JoharLive : आस्था, श्रद्धा और भव्यता का प्रतीक अयोध्या का राम मंदिर पिछले कुछ समय से एक बड़े विवाद का केंद्र बना हुआ है। पहले जमीन खरीद को लेकर सवाल उठे, फिर मंदिर में आने वाले चढ़ावे और दान में कथित गड़बड़ी के आरोप सामने आए। इन आरोपों ने न सिर्फ ट्रस्ट की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए, बल्कि सियासत को भी गरमा दिया। समाजवादी पार्टी के नेता पवन पांडेय, पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव, ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और बीजेपी नेता रजनीश सिंह के बयानों ने इस पूरे मामले को और बड़ा बना दिया। अब यह मुद्दा सिर्फ पैसे का नहीं, बल्कि पारदर्शिता, भरोसे और राजनीतिक जवाबदेही का बन गया है।
साल 2021 में शुरु हुआ मामला
इस पूरे विवाद की पहली कड़ी 2021 में जुड़ी, जब राम मंदिर निर्माण के लिए जमीन खरीद पर आरोप लगे। कहा गया कि कुछ जमीनों के सौदे बहुत कम समय में कई गुना महंगे भाव पर किए गए। खास तौर पर 18 मार्च 2021 के सौदों को लेकर सबसे ज्यादा सवाल उठे। आरोप यह था कि एक जमीन पहले करीब 2 करोड़ रुपये में खरीदी गई और फिर कुछ ही वक्त के भीतर उसी जमीन से जुड़े दूसरे सौदे में उसकी कीमत 18.5 करोड़ रुपये तक पहुंच गई। यह दावा सामने आने के बाद विपक्ष ने इसे सीधा घोटाला करार दिया। समाजवादी पार्टी के नेता पवन पांडेय ने इस सौदे को आधार बनाकर ट्रस्ट पर गंभीर सवाल उठाए।
इस आरोप के बाद मामला सिर्फ बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा। विपक्ष ने दस्तावेजों, टाइमिंग और गवाहों का हवाला देकर सवाल उठाए। कांग्रेस ने भी इस मुद्दे पर सख्त रुख अपनाया और सुप्रीम कोर्ट से हस्तक्षेप तक की मांग कर दी। दूसरी तरफ, श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया। उनका कहना था कि ट्रस्ट ने जो भी जमीनें खरीदी हैं, वे खुले बाजार से कम कीमत पर ली गई हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उन पर पहले भी कई आरोप लगे हैं, लेकिन वे उनसे डरने वाले नहीं हैं।
साल 2026 में खड़ा हुआ नया विवाद
2021 का जमीन विवाद धीरे-धीरे ठंडा पड़ा, लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। इस बीच मंदिर का निर्माण आगे बढ़ता रहा और 2024 में राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा भी हो गई। इसके बाद ऐसा लगा कि शायद विवाद पीछे छूट जाएगा, लेकिन 2026 में एक नया आरोप सामने आया और पुराने सवाल फिर से चर्चा में आ गए। इस बार मामला जमीन नहीं, बल्कि मंदिर में आने वाले चढ़ावे और दान की रकम से जुड़ा था। जून 2026 की शुरुआत में रिपोर्टें आईं कि राम मंदिर परिसर में दान की राशि में कथित गड़बड़ी हुई है। कुछ खबरों में दावा किया गया कि ऑडिट और CCTV जांच के बाद झोलझाल के संकेत मिले हैं। कथित तौर पर कुछ कर्मचारियों पर शक हुआ और नकदी बरामद होने की बातें भी सामने आईं। इसी के बाद इस विवाद ने तूल पकड़ लिया।
इस नए आरोप को सबसे पहले राजनीतिक रंग समाजवादी पार्टी ने ही दिया। पवन पांडेय ने दावा किया कि राम मंदिर के चढ़ावे में 5 से 7.5 करोड़ रुपये तक की कथित चोरी हुई है। यह बयान सामने आते ही हंगामा मच गया। इसके बाद सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने भी इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया। उन्होंने कहा कि अगर मंदिर के चढ़ावे में ही गड़बड़ी हो रही है, तो यह बेहद गंभीर बात है। अखिलेश ने इसे सिर्फ आर्थिक गड़बड़ी नहीं, बल्कि आस्था और व्यवस्था दोनों पर चोट बताया। उनकी भाषा काफी तीखी रही और उन्होंने इस पूरे प्रकरण को “राष्ट्र की लूट” जैसे शब्दों से जोड़ दिया।
बीजेपी नेता ने भी कर दी जांच की मांग
इस बीच बीजेपी नेता रजनीश सिंह ने पीएम नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर इस मामले की जांच सीबीआई या किसी केंद्रीय एजेंसी से कराने की मांग की। यह कदम इसलिए अहम माना गया, क्योंकि यह संदेश गया कि मामला सिर्फ विपक्ष और सत्ता पक्ष नहीं है, बल्कि आरोप इतने गंभीर हैं कि अपने पार्टी के लोग भी जांच की जरूरत महसूस कर रहे हैं। इसके बाद जांच की चर्चा और तेज हो गई। फिर SIT जांच शुरू हुई और ट्रस्ट से जुड़े कुछ लोगों से पूछताछ भी हुई। चंपत राय और अन्य लोगों के नाम भी इस पूछताछ में सामने आए।
अब सवाल यह है कि असल मुद्दा क्या है। असल मुद्दा केवल इतना नहीं कि कितने रुपये गायब हुए या किसने क्या कहा। असली सवाल यह है कि क्या इतने बड़े और संवेदनशील धार्मिक प्रोजेक्ट में हिसाब-किताब की व्यवस्था मजबूत थी या नहीं। मंदिर जैसे पवित्र स्थल पर आने वाला हर एक रुपया लोगों की भावनाओं से जुड़ा होता है। ऐसे में अगर पारदर्शिता पर जरा भी शक हो, तो विवाद बहुत तेजी से फैलता है। यही इस मामले में भी हुआ। जमीन खरीद वाले आरोप ने पहले भरोसे को चोट पहुंचाई, और दान वाले आरोप ने उसी भरोसे की बची-खुची जमीन को भी हिला दिया।
फिलहाल जो तस्वीर सामने आयी है, वह अधूरी है लेकिन गंभीर है। 2021 का जमीन विवाद पूरी तरह खत्म नहीं हुआ था कि 2026 में दान का विवाद उससे जुड़ गया। पवन पांडेय ने दोनों बार आरोपों की आग को हवा दी, अखिलेश यादव ने उसे राजनीतिक मुद्दा बनाया, चंपत राय ने ट्रस्ट की तरफ से बचाव किया, और जांच एजेंसियां अब मामले की परतें खोल रही हैं। जब तक जांच पूरी नहीं होती, तब तक किसी नतीजे पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।
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