अयोध्या में रामलला के भव्य मंदिर को अब एक ऐसे प्रशासनिक चेहरे की तलाश है, जो इसके रोज़मर्रा के कामकाज को संभाल सके. श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने मुख्य कार्यकारी अधिकारी यानी सीईओ के पद के लिए बाकायदा भर्ती प्रक्रिया शुरू कर दी है, और दिलचस्प बात यह है कि यह पूरी कवायद ऐसे नाज़ुक मोड़ पर हो रही है जब मंदिर की दान-व्यवस्था खुद सवालों के घेरे में है.
पिछले शुक्रवार दिल्ली में एक अहम बैठक हुई, जहां इस नियुक्ति की निगरानी के लिए बनाई गई समिति ने तय किया कि आखिर इस कुर्सी पर बैठने का हक़दार कौन होगा. शर्तें सीधी हैं मगर सख्त भी: उम्मीदवार स्नातक हो, प्रशासन या वित्त के मैदान में कम से कम दो दशक का तजुर्बा रखता हो, और हां, अगर उसने पहले कभी किसी मंदिर का इंतज़ाम संभाला हो तो उसका पलड़ा भारी रहेगा. एक शर्त और है, जो शायद ही किसी कॉरपोरेट नौकरी के विज्ञापन में दिखे, आवेदक हिंदू आस्था का अनुयायी होना चाहिए.
18 जुलाई तक इच्छुक लोग अपनी अर्ज़ी भेज सकते हैं, और इसके लिए ट्रस्ट एक अलग ईमेल पता तैयार करवा रहा है ताकि आवेदन बिखरें नहीं, एक ही जगह जमा हों। इसके बाद जो नाम छंटनी में टिकेंगे, समिति उनसे सीधे बातचीत करेगी, मानो किसी बड़ी संस्था का साक्षात्कार पैनल हो. चुना गया शख्स फिलहाल तीन साल के लिए यह ज़िम्मेदारी संभालेगा, और शर्त यह भी है कि उसे इस दौरान अयोध्या में ही डेरा डालना होगा. यानी यह कोई दूर बैठकर चलाई जाने वाली नौकरी नहीं है।. समिति ने यह भी सोचा है कि इतनी बड़ी चयन-प्रक्रिया को संभालने के लिए एक सचिव भी नियुक्त किया जाए, ताकि कागज़ी काम और तालमेल में कोई ढिलाई न रहे.
अब सवाल उठता है कि आखिर इतनी जल्दबाजी और सतर्कता क्यों?
दरअसल, बीते कुछ हफ्तों से ट्रस्ट दान राशि में गड़बड़ी के आरोपों से जूझ रहा है, और यह मसला उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी गरमा गया है. मामले की तह तक जाने के लिए विशेष जांच दल यानी एसआईटी जुटी हुई है, और हाल ही में पुलिस ने इस प्रकरण के एक मुख्य आरोपी अनुकल्प मिश्रा से हिरासत में सख्ती से पूछताछ भी की.
इन सबके बीच ट्रस्ट के सदस्य महंत दिनेंद्र दास ने डैमेज कंट्रोल की कोशिश की. उन्होंने भरोसा दिलाया कि मंदिर का रोज़मर्रा का कामकाज पूरी तरह सामान्य है, पुलिस और प्रशासन इस मसले पर पूरी तरह चौकस हैं, और जो भी दोषी होगा, कानून उसे बख्शेगा नहीं. साथ ही उन्होंने वीआईपी दर्शन पास को लेकर उड़ी अफवाहों को भी सिरे से नकार दिया.
दूसरी ओर, राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा ने भी इस पूरे घटनाक्रम पर अपनी बात रखी. उन्होंने साफ किया कि आने वाला सीईओ सिर्फ प्रशासनिक कामकाज देखेगा, जबकि असली फैसले ट्रस्ट के हाथ में ही रहेंगे. उन्होंने यह भी जोड़ा कि चयन प्रक्रिया से उनका कोई सीधा वास्ता नहीं है, क्योंकि यह काम तीन सदस्यों की एक अलग समिति देख रही है.
इस पूरे विवाद का एक और अध्याय अब सुप्रीम कोर्ट में खुलने वाला है, जहां ट्रस्ट की वित्तीय गड़बड़ियों की स्वतंत्र जांच की मांग वाली याचिकाओं पर सुनवाई तय है. यानी एक तरफ मंदिर प्रशासन को पेशेवर बनाने की कोशिश हो रही है, तो दूसरी तरफ अदालत के फैसले पर भी सबकी निगाहें टिकी हैं. आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि रामलला के इस भव्य धाम की बागडोर किसके हाथों में जाती है.
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