किसलय शानू
साल 2018. रांची के मिशनरीज ऑफ चैरिटी से जुड़ा एक मामला पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया था. आरोप था कि नवजात बच्चों को अवैध रूप से दूसरे राज्यों के लोगों को पैसे लेकर सौंपा जा रहा है. पुलिस ने मानव तस्करी, धोखाधड़ी, जालसाजी और जुवेनाइल जस्टिस एक्ट की गंभीर धाराओं में केस दर्ज किया.
दो महिलाओं को गिरफ्तार किया गया. मामला राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा और इसे संगठित बाल तस्करी का उदाहरण बताया गया. लेकिन लगभग आठ साल बाद रांची की अदालत ने इस पूरे मामले में दोनों आरोपियों को बरी कर दिया है.
इनमें से एक कोलकाता स्थित मिशनरीज ऑफ चैरिटी (एमओसी) से जुड़ी एक नन हैं. सिस्टर कॉन्सिलिया बाखला और अनीमा इंदवार को वर्ष 2018 में गिरफ्तार किया गया था. राज्य संचालित बाल कल्याण समिति (सीडब्ल्यूसी) ने आरोप लगाया था कि अविवाहित महिला से जन्मे एक नवजात शिशु को मदर टेरेसा द्वारा स्थापित मिशनरीज ऑफ चैरिटी के एक शेल्टर होम के माध्यम से उत्तर प्रदेश के एक दंपति को बेच दिया गया था.
18 जून को दोनों के बरी होने के साथ इस लंबे कानूनी संघर्ष का अंत हुआ. बचाव पक्ष के अनुसार, इस मुकदमे ने दोनों महिलाओं पर गहरे मानसिक और भावनात्मक असर डाला. कॉन्सिलिया बखला मिशनरीज ऑफ चैरिटी से जुड़ी एक आदिवासी नन हैं, जबकि अनीमा इंदवार भी आदिवासी समुदाय से आती हैं. वह रांची के सदर अस्पताल में अंशकालिक सफाईकर्मी के रूप में कार्यरत थीं और संगठन की सामाजिक कल्याण गतिविधियों में भी सहयोग करती थीं.
बचाव पक्ष के अधिवक्ता अनिल कांत ने सभी आरोपों से इनकार करते हुए इस मामले को राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया. उन्होंने कहा, “पूरी कानूनी प्रक्रिया के दौरान जिस तरह से सिस्टर्स को प्रताड़ित और परेशान किया गया, उससे उनका लोगों पर से विश्वास उठ गया है.”
अनिल कांत के अनुसार, मुकदमे के दौरान दोनों महिलाओं को गंभीर मानसिक आघात झेलना पड़ा. सिस्टर कॉन्सिलिया बखला की सेहत काफी बिगड़ गई और उन्हें स्मृति संबंधी समस्याएं होने लगीं. वहीं अनीमा इंदवार वर्षों तक आरोपों और उनसे जुड़े सामाजिक कलंक से लड़ती रहीं.
उन्होंने यह भी कहा कि इस मामले का असर मिशनरीज ऑफ चैरिटी द्वारा संचालित कई सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों पर पड़ा. उन्होंने कहा, “गिरफ्तारियों के बाद कई ऐसे कार्यक्रम प्रभावित हुए, जो जरूरतमंद महिलाओं और बच्चों को आश्रय एवं सहायता उपलब्ध कराते थे. इनमें से कुछ सेवाओं को बाद में सीमित करना पड़ा या पूरी तरह बंद करना पड़ा.”
अदालत में क्यों टिक नहीं सका आरोप
सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि जिन आरोपों को बेहद गंभीर बताया गया था, वे अदालत में टिक नहीं सके? अदालत ने किन कमियों की ओर इशारा किया? फैसले में अदालत ने साफ कहा कि अभियोजन पक्ष अपने ही सबसे महत्वपूर्ण गवाहों को अदालत में पेश नहीं कर सका.
सबसे बड़ी कमी यह रही कि जिस दंपती, सौरभ अग्रवाल और प्रीति अग्रवाल, पर बच्चे को लेने का आरोप था, उन्हें गवाह नहीं बनाया गया. यदि वास्तव में पैसे देकर बच्चा लिया गया था, तो अदालत के अनुसार वही सबसे महत्वपूर्ण गवाह थे.
इसी तरह बच्चे की जैविक मां करिश्मा टोप्पो को भी अदालत में पेश नहीं किया गया. जबकि पूरा मामला उसी बच्चे और उसके कथित अवैध हस्तांतरण के इर्द-गिर्द था.
पुलिस ने आरोपपत्र में जालसाजी और फर्जी दस्तावेज तैयार करने की धाराएं भी जोड़ी थीं. लेकिन सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष कोई ऐसा कथित फर्जी दस्तावेज अदालत के सामने पेश ही नहीं कर पाया, जिसके आधार पर अदालत यह तय कर सके कि वास्तव में जालसाजी हुई थी. इसी आधार पर अदालत ने माना कि जालसाजी से जुड़े आरोप भी साबित नहीं हुए.
मानव तस्करी का आरोप क्यों कमजोर पड़ा? मानव तस्करी साबित करने के लिए यह दिखाना जरूरी होता है कि किसी व्यक्ति को धोखे, दबाव, बल, लालच या अवैध तरीके से शोषण के उद्देश्य से स्थानांतरित किया गया. लेकिन अदालत ने गवाहों के बयानों का हवाला देते हुए कहा कि रिकॉर्ड पर यह सामने आया कि बच्चे की मां ने स्वयं पैसे लेकर बच्चा सौंपा था. किसी गवाह ने यह नहीं कहा कि उस पर दबाव डाला गया, धमकी दी गई या झूठा वादा किया गया. यही कारण रहा कि मानव तस्करी की धाराएं भी अदालत में सिद्ध नहीं हो सकीं.
अदालत ने क्या कहा?
फैसले में अदालत ने स्पष्ट कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा. न तो कथित पीड़ितों के बयान आए, न कथित खरीदारों के, न ही जालसाजी के दस्तावेज प्रस्तुत किए गए. ऐसे में केवल आरोपों के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता. इसी कारण अदालत ने अनीमा इंदेवार और कॉनसिलिया बखला को सभी आरोपों से बरी कर दिया.
क्या इसका मतलब यह है कि मामला झूठा था? कानूनी दृष्टि से इसका उत्तर “नहीं” है. अदालत ने यह नहीं कहा कि घटना कभी हुई ही नहीं. अदालत ने केवल इतना कहा कि अभियोजन पक्ष उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोप सिद्ध नहीं कर पाया. भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था में किसी भी आरोपी को दोषी ठहराने के लिए आरोपों का संदेह से परे प्रमाणित होना आवश्यक होता है. यदि जांच या साक्ष्य में गंभीर कमी रह जाती है, तो अदालत आरोपी को दोषमुक्त कर सकती है.
यह फैसला केवल दो आरोपियों के बरी होने का मामला नहीं है. यह जांच प्रक्रिया पर भी कई सवाल खड़े करता है. सबसे अहम गवाह अदालत तक क्यों नहीं पहुंचे? कथित फर्जी दस्तावेज अदालत में क्यों पेश नहीं किए गए? क्या जांच में गंभीर चूक हुई? यदि साक्ष्य पर्याप्त नहीं थे, तो इतनी गंभीर धाराएं क्यों लगाई गईं? इन सवालों के जवाब भविष्य में इस तरह के संवेदनशील मामलों की जांच की गुणवत्ता तय करेंगे.
2018 में जिस मामले को देश के सबसे चर्चित बाल तस्करी मामलों में गिना गया था, उसका कानूनी अंत 2026 में आरोपियों की बरी होने के साथ हुआ. अदालत का फैसला यह याद दिलाता है कि गंभीर आरोप अपने आप में दोष सिद्ध नहीं करते. न्यायालय केवल उन्हीं मामलों में दोषसिद्धि करता है, जहां जांच, साक्ष्य और गवाह कानूनी कसौटी पर पूरी तरह खरे उतरते हैं.
क्या मायने रखती है संस्था इसको इस बात से समझिये. बीते 23 मई को अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो का भारत दौरा था. अमूमन किसी देश के राष्ट्राध्यक्ष पहले दिल्ली पहुंचते हैं. लेकिन रुबियो ने सीधे कोलकाता में लैंड किया. पिछले 14 साल में ऐसा करने वाले वे अमेरिका के पहले विदेश मंत्री हैं. इससे पहले हिलेरी क्लिंटन यहां पहुंची थीं.
कोलकाता के संक्षिप्त दौरे के दौरान रुबियो मिशनरीज ऑफ चैरिटी गए. उन्होंने वहां मिशनरीज के पदाधिकारियों के साथ ही अन्य् लोगों से भी मुलाकात की. बता दें कि यह वही मिशनरीज ऑफ चैरिटी है, जिसकी फंडिंग पर भारत सरकार ने कुछ समय के लिए रोक लगा दी थी. बाद में यह रोक हटा ली गई थी.
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