Gumla : गुमला में प्रकृति पर्व सरहुल को लेकर तैयारियां पूरी हो चुकी हैं। यह पर्व आदिवासी समाज की आस्था, संस्कृति और प्रकृति से जुड़ाव का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है। सरहुल को सूर्य और धरती के विवाह उत्सव के रूप में मनाया जाता है और इसे नया वर्ष भी माना जाता है।
प्रकृति और आस्था का संगम है सरहुल
स्थानीय लोगों के अनुसार सरहुल सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति आस्था और सम्मान का प्रतीक है। इस मौके पर सरना स्थल में विशेष पूजा कर वर्षा और खेती-बाड़ी का अनुमान भी लगाया जाता है। समाज के लोगों ने बताया कि यह पर्व हमें प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन जीने का संदेश देता है।
एकता और संस्कृति का संदेश देता है पर्व
केंद्रीय सरहुल संचालन समिति के सचिव दीपनारायण उरांव ने बताया कि सरहुल को खद्दी भी कहा जाता है। उन्होंने कहा कि यह पर्व समाज को एकता के सूत्र में बांधता है। पूर्व संध्या पर पारंपरिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जिसमें लोग अपनी पारंपरिक वेशभूषा में एक साथ जुटते हैं। यह दृश्य पूरे समाज की एकजुटता को दर्शाता है।
पर्यावरण संरक्षण पर खास जोर
दीपनारायण उरांव ने कहा कि आदिवासी समाज हमेशा से प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण से जुड़ा रहा है। आज जब पूरा विश्व पर्यावरण बचाने की बात कर रहा है, तो आदिवासी समाज यह काम सदियों से करता आ रहा है। उन्होंने कहा कि प्रकृति से छेड़छाड़ का असर अब बीमारियों के रूप में सामने आ रहा है, इसलिए सभी को पर्यावरण संरक्षण पर ध्यान देना चाहिए।
21 मार्च को निकलेगा भव्य जुलूस
गुमला में 21 मार्च को सरहुल महोत्सव और सांस्कृतिक जुलूस निकाला जाएगा। पूजा कार्यक्रम सुबह 11 बजे शुरू होगा और एक बजे प्रसाद वितरण किया जाएगा। दोपहर दो बजे से भव्य जुलूस उरांव क्लब दुंदुरिया से शुरू होकर शहर के विभिन्न मार्गों से गुजरते हुए वापस समाप्त होगा। जुलूस में कई मार्गों से खोड़हा दल शामिल होंगे और उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले दलों को पुरस्कार भी दिया जाएगा।
नशा और डीजे पर पूरी तरह रोक
समिति ने स्पष्ट किया है कि इस बार जुलूस में डीजे, नशापान और अबीर के उपयोग पर पूरी तरह रोक रहेगी। आयोजन को पारंपरिक और सांस्कृतिक स्वरूप में ही मनाया जाएगा।
नेताओं और युवाओं ने दी प्रकृति बचाने की अपील
आदिवासी युवा नेता कृष्णा उरांव ने कहा कि सरहुल हमें प्रकृति की रक्षा का संदेश देता है। उन्होंने कहा कि आज जो बीमारियां बढ़ रही हैं, उसका कारण प्रकृति से छेड़छाड़ है। वहीं मिशिर कुजूर ने कहा कि सरहुल आदिवासी समाज का महत्वपूर्ण पर्व है, जिसमें साल वृक्ष और सरई फूल की पूजा की जाती है। यह पर्व हमें धरती और सूर्य के संतुलन का संदेश देता है।
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