राँची: भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम) राँची में ‘मेकर्स ऑफ मॉडर्न इंडिया’ व्याख्यान शृंखला के पाँचवें संस्करण का आयोजन किया गया. इस दौरान भारत के पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री के जीवन, विचारों और सिद्धांतों के माध्यम से नेतृत्व तथा नैतिक मूल्यों की भूमिका पर चर्चा हुई.
कार्यक्रम में लाल बहादुर शास्त्री के पुत्र और पूर्व केंद्रीय मंत्री अनिल शास्त्री मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए. ‘द प्री-पॉलिटिकल मोरल फाउंडेशन ऑफ द रिपब्लिक: री-रीडिंग लाल बहादुर शास्त्री’ विषय पर आयोजित परिचर्चा में उन्होंने अपने पिता के जीवन से जुड़े व्यक्तिगत और ऐतिहासिक प्रसंग साझा किए.
परिचर्चा में नेतृत्व कौशल, व्यक्तिगत ईमानदारी, नैतिकता और सार्वजनिक जीवन में मूल्यों की प्रासंगिकता पर जोर दिया गया. वक्ताओं ने कहा कि प्रभावी नेतृत्व के लिए केवल प्रबंधन कौशल और निर्णय लेने की क्षमता पर्याप्त नहीं है, बल्कि नैतिक दृष्टिकोण, जिम्मेदारी की भावना और दूसरों के प्रति संवेदनशीलता भी जरूरी है.
प्रबंधन में सफलता के साथ नैतिक मूल्यों का होना जरूरी
कार्यक्रम के समन्वयक प्रो. जॉर्ज जोसेफ ने स्वागत संबोधन में ‘मेकर्स ऑफ मॉडर्न इंडिया’ व्याख्यान शृंखला के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि यह पहल आधुनिक भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले व्यक्तित्वों के विचारों और विरासत को समझने का अवसर प्रदान करती है. उन्होंने राजनीतिक और सामाजिक जीवन में नैतिक दृढ़ता तथा मूल्यों को महत्वपूर्ण बताया.
आईआईएम राँची के निदेशक प्रो. दीपक कुमार श्रीवास्तव ने कहा कि प्रबंधन शिक्षा में व्यावसायिक रणनीति और परिचालन संबंधी सफलता पर व्यापक चर्चा होती है, लेकिन किसी भी संस्थान की दीर्घकालिक सफलता उसके मूल सिद्धांतों और नैतिक मूल्यों पर निर्भर करती है.
उन्होंने महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री के विचारों का उल्लेख करते हुए ‘ट्रस्टीशिप’ यानी न्यासिता की अवधारणा को रेखांकित किया. उन्होंने कहा कि पद, शक्ति, संपत्ति और संसाधनों को केवल व्यक्तिगत स्वामित्व के रूप में देखने के बजाय समाज के प्रति उत्तरदायित्व के रूप में देखा जाना चाहिए. यही दृष्टिकोण नेतृत्व को नैतिक दिशा प्रदान करता है.
लाल बहादुर शास्त्री के जीवन से नेतृत्व के सबक
सत्र को संबोधित करते हुए अनिल शास्त्री ने अपने पिता के जीवन, कार्यशैली और सिद्धांतों से जुड़े कई व्यक्तिगत और ऐतिहासिक प्रसंग साझा किए. उन्होंने कहा कि प्रभावी नेतृत्व के लिए विचारों की स्पष्टता, सहकर्मियों की प्रकृति और आवश्यकताओं को समझना, समय पर निर्णय लेना तथा निरंतर विचारशील बने रहना आवश्यक है. एक कुशल नेतृत्वकर्ता को अपनी टीम के प्रत्येक सदस्य की विशिष्टता पहचानते हुए उसके विकास में सहयोग करना चाहिए.
लाल बहादुर शास्त्री के जीवन का उल्लेख करते हुए उन्होंने उनकी सादगी, विनम्रता और बौद्धिक ईमानदारी को नेतृत्व के महत्वपूर्ण गुण बताया. उन्होंने ऐसे प्रसंग साझा किए, जिनमें राजनीतिक मतभेदों के बावजूद शास्त्री जी अपने विरोधियों को उचित सलाह देने और उनसे संवाद करने के लिए तैयार रहते थे.
अनिल शास्त्री ने बताया कि प्रधानमंत्री बनने के बाद भी लाल बहादुर शास्त्री अपने बेटे का स्कूल रिपोर्ट कार्ड लेने स्वयं गए थे. यह प्रसंग उनकी सादगी और कर्तव्यनिष्ठा को दर्शाता है. उनके जीवन से जुड़े ऐसे उदाहरण बताते हैं कि सार्वजनिक पद पर पहुंचने के बाद भी व्यक्तिगत जिम्मेदारियों और मूल्यों को महत्व देना जरूरी है.
उन्होंने वर्ष 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान लाल बहादुर शास्त्री द्वारा लिए गए निर्णायक फैसलों का भी उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि संकट की परिस्थितियों में स्पष्ट सोच, साहस और समय पर निर्णय लेने की क्षमता नेतृत्व की कसौटी होती है.
अनिल शास्त्री ने विद्यार्थियों को सलाह दी कि वे केवल प्रबंधक बनने तक सीमित न रहें, बल्कि विचारशील, संवेदनशील और नैतिक नेतृत्वकर्ता बनने का प्रयास करें. कार्यक्रम में लाल बहादुर शास्त्री के जीवन और सिद्धांतों के जरिए आधुनिक प्रबंधन, नेतृत्व और सार्वजनिक जीवन में नैतिक मूल्यों की प्रासंगिकता को रेखांकित किया गया.
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