Ranchi : झारखंड विधानसभा के बजट सत्र में बालू घाटों के श्रेणीकरण और आदिवासी क्षेत्रों में ग्राम सभा की अनदेखी का मुद्दा जोर-शोर से गूंजा। नमन विक्सल कोंगाड़ी ने मुद्दा उठाकर सरकार को घेरते हुए आदिवासियों के आर्थिक हितों की रक्षा की मांग की।
आदिवासियों को हो रहा नुकसान
ने सदन में कहा कि पूर्ववर्ती बीजेपी सरकार के दौरान बनाए गए नियम आदिवासी समुदाय के लिए भारी नुकसानदायक साबित हुए हैं। उन्होंने बताया कि पेसा नियमावली के स्पष्ट प्रावधानों के बावजूद बालू घाटों का श्रेणीकरण करते समय ग्राम सभाओं से अनुमति नहीं ली गई। उन्होंने सरकार से मांग की कि बालू उपलब्ध कराने की प्रक्रिया में स्थानीय आदिवासियों को प्राथमिकता दी जाए, ताकि उनका लाभ सीधे उन्हें मिले और बाहरी लोग इसका फायदा न उठा सकें।
सरकार का जवाब
सरकार की ओर से योगेंद्र महतो ने जवाब दिया कि 2018 में बालू घाट बिना किसी विशेष श्रेणी के लघु खनिज के तहत आते थे। उन्होंने सदन को आश्वस्त किया कि झारखंड नियमावली 2025 पूरी तरह प्रभावी है। मंत्री ने बताया कि वर्तमान नियमों के तहत बिना ग्राम सभा की सहमति के बालू घाटों का आवंटन आगे नहीं बढ़ाया जाएगा। सरकार नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित कर रही है।
नमन विक्सल का तीखा सवाल
नमन विक्सल ने सवाल उठाया कि क्या सरकार बालू घाटों की श्रेणी 1 और 2 को खत्म करने का इरादा रखती है। उन्होंने आरोप लगाया कि नीलामी के लिए रखी गई टेंडर शर्तों को अनुसूचित समुदाय के लोग तकनीकी और आर्थिक रूप से पूरा नहीं कर पा रहे हैं। इसका सीधा नुकसान यह हो रहा है कि घाटों का लाभ बाहरी लोग उठा रहे हैं, जबकि स्थानीय आदिवासी हाथ मलते रह जाते हैं। उन्होंने कहा कि नियमों का सही पालन और स्थानीय आदिवासियों को प्राथमिकता देने से उनके आर्थिक हितों की रक्षा हो सकती है।
आदिवासियों के हित पर जोर
इस पूरे मुद्दे ने बजट सत्र में गहमागहमी बढ़ा दी। आदिवासी क्षेत्रों में ग्राम सभा की अनदेखी और बालू घाटों की नीलामी को लेकर सदन में विपक्ष और सरकार के बीच लंबी बहस हुई।
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