विजय उरांव, रांची
क्या स्वायत्त जिला परिषदों की अहमियत कम हो गई है, या इन्हें राज्य सरकारों द्वारा जानबूझकर कमजोर किया जा रहा है. यह सवाल तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर लोकसभा क्षेत्र से सांसद टी. आर. बालू ने गृह मंत्रालय से पूछा (Q.N. 2745) था. सांसद ने केंद्र सरकार को बताया था कि जनजातीय स्वायत्त परिषदों के द्वारा केंद्र सरकार से इस बात को लेकर शिकायत की है.
सांसद ने सरकार से यह भी जानना चाहा कि अगर राज्य सरकारों द्वारा इन परिषदों की स्वायत्तता में हस्तक्षेप या कमी की शिकायतें मिली हैं, तो केंद्र सरकार ने इस दिशा में क्या सुधारात्मक कदम उठाए हैं. साथ ही, विभिन्न राज्यों में नई स्वायत्त परिषदों के गठन की लंबित मांगों और उन पर अंतिम निर्णय की समयसीमा के बारे में भी जानकारी मांगी गई.
इस पर गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने 4 अगस्त को लोकसभा में बताया कि फिलहाल असम, मेघालय, मिजोरम और त्रिपुरा में संविधान की छठी अनुसूची के तहत 10 स्वायत्त जिला परिषदें गठित हैं.
सरकार का स्पष्ट इनकार
सरकार ने कहा कि उसे ऐसी कोई शिकायत नहीं मिली है कि राज्य सरकारों द्वारा इन परिषदों की स्वायत्तता को कमजोर किया जा रहा है. इसलिए इस संबंध में केंद्र सरकार की ओर से किसी सुधारात्मक कार्रवाई का सवाल भी नहीं उठता.
बता दें, भारत के संविधान छठवीं अनुसूची के तहत जनजातीय क्षेत्रों में स्वायत्त जिला परिषद का प्रावधान है. यह एक स्वशासी संस्था है. जो कि जनजातीय समुदायों को अपनी भाषा, संस्कृति, परंपराओं, जमीन और स्थानीय प्रशासन से जुड़े मामलों में निर्णय लेने की शक्ति देता है. ऐसे में अगर इन परिषदों की स्वायत्तता कम होती है, तो इसका सीधा असर आदिवासी समुदायों के स्थानीय स्वशासन और संवैधानिक अधिकारों पर पड़ सकता है.
इन स्वायत्त परिषदों में असम की कार्बी आंगलोंग स्वायत्त परिषद, नॉर्थ कछार हिल्स स्वायत्त परिषद और बोडोलैंड टेरिटोरियल काउंसिल; मेघालय की खासी हिल्स, गारो हिल्स और जैंतिया हिल्स स्वायत्त जिला परिषद; मिजोरम की लाई, मारा और चकमा स्वायत्त जिला परिषद तथा त्रिपुरा की त्रिपुरा ट्राइबल एरियाज ऑटोनॉमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल शामिल हैं.
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