मानसून की पहली बारिश होते ही झारखंड के जंगलों से रुगड़ा निकलना शुरू हो जाता है. कुछ ही हफ्तों तक मिलने वाला यह जंगली खाद्य कवक लोगों की पहली पसंद होता है. स्वाद ऐसा कि लोग सालभर इसका इंतजार करते हैं और कीमत कई बार 500 से 1600 रुपये किलो तक पहुंच जाती है. इसके बावजूद झारखंड की पहचान बन चुके रुगड़ा को अब तक GI (जियोग्राफिकल इंडिकेशन) टैग नहीं मिल पाया है.
झारखंड सरकार की संस्था सिद्धो कान्हो एग्रीकल्चर एंड फॉरेस्ट प्रोड्यूस स्टेट को-ऑपरेटिव फेडरेशन लिमिटेड (SIDHKOFED) ने 25 नवंबर 2024 को “Rugda of Jharkhand” के नाम से GI टैग के लिए आवेदन किया था. लेकिन आवेदन की जांच के दौरान GI रजिस्ट्री ने 24 बिंदुओं पर आपत्तियां जताते हुए कई दस्तावेज और वैज्ञानिक प्रमाण मांगे हैं. फिलहाल आवेदन प्री-एग्जामिनेशन (Pre-Examination) चरण में है और इन्हीं कमियों को दूर करने के बाद ही आगे की प्रक्रिया बढ़ेगी.
आखिर रुगड़ा क्या है और झारखंड में इतना खास क्यों है?
रुगड़ा एक जंगली खाद्य कवक (वाइल्ड मशरूम) है. लेकिन यह बाजार में मिलने वाले सामान्य मशरूम जैसा नहीं होता. इसकी खेती नहीं होती. यह सिर्फ मानसून में साल (सखुआ) के जंगलों की मिट्टी के नीचे अपने आप उगता है. सही बारिश, नमी और जंगल का माहौल मिलने पर ही यह निकलता है.
रांची, खूंटी, गुमला, सिमडेगा, लोहरदगा, पश्चिमी सिंहभूम और लातेहार जैसे जिलों में आदिवासी समुदाय पीढ़ियों से जंगलों से रुगड़ा इकट्ठा करता आ रहा है. उन्हें अनुभव से पता होता है कि किस जंगल और किस तरह की मिट्टी में रुगड़ा मिलने की संभावना ज्यादा होती है. यही पारंपरिक ज्ञान इसे खास बनाता है. बरसात के दिनों में हजारों ग्रामीण परिवार, खासकर महिलाएं, रुगड़ा बेचकर अच्छी आमदनी भी करती हैं.
फिर GI टैग मिलने में अड़चन कहां है?
जीआई टैग सिर्फ किसी उत्पाद के मशहूर होने से नहीं मिलता. इसके लिए यह साबित करना पड़ता है कि उसकी खास पहचान और गुणवत्ता किसी खास भौगोलिक क्षेत्र से जुड़ी है.
आवेदन में GI रजिस्ट्री ने पूछा है कि “रुगड़ा ऑफ झारखंड” दूसरे राज्यों में मिलने वाले रुगड़ा से कैसे अलग है. साथ ही झारखंड की मिट्टी, जलवायु, साल के जंगल और यहां के पारंपरिक ज्ञान का रुगड़ा की गुणवत्ता से क्या संबंध है, इसका वैज्ञानिक आधार भी मांगा गया है.
इसके अलावा रजिस्ट्री ने गजेटियर, शोध पत्र, प्रकाशित किताबें, सरकारी रिकॉर्ड और अन्य ऐतिहासिक दस्तावेज भी मांगे हैं, ताकि यह साबित हो सके कि रुगड़ा का झारखंड से पुराना और विशिष्ट संबंध है.
24 सवालों का जवाब मिलने के बाद ही बढ़ेगी प्रक्रिया
रूगड़ा को लेकर GI रजिस्ट्री ने SIDHKOFED से यह भी पूछा है कि वह रुगड़ा उत्पादकों का प्रतिनिधित्व कैसे करती है. उत्पादकों की सूची, उत्पादन क्षेत्र का अधिकृत नक्शा, पारंपरिक संग्रहण की विधि, सालाना उत्पादन, गुणवत्ता नियंत्रण की व्यवस्था और GI मिलने के बाद निरीक्षण तंत्र का पूरा खाका भी मांगा गया है.
यानी रुगड़ा को GI टैग इसलिए नहीं मिला है क्योंकि आवेदन अभी जांच के दौर में है. GI रजिस्ट्री की ओर से बताई गई 24 कमियों को दूर करने और सभी जरूरी वैज्ञानिक, ऐतिहासिक व कानूनी दस्तावेज जमा होने के बाद ही “रुगड़ा ऑफ झारखंड” के आवेदन पर आगे की कार्रवाई होगी.
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