पारंपरिक थाप बिखेरता मांदर, कला और संस्कृति की अनूठी बानगी पेश करता डोकरा क्राफ्ट, आदिवासी आभूषण और टसर सिल्क… झारखंड की सांस्कृतिक और पारंपरिक पहचान को वैश्विक पटल पर दर्ज कराने वाले इन गौरवशाली उत्पादों के बाद, अब राज्य के जंगल, करघे और रसोई के कई अन्य अनमोल उत्पाद भी जीआई (भौगोलिक संकेत) टैग की कतार में हैं.
खूँटी की ‘करनी शॉल’ से लेकर बरसात के मौसम में जंगलों से मिलने वाले ‘रुगड़ा’ और हर घर की रसोई की शान ‘धुस्का’ तक—फिलहाल छह ऐसे स्थानीय उत्पाद हैं, जिन्हें आधिकारिक जीआई पहचान मिलने का इंतज़ार है.
छह उत्पाद कतार में
झारखंड की पहचान सिर्फ खनिज और जंगलों से नहीं है. यहाँ के करघों पर बुनी साड़ियां और शॉल, जंगल से मिलने वाला महुआ और रुगड़ा, करंज के बीज और घर-घर की रसोई में बनने वाला धुस्का भी राज्य की अपनी विशिष्ट पहचान हैं. अब इन स्थानीय उत्पादों को देश-दुनिया में झारखंड के नाम से पुख्ता पहचान दिलाने की कोशिश हो रही है. इन छह उत्पादों के लिए भौगोलिक संकेत यानी जीआई टैग के आवेदन दर्ज हैं, लेकिन अभी किसी को अंतिम जीआई टैग नहीं मिला है.
भारतीय बौद्धिक संपदा कार्यालय यानी आईपी इंडिया के रिकॉर्ड के मुताबिक खूँटी की करनी शॉल और झारखंड लाल फड़िया साड़ी एवं फैब्रिक्स के आवेदन अभी एग्जामिनेशन स्टेज में हैं. वहीं महुआ फूल, रुगड़ा, धुस्का और करंज बीज के आवेदन प्री-एग्जामिनेशन स्टेज में हैं. यानी इन उत्पादों के लिए कानूनी प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, लेकिन इन्हें अभी जीआई प्राप्त उत्पादों की सूची में शामिल नहीं किया गया है.
खूँटी की करनी शॉल
इन छह उत्पादों में खूँटी की करनी शॉल का आवेदन सबसे पहले दर्ज हुआ. 21 मई 2024 को झारखंड सिल्क टेक्सटाइल एंड हैंडीक्राफ्ट डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड यानी झारक्राफ्ट ने इसका आवेदन किया. इसका आवेदन नंबर 1252 है और फिलहाल इसकी स्थिति Examination है. आवेदन टेक्सटाइल श्रेणी में है.
जीआई आवेदन में उत्पाद की पहचान, उत्पादन से जुड़े दस्तावेज और इसके भौगोलिक जुड़ाव से संबंधित सामग्री शामिल की गई है. जीआई मिलने पर खूँटी की इस पारंपरिक शॉल को उसके क्षेत्र से जुड़ी आधिकारिक और कानूनी पहचान मिलेगी.
लाल फड़िया साड़ी की भी पहचान की कोशिश
झारखंड लाल फड़िया साड़ी और फैब्रिक्स के लिए 15 जुलाई 2024 को आवेदन किया गया. इसका आवेदन नंबर 1319 है. आवेदन रांची की संस्था MAI यानी Mother Assisting Innovation ने किया है. आईपी इंडिया के रिकॉर्ड में इसकी स्थिति फिलहाल Examination दर्ज है.
आवेदन में उत्पाद के स्पेसिफिकेशन, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, भौगोलिक क्षेत्र, उत्पादन की विधि और विशिष्टता से जुड़े दस्तावेज जमा किए गए हैं. यानी इस उत्पाद को सिर्फ एक कपड़े के तौर पर नहीं, बल्कि एक खास भौगोलिक क्षेत्र से जुड़ी पारंपरिक पहचान के तौर पर स्थापित करने की कोशिश की जा रही है.
जंगल से निकलने वाला महुआ फूल
झारखंड के गांवों और जंगलों की अर्थव्यवस्था में महुआ का अलग महत्व है. महुआ के फूल का इस्तेमाल पारंपरिक खानपान में होता है और इसकी बिक्री से ग्रामीण परिवारों को महत्वपूर्ण आय भी मिलती है.
महुआ फ्लावर ऑफ झारखंड के लिए 1 अक्टूबर 2024 को जीआई आवेदन दर्ज किया गया. इसका आवेदन नंबर 1372 है और इसे SIDHKOFED यानी सिधो-कान्हू एग्रीकल्चर एंड फॉरेस्ट प्रोड्यूस स्टेट को-ऑपरेटिव फेडरेशन लिमिटेड ने दाखिल किया है. अभी इसकी स्थिति Pre Examination है.
इस आवेदन के साथ उत्पाद से जुड़े कई दस्तावेज जमा किए गए हैं. यानी महुआ को झारखंड की भौगोलिक पहचान से जोड़कर जीआई सुरक्षा दिलाने की प्रक्रिया अभी शुरुआती चरण में है.
रुगड़ा, जो सिर्फ बरसात में जंगल देता है
झारखंड के पारंपरिक खानपान में रुगड़ा की खास जगह है. यह सामान्य तौर पर बाजार में मिलने वाली खेती की गई सब्जी या मशरूम नहीं है. बरसात के मौसम में जंगलों से मिलने वाला यह अनमोल उत्पाद स्थानीय लोगों के लिए स्वाद के साथ-साथ कमाई का भी जरिया है.
रुगड़ा ऑफ झारखंड के लिए 25 नवंबर 2024 को आवेदन किया गया. इसका आवेदन नंबर 1384 है. आवेदन SIDHKOFED ने किया है और फिलहाल इसकी स्थिति Pre Examination है.
रुगड़ा की कहानी इसलिए भी खास है क्योंकि इसकी पहचान सीधे तौर पर जंगल और स्थानीय समुदायों से जुड़ी है. जीआई आवेदन के जरिए इसी स्थानीय विरासत को औपचारिक दर्जा दिलाने की कोशिश की जा रही है.
धुस्का, झारखंड की थाली की पहचान
झारखंड के पारंपरिक खाने की बात हो और धुस्का का नाम न आए, ऐसा मुश्किल है. चावल और दाल के मिश्रण से तैयार होने वाला यह व्यंजन राज्य की पहचान बन चुका है. घरों से लेकर बाजारों और मेलों तक इसकी मौजूदगी दिखती है.
धुस्का ऑफ झारखंड के लिए 15 जनवरी 2025 को जीआई आवेदन दर्ज हुआ. आवेदन नंबर 1420 है. इसे मुख्यमंत्री लघु एवं कुटीर उद्यम विकास बोर्ड ने दाखिल किया है. आईपी इंडिया के रिकॉर्ड में इसकी स्थिति फिलहाल Pre Examination है और इसे खाद्य उत्पादों की श्रेणी में रखा गया है.
आवेदन में धुस्का की विशिष्टता और उसके भौगोलिक जुड़ाव से संबंधित दस्तावेज भी शामिल हैं. अगर प्रक्रिया पूरी होती है तो झारखंड के इस पारंपरिक व्यंजन को भी राज्य से जुड़ी आधिकारिक जीआई पहचान मिल जाएगी.
करंज बीज भी जीआई की कतार में
झारखंड में पाए जाने वाले करंज के पेड़ के बीज का भी अपना पारंपरिक और आर्थिक महत्व है. इसके बीज से तेल निकाला जाता है और इसका इस्तेमाल पारंपरिक तथा अन्य उपयोगों में किया जाता है.
झारखंड करंज बीज के लिए भी 15 जनवरी 2025 को आवेदन दर्ज किया गया. इसका आवेदन नंबर 1421 है. इसे SIDHKOFED ने दाखिल किया है. आईपी इंडिया के मुताबिक आवेदन फिलहाल Pre Examination स्टेज में है.
आवेदन में उत्पादन क्षेत्र, भौगोलिक नक्शा, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, विशिष्टता, खेती की विधि और निरीक्षण व्यवस्था से जुड़े दस्तावेज शामिल किए गए हैं.
पहले ही जीआई पहचान पा चुके हैं झारखंड के ये उत्पाद
झारखंड के लिए जीआई टैग की यह कोशिश कोई नई नहीं है. राज्य के कई पारंपरिक उत्पादों को पहले ही जीआई रजिस्ट्रेशन मिल चुका है.
इनमें झारखंड का मांदर, झारखंड डोकरा क्राफ्ट, झारखंड की आदिवासी ज्वेलरी, झारखंड के बांस शिल्प, झारखंड टसर सिल्क साड़ियां और फैब्रिक्स, झारखंड जादुपटुआ पेंटिंग, झारखंड पंछी परहान-पंछी साड़ी और फैब्रिक्स तथा झारखंड बेनाम वाद्य यंत्र शामिल हैं.
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