बॉलीवुड के पर्दे पर जब भी रोमांस की बात होती है, एक चेहरा बरबस याद आ जाता है. चेहरे पर मासूम मुस्कान, आंखों में शरारत और दिल में प्यार लिए नजर आने वाला वो चॉकलेटी हीरो, जिसने एक पूरी पीढ़ी को मोहब्बत का अपना अंदाज सिखाया. नाम था ऋषि कपूर.
ऋषि कपूर की जिंदगी को सिर्फ उनकी फिल्मों के जरिए समझना शायद पूरी तस्वीर देखना नहीं होगा. पर्दे पर जिस अभिनेता की पहचान रोमांस और चॉकलेटी अंदाज से बनी, उसकी निजी जिंदगी में भी रिश्तों, विवादों और उतार-चढ़ाव के कई रंग थे. कभी एक अवॉर्ड को लेकर किया गया उनका खुलासा चर्चा में रहा, तो कभी अमिताभ बच्चन के साथ उनके रिश्तों की खबरें सुर्खियां बनीं. टीना मुनीम से जुड़ी अफवाहों ने संजय दत्त तक को नाराज कर दिया था, तो एक वक्त ऐसा भी आया जब दुबई में उनकी मुलाकात दाऊद इब्राहिम से हुई. इन किस्सों ने ऋषि कपूर को सिर्फ एक फिल्म स्टार नहीं, बल्कि एक बेहद दिलचस्प शख्सियत भी बना दिया.
4 सितंबर को ऋषि कपूर की बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर उनकी फिल्मों और किरदारों से आगे बढ़कर उनकी जिंदगी के उन्हीं चर्चित अध्यायों को याद करना दिलचस्प है. और इसी कहानी में झारखंड का एक छोटा लेकिन खास कनेक्शन भी जुड़ता है, जो 1986 की फिल्म ‘नसीब अपना अपना’ के गीतों के जरिए सामने आता है.
‘बॉबी’ ने बनाया चॉकलेटी हीरो
ऋषि कपूर ने बतौर बाल कलाकार फिल्मों की दुनिया में कदम रखा था, लेकिन उन्हें असली पहचान मिली 1973 की फिल्म ‘बॉबी’ से. राज कपूर के बेटे होने के बावजूद इस फिल्म ने उन्हें अपनी अलग पहचान बनाने का मौका दिया. डिंपल कपाड़िया के साथ उनकी जोड़ी ने पर्दे पर ऐसा जादू बिखेरा कि ऋषि कपूर रातोंरात युवाओं के पसंदीदा स्टार बन गए. उनकी मुस्कान, हेयरस्टाइल, कपड़े और रोमांटिक अंदाज उस दौर के युवाओं के बीच खासा लोकप्रिय हुआ.
‘बॉबी’ सिर्फ एक फिल्म नहीं थी. इसने हिंदी सिनेमा को एक ऐसा युवा चेहरा दिया, जिसे आने वाले वर्षों में रोमांस का पर्याय माना जाने लगा. लेकिन ऋषि कपूर की कहानी सिर्फ चॉकलेटी हीरो तक सीमित नहीं रही.
ऋषि कपूर का झारखंड कनेक्शन
ऋषि कपूर की फिल्मी जिंदगी को याद करते हुए झारखंड का नाम शायद पहली नजर में थोड़ा अलग लगे. लेकिन उनकी एक चर्चित फिल्म ‘नसीब अपना अपना’ के जरिए यह कनेक्शन सामने आता है. 1986 में रिलीज हुई इस फिल्म में ऋषि कपूर के साथ राधिका, फरहा नाज और अन्य कलाकार नजर आए थे. फिल्म के गीतों में एक गीत ऐसा था, जिसे आज भी लोग इसकी खास पंक्ति की वजह से याद करते हैं.
‘भला है बुरा है जैसा भी है, मेरा पति मेरा देवता है’. इस गीत को अनुराधा पौडवाल और कविता कृष्णमूर्ति ने आवाज दी थी. संगीत लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने दिया था. लेकिन इस गीत के शब्द जिस गीतकार की कलम से निकले थे, उनका झारखंड से भी खास रिश्ता था. नाम था एस. एच. बिहारी.
एस. एच. बिहारी मूल रूप से बिहार के आरा के रहने वाले थे. लेकिन उनकी जिंदगी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा झारखंड के मधुपुर से जुड़ा रहा. मधुपुर उस दौर में सिर्फ उनके रहने की जगह नहीं था. यह उनकी रचनात्मक दुनिया का भी हिस्सा बना. मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री में रहकर उन्होंने हिंदी सिनेमा के लिए कई यादगार गीत लिखे, लेकिन उनकी जड़ों का एक सिरा बिहार और झारखंड की मिट्टी से जुड़ा रहा.
जब एक फिल्मफेयर अवॉर्ड ने मचा दी हलचल
‘बॉबी’ के लिए ऋषि कपूर को बेस्ट एक्टर का फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला. उस समय यह उनके करियर की बड़ी उपलब्धियों में से एक थी. लेकिन कई साल बाद उन्होंने इसी अवॉर्ड से जुड़ा एक ऐसा दावा किया, जिसने फिल्म इंडस्ट्री में हलचल मचा दी. ऋषि कपूर ने अपनी आत्मकथा ‘खुल्लम खुल्ला’ में दावा किया था कि उन्होंने अवॉर्ड पाने के लिए पैसे दिए थे. उस दौर में अमिताभ बच्चन की ‘जंजीर’ भी बड़ी चर्चा में थी और उन्हें भी अवॉर्ड का मजबूत दावेदार माना जा रहा था. ऋषि कपूर का यह खुलासा इसलिए भी खास था क्योंकि उन्होंने अपने करियर की एक बड़ी उपलब्धि से जुड़े विवाद को खुद सामने रखा. यही बेबाकी उनके व्यक्तित्व का हिस्सा रही.
अमिताभ बच्चन से दोस्ती, दूरी और क्रेडिट की चर्चा
ऋषि कपूर और अमिताभ बच्चन ने एक साथ कई यादगार फिल्में कीं. ‘कभी कभी’, ‘अमर अकबर एंथनी’, ‘नसीब’ और ‘कुली’ जैसी फिल्मों में दोनों की जोड़ी दर्शकों को खूब पसंद आई. पर्दे पर दोनों की केमिस्ट्री शानदार रही, लेकिन दोनों के रिश्तों को लेकर समय-समय पर चर्चाएं भी होती रहीं. ऋषि कपूर ने मल्टीस्टारर फिल्मों में कलाकारों को मिलने वाले क्रेडिट और अपनी भूमिका को लेकर कई बार खुलकर बात की.
उनकी बेबाक टिप्पणियों की वजह से दोनों के बीच कथित तनाव और ‘कोल्ड वॉर’ की खबरें भी सामने आती रहीं. हालांकि वक्त के साथ दोनों के रिश्तों में गर्मजोशी भी दिखाई दी और एक दौर में जो चर्चाएं विवाद का हिस्सा थीं, वही बाद में दोस्ती और सम्मान की कहानी में बदलती नजर आईं.
टीना मुनीम की अफवाह ने पहुंचाया संजय दत्त को घर तक
ऋषि कपूर की निजी जिंदगी से जुड़ा एक और किस्सा टीना मुनीम के साथ कथित अफेयर की अफवाहों से जुड़ा है. उस समय ऋषि कपूर और टीना मुनीम के बीच रिश्ते की खबरें बॉलीवुड में खूब चर्चा में थीं. इन अफवाहों से संजय दत्त कथित तौर पर काफी नाराज थे. बात इतनी बढ़ने की चर्चा हुई कि संजय दत्त अपने दोस्त गुलशन ग्रोवर के साथ ऋषि कपूर के घर तक पहुंच गए.
कहा जाता है कि बाद में नीतू कपूर ने संजय दत्त को समझाया कि ऋषि कपूर और टीना मुनीम के बीच वैसा कोई रिश्ता नहीं था, जैसा अफवाहों में बताया जा रहा था. यह किस्सा उस दौर के बॉलीवुड की उस दुनिया की झलक देता है, जहां फिल्मों से ज्यादा कई बार सितारों की निजी जिंदगी सुर्खियों में रहती थी.
पिता राज कपूर की निजी जिंदगी का असर भी महसूस किया
ऋषि कपूर के लिए राज कपूर सिर्फ हिंदी सिनेमा के शोमैन नहीं थे. वह उनके पिता भी थे. इसलिए राज कपूर की निजी जिंदगी से जुड़े विवादों और रिश्तों का असर परिवार पर भी पड़ा. राज कपूर और नरगिस के रिश्ते की चर्चा हिंदी सिनेमा के सबसे चर्चित अध्यायों में रही है. बाद में राज कपूर का नाम अभिनेत्री वैजयंतीमाला के साथ भी जोड़ा गया. ऋषि कपूर ने अपनी आत्मकथा और इंटरव्यू में परिवार के भीतर इन घटनाओं के असर पर खुलकर बात की थी. एक फिल्मी परिवार में जन्म लेने के बावजूद ऋषि कपूर की जिंदगी सिर्फ ग्लैमर से भरी नहीं थी. उन्होंने परिवार के भीतर के रिश्तों, पिता की छवि और उससे जुड़े भावनात्मक उतार-चढ़ाव को भी करीब से देखा.
जब दुबई में दाऊद इब्राहिम ने ऋषि कपूर को चाय पर बुलाया
ऋषि कपूर की जिंदगी का सबसे चौंकाने वाला किस्सा उनकी दाऊद इब्राहिम से मुलाकात से जुड़ा है. साल 1988 में दुबई में एक कार्यक्रम के दौरान ऋषि कपूर की मुलाकात दाऊद इब्राहिम से हुई थी. ऋषि कपूर ने अपनी आत्मकथा में इस मुलाकात का जिक्र किया था. बताया जाता है कि दाऊद ने उन्हें चाय पर बुलाया था और राज कपूर के प्रति अपनी प्रशंसा भी जाहिर की.
एक तरफ हिंदी सिनेमा का बड़ा सितारा और दूसरी तरफ अंडरवर्ल्ड का कुख्यात नाम. दोनों की यह मुलाकात बाद में लंबे समय तक चर्चा का विषय बनी रही. ऋषि कपूर की जिंदगी के ये किस्से बताते हैं कि उनके स्टारडम के पीछे सिर्फ फिल्मों की चमक नहीं थी, बल्कि ऐसी कई घटनाएं भी थीं, जिन्होंने उनके जीवन को किसी फिल्मी कहानी की तरह उतार-चढ़ाव से भर दिया.
नीतू कपूर के साथ प्यार, शादी और रिश्ते की असली तस्वीर
ऋषि कपूर और नीतू कपूर की प्रेम कहानी भी हिंदी सिनेमा की यादगार प्रेम कहानियों में शामिल है. दोनों ने कई फिल्मों में साथ काम किया. पर्दे पर उनकी जोड़ी को दर्शकों ने खूब पसंद किया और यही प्यार धीरे-धीरे असल जिंदगी के रिश्ते में बदल गया. लेकिन उनकी शादीशुदा जिंदगी हमेशा किसी फिल्मी कहानी की तरह परफेक्ट नहीं रही. ऋषि कपूर ने खुद अपने गुस्से और पजेसिव स्वभाव को लेकर खुलकर बात की थी. रिश्ते में उतार-चढ़ाव आए, लेकिन दोनों ने लंबे समय तक साथ निभाया. नीतू कपूर ने भी कई मौकों पर ऋषि कपूर के स्वभाव और उनके साथ बिताए वर्षों के किस्से साझा किए. इस रिश्ते में प्यार था, तकरार थी, दोस्ती थी और जिंदगी की मुश्किलों का साथ भी था.
चॉकलेटी हीरो से शानदार कैरेक्टर एक्टर तक
ऋषि कपूर को सिर्फ ‘बॉबी’ के रोमांटिक हीरो के तौर पर याद करना उनके लंबे करियर को छोटा कर देना होगा. करियर के शुरुआती दौर में उन्होंने रोमांटिक फिल्मों में खूब लोकप्रियता हासिल की. लेकिन उम्र बढ़ने के साथ उन्होंने अपने अभिनय के रंग भी बदले. ‘अग्निपथ’, ‘दो दूनी चार’, ‘मुल्क’, ‘102 नॉट आउट’ और ‘द बॉडी’ जैसी फिल्मों में उनके अलग-अलग अंदाज देखने को मिले. उन्होंने साबित किया कि वह सिर्फ प्रेम कहानियों के अभिनेता नहीं हैं.
जिस चेहरे को कभी बॉलीवुड का चॉकलेटी हीरो कहा गया था, वही चेहरा आगे चलकर गंभीर, सख्त, भावुक और कई बार बिल्कुल अलग तरह के किरदारों में दिखाई दिया.
30 अप्रैल 2020 को खत्म हुआ सफर, लेकिन कहानी आज भी जारी है
30 अप्रैल 2020 को ऋषि कपूर इस दुनिया को अलविदा कह गए. उनके जाने के बाद हिंदी सिनेमा ने सिर्फ एक अभिनेता नहीं खोया, बल्कि एक ऐसा कलाकार खोया जिसकी पहचान कई पीढ़ियों से जुड़ी थी. आज उनकी फिल्में देखी जाती हैं. उनके गाने सुने जाते हैं. उनके इंटरव्यू और बेबाक बयान फिर चर्चा में आते हैं. उनकी आत्मकथा में दर्ज किस्से लोगों को उनकी निजी जिंदगी के कई अनदेखे पहलुओं से रूबरू कराते हैं.
ऋषि कपूर की जिंदगी इसलिए भी खास रही क्योंकि इसमें फिल्मी चमक के साथ रिश्तों की गर्माहट, विवादों की तपिश, परिवार की उलझनें, दोस्ती, प्यार और बेबाकी सब कुछ था और उनकी कहानी में झारखंड का वह छोटा सा अध्याय भी है, जिसे शायद बहुत कम लोग जानते हैं. ‘नसीब अपना अपना’ के गीत और उसके गीतकार एस. एच. बिहारी के जरिए जुड़ा यह रिश्ता याद दिलाता है कि हिंदी सिनेमा की कहानियां सिर्फ मुंबई की गलियों में नहीं बनतीं. उनकी जड़ें देश के अलग-अलग शहरों और कस्बों की मिट्टी में भी कहीं न कहीं छिपी होती हैं.


