारायण राय और कमलेश सिंह ने दिल्ली जा कर कांग्रेस से सहयोग लेने का निश्चय किया. मधु कोड़ा, एनोस एक्का और हरिनारायण राय तो दिल्ली पहुंच गये लेकिन कमलेश सिंह को अर्जुन मुंडा के समर्थकों ने पकड़ लिया और दिल्ली जाने से रोक दिया.
कांग्रेस और झामुमो का सकारात्मक संकेत
4 सितम्बर को कांग्रेस के केन्द्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय ने दिल्ली में कहा, अगर अर्जुन मुंडा सरकार गिर जाती है और निर्दलीय विधायकों ने हमसे (कांग्रेस) सम्पर्क किया तो हम वैकल्पिक सरकार बनाने की कोशिश करेंगे. हम किसी भी हाल में मध्यावधि चुनाव नहीं चाहते. दूसरी तरफ झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेता और नेता प्रतिपक्ष सुधीर महतो ने घोषणा कर दी कि अगर नयी सरकार के गठन की नौबत आती है तो उनकी पार्टी की तरफ से कोई मुख्यमंत्री पद का दावेदार नहीं होगा. हमारे शीर्ष नेता शिबू सोरेन ने इस होड़ से खुद को अलग कर लिया है. इस तरह कांग्रेस और झारखंड मुक्ति मोर्चा ने एक तरह से मधु कोड़ा को मुंडा सरकार गिराने का साफ संकेत दे दिया.
चार मंत्रियों का इस्तीफा, मुंडा सरकार अल्पमत में
इसके बाद मुंडा सरकार के चार निर्दलीय मंत्रियों, मधु कोड़ा, एनोस एक्का, कमलेश सिंह और हरिनारायण राय ने इस्तीफा दे दिया. साथ ही साथ मुंडा सरकार से समर्थन भी वापस ले लिया. इससे अर्जुन मुंडा की सरकार अल्पमत में आ गयी. 6 सितम्बर 2006 से वैकल्पिक सरकार बनाने की कोशिशें तेज हो गयीं. झारखंड मुक्ति मोर्चा के पास 17 तो कांग्रेस के पास 9 विधायक थे. दोनों मिल कर मार्च 2005 में सरकार बना कर दुर्गति झेल चुके थे. केवल 9 दिन में ही सरकार गिर गयी थी.
मधु कोड़ा मुख्यमंत्री बने
बहुमत खो देने के कारण अर्जुन मुंडा ने 14 सितम्बर को इस्तीफा दे दिया. कांग्रेस और झामुमो अल्पमत की कमजोर सरकार भी नहीं चाहते थे और मध्यावधि चुनाव (Mid-term election) भी टालना चाहते थे. तब उन्होंने मधु कोड़ा को आगे कर दिया ताकि एक कमजोर मुख्यमंत्री को कुर्सी पर बैठा कर वे अपने हितों की पूर्ति कर सकें. सोनिया गांधी ने मुख्यमंत्री के रूप में मधु कोड़ा के नाम का समर्थन किया. इस तरह मधु कोड़ा ने 18 सितम्बर 2006 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली. झामुमो, कोड़ा सरकार में शामिल हुई जब कि कांग्रेस ने उसे बाहर से समर्थन दिया.
पांच हजार करोड़ के कोयला घोटाले में फंसे मधु कोड़ा
कोड़ा सरकार करीब दो साल चली. अगस्त 2008 में झामुमो ने समर्थन वापस ले लिया और कोड़ा को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा. 23 अगस्त 2008 को उन्होंने इस्तीफा दिया और कुछ दिनों बाद शिबू सोरेन ने मुख्यमंत्री पद संभाल लिया. मुख्यमंत्री पद जाने के बाद भी कोड़ा की राजनीतिक यात्रा खत्म नहीं हुई. 2009 में वे सिंहभूम लोकसभा सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर सांसद चुने गये. लेकिन इसी दौर में उनके खिलाफ जांच का दायरा बढ़ने लगा.
कोड़ा पर आरोप था कि उन्होंने राज्य के मुख्य सचिव अशोक कुमार बसु और एक अन्य के साथ मिलकर कोलकाता की विनी आयरन एंड स्टील उद्योग लिमिटिड (VISUL) को कोल ब्लॉक देने का षडयंत्र रचा. इसी मामले में राज्य पुलिस की जांच शाखा ने 30 नवंबर 2009 को कोड़ा को गिरफ्तार कर लिया, 31 जुलाई 2013 को वो जमानत पर बाहर आए.
कोड़ा पर आरोप है कि उन्होंने अवैध कोल ब्लॉक आवंटन में 5 हजार करोड़ का घोटाला किया. साल 2013 में ईडी ने कोड़ा की 144 करोड़ की संपत्ति को अटैच कर लिया. बीते विधानसभा चुनावों में कोड़ा ने अपनी जगह अपनी पत्नी गीता को चुनाव लड़वाया जो विधायक चुनी गई. हालांकि वह खुद मझगांव सीट से चुनाव हार गए.
2024 में नहीं लड़ सके चुनाव
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