सरकार मंदिर की संपत्ति की मालिक नहीं, बल्कि उसकी संरक्षक है. वह मंदिर की जमीन को अपने नाम नहीं करा सकती और न ही ट्रस्टी को ऐसी संपत्ति दान करने का अधिकार है. यह कहते हुए सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु में मंदिर की जमीन पर तहसील कार्यालय बनाने के लिए की गई गिफ्ट डीड को रद्द कर दिया. साथ ही राज्य सरकार को मंदिर को हर महीने 31 हजार रुपये किराया देने और एक लाख रुपये जुर्माना भरने का आदेश दिया है.
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए यह आदेश दिया. मामला तमिलनाडु के इरोड जिले के नागपालायम मरियम्मन-पोन्नाचियम्मन मंदिर की एक एकड़ 10 डिसमिल जमीन से जुड़ा है.
ट्रस्टी ने सरकार को दान कर दी थी जमीन
मंदिर के अस्थायी ट्रस्टी ने 30 अगस्त 2017 को तहसील कार्यालय बनाने के लिए जमीन राज्य सरकार को दान कर दी थी. इस फैसले को चुनौती दी गई थी. मार्च 2019 में मद्रास हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी थी. हाईकोर्ट का कहना था कि संबंधित कानून की धारा 34 में गिफ्ट का स्पष्ट उल्लेख नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने स्वीकार किया कि जमीन देवता के भरण-पोषण और मंदिर के रखरखाव के लिए दी गई इनाम संपत्ति थी. सरकार ने यह भी माना कि तमिलनाडु हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम, 1959 की धारा 41 के तहत ऐसी जमीन दान नहीं की जा सकती.
मंदिर की संपत्ति का मालिक नहीं है राज्य
सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, मंदिर की संपत्ति पर सरकार का नियंत्रण उसे उसका मालिक नहीं बना देता. देवता को समर्पित संपत्ति देवता और श्रद्धालुओं के हितों के लिए होती है. इसे कोई ट्रस्टी अपनी मर्जी से दान नहीं कर सकता.
कोर्ट के अनुसार, कानून की धारा 41 मंदिर के रखरखाव के लिए दी गई इनाम जमीन को दान करने पर रोक लगाती है. ऐसी गिफ्ट डीड को बाद में सरकारी मंजूरी देकर भी वैध नहीं बनाया जा सकता.
अदालत ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक उद्देश्य का हवाला देकर मंदिर की जमीन सरकार के नाम नहीं की जा सकती. ट्रस्टी की जिम्मेदारी है कि वह मंदिर की संपत्ति का इस्तेमाल उसके हित में करे, न कि बिना किसी प्रतिफल के उसे दान कर दे.
सरकार को 31 हजार रुपये महीने देना होगा किराया
सुप्रीम कोर्ट ने गिफ्ट डीड रद्द कर दी, लेकिन वहां बने तहसील कार्यालय को हटाने का आदेश नहीं दिया. सरकारी धन से भवन बन चुका है और उसका इस्तेमाल प्रशासनिक कामकाज में हो रहा है. ऐसे में कोर्ट ने सरकार को जमीन का किराया देने का निर्देश दिया.
पहले जमीन का मासिक किराया 13,235 रुपये तय किया गया था. कोर्ट ने जमीन और भवन का कुल मूल्य करीब 3.04 करोड़ रुपये मानते हुए किराया बढ़ाकर 31 हजार रुपये प्रति माह कर दिया. यह किराया 8 मार्च 2019 से लागू होगा. सरकार को पहले किए गए भुगतान का मिलान करने के बाद बकाया राशि तीन महीने में चुकानी होगी.
कोर्ट ने किराये में हर तीन साल पर संशोधन करने और इसे 31 हजार रुपये से कम नहीं रखने का निर्देश दिया. लीज की अवधि और दूसरी शर्तें मंदिर ट्रस्ट तय करेगा. साथ ही सरकार को मंदिर को एक लाख रुपये जुर्माना भी देना होगा.
अदालत ने राज्य सरकार और संबंधित विभाग को धार्मिक संस्थानों की संपत्ति से जुड़े लेनदेन में कानून का सख्ती से पालन करने का निर्देश दिया. कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में मंदिर के हितों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए, न कि सरकार की प्रशासनिक सुविधा को.
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