मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में बिरसा और बैहर इलाके के बैगा आदिवासी गांवों से पिछले कुछ महीनों में लगातार बच्चों की मौत की खबरें आ रही हैं. सोनगुड्डा, बोंदारी, कुंडेकसा, कोरका, गठिया, मछुरदा और मातला. इन गांवों में जून से अब तक कई बच्चों की जान जा चुकी है.
सरकार कह रही है कि सिर्फ 8 बच्चों की मौत हुई है. लेकिन गांव वाले, स्थानीय नेता और कांग्रेस के लोग कह रहे हैं कि 19 से 24 बच्चे मर चुके हैं. यह सिर्फ बीमारी की बात नहीं है …यह सवाल है कि सरकार की योजनाएं इन गांवों तक पहुंच क्यों नहीं पा रहीं?
बैगा जनजाति देश के उन 72 जनजातियों में आती है जिन्हें सबसे ज्यादा कमजोर (PVTG) माना जाता है. 2011 की जनगणना के हिसाब से मध्य प्रदेश में बैगा समुदाय के मात्र 3 लाख से ज्यादा लोग हैं.
इन्हीं के लिए दो बड़ी योजनाएं चल रही हैं-
– केंद्र सरकार की PM-JANMAN योजना- नवंबर 2023 में शुरू हुई
– राज्य सरकार की आहार अनुदान योजना- 2018 से चल रही है
लेकिन बालाघाट के गांवों की हकीकत बताती है कि ये योजनाएं सिर्फ कागज़ों पर हैं, ज़मीन पर नहीं पहुंच रही.
बुखार, दाने और दस्त से जा रही मासूमों की जान
अगस्त के शुरुआत में ही अडोरी पंचायत के गांवों – बोनदारी, कोहनीमोर, भंडारी और कुंडेकसा में एक अनजान बीमारी फैल गई थी. हर घर में बच्चे और बड़े तेज बुखार, उल्टी, दस्त और शरीर पर लाल दानों से परेशान थे.
इसी दौरान मछुरदा गांव में सगनू मरकाम के बेटे सूरज की मौत हो गई. उनके तीन और बच्चे अभी भी अस्पताल में भर्ती हैं. इनमें से एक बच्चे का वजन उसकी उम्र के हिसाब से बहुत कम- सिर्फ 10-15 किलो, पाया गया.
मातला गांव में महा सिंह और सतन बाई के दो बच्चों, बेटे श्याम कुंवर और बेटी समलू की कुछ घंटों के अंदर एक के बाद एक मौत हो गई. परिवार का कहना है कि मार्च-अप्रैल से ही उन्हें पोषण आहार (यानी सरकार की तरफ से मिलने वाला खाना) मिलना बंद हो गया था.
हालात इतने बिगड़ गए कि प्रशासन को एक स्कूल में ही अस्थायी अस्पताल बनाना पड़ा. स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक पिछले दो महीनों में डायरिया और मौसमी बीमारियों से 8 बच्चों की मौत दर्ज हुई है.
सिविल सर्जन डॉ. निलय जैन के हवाले से 13 अगस्त 2026 को प्रकाशित रॉयल बुलेटिन रिपोर्ट के मुताबिक, ये सभी 8 बच्चे अडोरी और मछुरदा पंचायत के गांवों के रहने वाले थे. 26 जून से 22 जुलाई के बीच बोंदारी निवासी भाई-बहन लमनिन और साहिल, पूजा, सचिन तथा कुंडेकसा निवासी प्रीति की मौत हुई. इसके बाद 6 अगस्त को अरविंद और 8 अगस्त को मंगली मरकाम की जान गई. आठवीं मौत सबसे हाल की थी. तीन वर्षीय प्रियंका धुर्वे को 9 अगस्त को जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जिसने 11 अगस्त की रात इलाज के दौरान दम तोड़ दिया. सिविल सर्जन के मुताबिक वह बच्ची एक साथ कई बीमारियों से जूझ रही थी. इस पुष्ट सूची में सिर्फ प्रियंका की उम्र (3 वर्ष) दर्ज है, बाकी बच्चों की उम्र सामने नहीं आई.

हाल ही में मोहनपुर पंचायत के बैगाटोला में 4 साल के लवकुश की मौत हुई, जिसके बाद गुस्साए गांव वालों ने बालाघाट-बैहर सड़क जाम कर दी. लोगों ने आरोप लगाया कि स्वास्थ्य विभाग लापरवाही कर रहा है और पोस्टमार्टम से पहले ही शव का अंतिम संस्कार कराने की कोशिश की गई.
110 किलोमीटर दूर इलाज, फिर भी अस्पताल में अव्यवस्था
इन गांवों में स्वास्थ्य सुविधाएं इतनी कम हैं कि गंभीर हालत में बच्चों को करीब 110 किलोमीटर दूर बालाघाट के जिला अस्पताल ले जाना पड़ता है, लेकिन वहां पहुंचने के बाद भी हालात ज्यादा बेहतर नहीं हैं. वार्ड में मास्क और सैनिटाइज़र जैसी बुनियादी चीज़ें भी ठीक से नहीं मिल रहीं, और एक ही बिस्तर पर एक ही परिवार के तीन-चार बच्चे इलाज का इंतजार करते देखे गए.
कुछ परिवारों के पास तो माता-पिता का आधार कार्ड तक नहीं है. इसका मतलब है कि सरकारी योजना या स्वास्थ्य सुविधा पाने की पहली सीढ़ी पर ही ये परिवार अटक जाते हैं.
यह डेटा आंगनबाड़ी केंद्रों (यानी बच्चों के पोषण की निगरानी करने वाली सरकारी व्यवस्था) का है:
– प्रभावित इलाके के 28 आंगनबाड़ी केंद्रों में जुलाई महीने में 1,149 बच्चों का वजन किया गया
– इनमें से 213 बच्चे ‘मध्यम रूप से कम वजन’ (moderately underweight) पाए गए
– 18 बच्चे ‘गंभीर रूप से कम वजन’ (severely underweight) पाए गए
– यानी कुल मिलाकर 231 बच्चे कुपोषित निकले
गांव वालों का आरोप है कि पिछले छह महीनों से गर्भवती महिलाओं और बच्चों को ‘आहार अनुदान योजना’ के तहत मिलने वाला पोषण आहार नियमित रूप से नहीं बंटा। इस वजह से बच्चे पहले से ही कमजोर हो चुके थे, और मलेरिया, डेंगू, टाइफाइड जैसी मौसमी बीमारियां उन्हें जल्दी अपनी चपेट में ले लीं. यह भी सामने आया है कि मध्य प्रदेश के सभी सातों पोषण आहार बनाने वाले प्लांट बंद पड़े हैं, जिस वजह से आंगनबाड़ियों तक राशन ही नहीं पहुंच पा रहा.
आंकड़ों की लड़ाई और जांच शुरू
मौतों की सही संख्या को लेकर प्रशासन और गांव वालों के बीच साफ मतभेद है. प्रशासन 8 मौतों की बात मान रहा है और इसकी वजह मुख्य रूप से मलेरिया और खसरा जैसी मौसमी बीमारियां बता रहा है. वहीं गांव के लोग और स्थानीय नेता 19 से 24 बच्चों की मौत का दावा कर रहे हैं.
मामले ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है
– नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने बैहर इलाके के कुंडेकसा, अडोरी, कोरका और बोंदारी गांवों का दौरा किया और मृत बच्चों के परिवारों को 20-20 लाख रुपये मदद देने की मांग की
– आदिवासी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष विक्रांत भूरिया ने बालाघाट में 22 बच्चों की मौत का आरोप लगाया और एक खास जांच कमेटी बनाने की मांग की, साथ ही सभी आदिवासी छात्रावासों की सुरक्षा जांच की भी मांग की
इसी बीच ‘राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग’ ने भी मामले पर संज्ञान लेकर जांच शुरू कर दी है. आयोग की तीन सदस्यीय टीम ने सोनगुड्डा, बोंदारी, कुंडेकसा, कोरका, गठिया और मछुरदा गांवों का दौरा किया और वहां के स्वास्थ्य केंद्रों, आंगनवाड़ी केंद्रों और आदिवासी छात्रावासों का निरीक्षण किया. टीम ने मृत बच्चों के परिवारों से बीमारी, इलाज, टीकाकरण, पोषण और पीने के पानी को लेकर बात भी की.
दूसरी तरफ आदिवासी समाज ने लालबर्रा में एक शोक सभा की और बीमारी से मरने वाले बच्चों को श्रद्धांजलि दी. साथ ही सरकार से मुआवजे की मांग करते हुए अनिश्चितकालीन हड़ताल का ऐलान भी किया.
हजारों करोड़ की योजनाएं, फिर भी ज़मीन पर सन्नाटा
सबसे बड़ी हैरानी की बात यह है कि बैगा जैसे कमजोर आदिवासी समुदाय के लिए केंद्र और राज्य दोनों की तरफ से बड़ी योजनाएं पहले से मौजूद हैं।
केंद्र सरकार की PM-JANMAN योजना ( प्रधानमंत्री जनजाति आदिवासी न्याय महाअभियान)
– शुरुआत: 15 नवंबर 2023
– कुल बजट: 24,104 करोड़ रुपये
– इसमें केंद्र सरकार का हिस्सा: 15,336 करोड़ रुपये
– राज्यों का हिस्सा: 8,768 करोड़ रुपये
– अवधि: 2023-24 से 2025-26 तक
– मकसद: 18 राज्यों के 75 सबसे कमजोर आदिवासी समुदायों तक घर, साफ पीने का पानी, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, पोषण, रोजगार और बिजली जैसी 11 जरूरी सुविधाएं पहुंचाना
लेकिन इस योजना के लागू होने की रफ्तार खुद इसकी पोल खोलती है. इसके आवास (घर बनाने) वाले हिस्से के तहत पूरे देश में 5 लाख घर बनाने का लक्ष्य था, लेकिन अब तक सिर्फ 1.59 लाख घरों को ही मंजूरी मिल पाई है. मध्य प्रदेश में तो केंद्र द्वारा तय किए गए गांवों के बाहर भी 50,000 और परिवार मिले जो इस योजना के हकदार हैं, लेकिन उनका काम भी अटका पड़ा है.
राज्य सरकार की आहार अनुदान योजना:
– 2018 से चल रही है
– मकसद: बैगा जैसे कमजोर आदिवासी परिवारों को नियमित पोषण सहायता देना
लेकिन बालाघाट के मछुरदा, कोरका, मातला, कुंडेकसा, अडोरी और बोंदारी गांवों के लोगों का सीधा आरोप है कि पिछले छह महीनों से यहां पोषण आहार बंटना ही बंद है. साथ ही यह भी सामने आया कि मध्य प्रदेश के सभी सातों पोषण आहार बनाने वाले प्लांट बंद हो चुके हैं, और आंगनबाड़ियों तक साल भर में मुश्किल से सिर्फ 170 दिन ही राशन पहुंच पाया.
आखिर में सवाल यही है
कागज़ों पर देखें तो हजारों करोड़ रुपये की योजनाएं हैं, सैकड़ों गांवों को कवर करने के दावे हैं, और एक पूरा मंत्रालय-स्तर का अभियान चल रहा है. लेकिन बिरसा और बैहर के जंगलों में बसे बैगा परिवारों तक न समय पर पोषण आहार पहुंच रहा है, न वक्त पर इलाज.
सवाल अब भी वहीं खड़ा है.. जब योजनाएं हैं, बजट है और नीतियां हैं, तो बैगा जैसे सबसे कमजोर आदिवासी समुदाय के बच्चों को उनके अपने गांव में बुनियादी स्वास्थ्य और पोषण की सुविधाएं आखिर क्यों नहीं मिल पा रहीं?
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