भारत के स्पेस सेक्टर में एक बड़ा और ऐतिहासिक बदलाव होने जा रहा है। इसरो अब खुद कोई लॉन्च व्हीकल यानी रॉकेट नहीं बनाएगा. यह पूरी जिम्मेदारी अब प्राइवेट कंपनियों और सरकारी उपक्रमों यानी PSU को सौंप दी जाएगी. यह बड़ा ऐलान IN-SPACe के चेयरमैन डॉ. पवन गोयनका ने 21 अगस्त को Business Today के ‘India @ 100 Economy Summit’ में किया.
गोयनका ने साफ शब्दों में कहा- इसरो न लॉन्च व्हीकल बनाएगा, न उसका निर्माण करेगा, यह सारा काम अब प्राइवेट सेक्टर या PSU के जिम्मे होगा.
अगला नंबर PSLV और LVM-3 का
यह बदलाव अचानक नहीं हुआ। Small Satellite Launch Vehicle यानी SSLV की टेक्नोलॉजी और प्रोडक्शन राइट्स बोली प्रक्रिया के बाद हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड यानी HAL को पहले ही ट्रांसफर की जा चुकी हैं. अब बारी है इसरो के दो सबसे अहम रॉकेटों की – PSLV, जो इसरो का सबसे भरोसेमंद लॉन्च व्हीकल रहा है, और LVM-3, जो फिलहाल इसरो का सबसे ताकतवर ऑपरेशनल रॉकेट है. खास बात यह है कि इस बार SSLV वाली प्रक्रिया नहीं दोहराई जाएगी. PSU को इस दौड़ में शामिल नहीं किया जाएगा, बल्कि पूरी जिम्मेदारी सीधे प्राइवेट कंपनियों को ही सौंपी जाएगी.
गोयनका के मुताबिक इसरो अब तक 120 टेक्नोलॉजी प्राइवेट सेक्टर को ट्रांसफर कर चुका है. वहीं सरकार ने संसद में दिए जवाब में बताया कि NewSpace India Limited यानी NSIL के जरिए 118 टेक्नोलॉजी ट्रांसफर एग्रीमेंट हो चुके हैं, जिनमें SSLV, सैटेलाइट बस, लेजर गायरो और एंटीना सिस्टम जैसी 83 टेक्नोलॉजी शामिल हैं. इसके अलावा सरकार एक नए लॉन्च सेंटर का पूरा ऑपरेशन भी प्राइवेट कंपनी को सौंपने की तैयारी में है, जिसके लिए ऑपरेटर अगले 4-5 महीनों में फाइनल हो सकता है.
मैन्युफैक्चरिंग से हटकर इसरो अब पूरी तरह रिसर्च, नई टेक्नोलॉजी, वैज्ञानिक मिशन और खास इन्फ्रास्ट्रक्चर पर फोकस करेगा. यानी वो काम जो प्राइवेट कंपनियां अभी नहीं कर सकतीं। सरकार का लक्ष्य है भारत की स्पेस इकॉनमी को मौजूदा करीब 8 अरब डॉलर से बढ़ाकर 2033 तक 44 अरब डॉलर तक पहुंचाना.
झारखंड का इस पूरी कहानी में क्या रोल है
अब सवाल यह है कि इस बदलाव से झारखंड और रांची का क्या नाता है। तो जवाब है…बहुत गहरा. इसरो के हर लॉन्चिंग मिशन के पीछे रांची के धुर्वा में स्थित हेवी इंजीनियरिंग कॉर्पोरेशन यानी HEC का बड़ा योगदान रहा है. श्रीहरिकोटा से जितनी भी लॉन्चिंग होती है, उसके लिए इस्तेमाल होने वाले मोबाइल लॉन्च पैड और व्हील बोगी सिस्टम रांची के इसी HEC में बनते हैं. यही वजह है कि इसे ‘मदर ऑफ ऑल इंडस्ट्रीज’ भी कहा जाता है.
और यहीं रांची में एक और बड़ी कहानी छिपी है. BIT मेसरा का स्पेस इंजीनियरिंग एंड रॉकेट्री डिपार्टमेंट, जो 1964 में यानी इसरो की स्थापना से भी पांच साल पहले शुरू हुआ था. हैरानी की बात यह है कि भारत का पहला प्राइवेट ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-1, जिसे हैदराबाद की स्काईरूट एयरोस्पेस ने बनाया, उसकी टीम के चार अहम इंजीनियर इसी BIT मेसरा से निकले हैं. यानी जिस प्राइवेट स्पेस क्रांति की बात अब गोयनका कर रहे हैं, उसकी नींव में रांची का यह संस्थान दशकों पहले से ही खड़ा है.
इसरो की उपलब्धियां भी कम नहीं
इस बदलाव को समझने से पहले यह भी याद रखना जरूरी है कि इसरो ने अब तक हासिल क्या किया है. चांद के दक्षिणी ध्रुव पर उतरने वाला दुनिया का पहला देश बनने का गौरव इसरो ने चंद्रयान-3 मिशन से दिलाया. मंगलयान मिशन में पहले ही प्रयास में मंगल ग्रह की कक्षा में पहुंचकर इसरो ने पूरी दुनिया को चौंका दिया था. आदित्य-एल1 मिशन के जरिए सूर्य के अध्ययन में भी भारत आगे बढ़ चुका है, और अब गगनयान मिशन के जरिए भारत अपने दम पर इंसानों को अंतरिक्ष में भेजने की तैयारी में है. यही वजह है कि इसरो का रिसर्च और नई तकनीक की तरफ शिफ्ट होना बड़ा मायने रखता है क्योंकि जिस एजेंसी ने इतनी उपलब्धियां हासिल की हैं, वो अब मैन्युफैक्चरिंग से हटकर आगे की तकनीक पर फोकस करना चाहती है.
दुनिया में कहां-कहां हुआ यह प्रयोग
भारत अकेला देश नहीं है जो रॉकेट बनाने का काम प्राइवेट सेक्टर को सौंप रहा है. अमेरिका में नासा ने 2006 में ही Commercial Orbital Transportation Services यानी COTS प्रोग्राम शुरू किया था, जिसके तहत स्पेसएक्स जैसी कंपनियों को फंडिंग देकर रॉकेट बनवाए गए. नतीजा यह हुआ कि जहां पारंपरिक कॉन्ट्रैक्ट में अरबों डॉलर खर्च होते थे, वहीं COTS के तहत महज कुछ सौ मिलियन डॉलर में दो नए लॉन्च व्हीकल तैयार हो गए. आज हाल यह है कि अमेरिका के ज्यादातर स्पेस मिशन प्राइवेट कंपनी स्पेसएक्स के फाल्कन रॉकेट से ही लॉन्च होते हैं.
चीन ने भी 2014 में अपने स्पेस सेक्टर के दरवाजे प्राइवेट कंपनियों के लिए खोले थे. शुरुआत में मुट्ठीभर कंपनियां थीं, लेकिन आज चीन में 400 से ज्यादा प्राइवेट स्पेस कंपनियां काम कर रही हैं, जो रॉकेट से लेकर सैटेलाइट तक बना रही हैं। हालांकि अमेरिका के मुकाबले चीन अभी भी पीछे है, लेकिन उसकी रफ्तार तेज है.
यानी भारत अब उसी रास्ते पर चल पड़ा है, जिस पर दुनिया के दो सबसे बड़े स्पेस पावर पहले ही चल चुके हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि भारत अपनी नींव, अपनी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और रांची जैसे शहरों में बरसों से पल रही एक्सपर्टीज के दम पर यह छलांग लगा रहा है.
100 से ज्यादा वैज्ञानिकों के इस्तीफे के बीच सरकार का बड़ा दांव, विशेषज्ञों में मतभेद
लेकिन यह फैसला बिना विवाद के नहीं आया है. इसी बीच खबर यह भी है कि इसरो के 100 से ज्यादा सीनियर वैज्ञानिक और तकनीकी अधिकारी हाल के महीनों में इस्तीफा देकर या वॉलंटरी रिटायरमेंट लेकर प्राइवेट सेक्टर का रुख कर चुके हैं. इस पर पूर्व इसरो चेयरमैन जी. माधवन नायर ने चेतावनी दी है कि ये इस्तीफे सिर्फ सैलरी की वजह से नहीं, बल्कि बढ़ती नौकरशाही और संस्थागत खामियों का संकेत हैं. हालात इतने गंभीर हो गए कि जुलाई 2026 में डिपार्टमेंट ऑफ स्पेस को गगनयान जैसे फ्लैगशिप मिशन से जुड़े ग्रुप-ए वैज्ञानिकों के इस्तीफे रोकने के लिए इमरजेंसी आदेश तक जारी करना पड़ा.
आलोचकों का यह भी कहना है कि एक संसदीय समिति ने इस पूरी प्रक्रिया में कुछ चुनिंदा प्राइवेट कंपनियों को फायदा पहुंचाने की आशंका जताई है. वहीं दूसरी तरफ, इसरो के पूर्व चेयरमैन एस. सोमनाथ जैसे विशेषज्ञों का मानना रहा है कि रिसर्च और ऑपरेशन को पूरी तरह अलग करना खतरनाक हो सकता है, क्योंकि इससे रिसर्च सिर्फ कागजी कवायद बनकर रह सकती है.
फिलहाल यह साफ है कि भारत का स्पेस सेक्टर एक बड़े स्ट्रक्चरल बदलाव के मुहाने पर खड़ा है- और आने वाले महीनों में यह देखना अहम होगा कि इसरो का यह नया मॉडल जमीन पर कैसे उतरता है.
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