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    Home»झारखंड»हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: लाइसेंस नहीं दिखाना मुआवजा घटाने का आधार नहीं, सड़क हादसे में पीड़ित को अब 3.12 लाख रुपये मिलेंगे
    झारखंड

    हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: लाइसेंस नहीं दिखाना मुआवजा घटाने का आधार नहीं, सड़क हादसे में पीड़ित को अब 3.12 लाख रुपये मिलेंगे

    Muskan ChoudharyBy Muskan ChoudharyAugust 11, 2026No Comments4 Mins Read1
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    झारखंड हाईकोर्ट
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    झारखंड हाईकोर्ट ने सड़क दुर्घटना से जुड़े एक अहम मामले में स्पष्ट किया है कि सिर्फ ड्राइविंग लाइसेंस पेश नहीं किए जाने के आधार पर दुर्घटना पीड़ित की मुआवजा राशि कम नहीं की जा सकती. कोर्ट ने कहा कि contributory negligence यानी सहायक लापरवाही साबित करने के लिए ठोस साक्ष्य जरूरी है. केवल यह कहना कि पीड़ित के पास वैध ड्राइविंग लाइसेंस नहीं था या लाइसेंस पेश नहीं किया गया, अपने आप में उसकी लापरवाही साबित नहीं करता.

    मामला धनबाद से जुड़ा है. झारखंड हाईकोर्ट में एमए संख्या 145/2017 पर सुनवाई हुई. यह अपील शिव कुमार अग्रवाल की ओर से दायर की गई थी, जिसमें मोटर वाहन दुर्घटना दावा अधिकरण, धनबाद के 7 दिसंबर 2016 के फैसले को चुनौती दी गई थी. अधिकरण ने मूल रूप से 2,35,000 रुपये का मुआवजा 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ देने का आदेश दिया था. हाईकोर्ट ने सुनवाई के बाद मुआवजा बढ़ाकर 3,12,500 रुपये कर दिया.

    तीन प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही को कोर्ट ने माना विश्वसनीय

    मामले में पीड़ित और दो अन्य प्रत्यक्षदर्शियों ने अदालत के सामने बयान दिया था कि दुर्घटना में शामिल वाहन सामने से तेज गति से आ रहा था और चालक उसे लापरवाही तथा तेज गति से चला रहा था. तीनों गवाहों की गवाही में कोई ऐसी महत्वपूर्ण विसंगति सामने नहीं आई, जिससे उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठे. हाईकोर्ट ने इन गवाहियों को लगातार और स्वाभाविक माना.

    वहीं वाहन मालिक ने अदालत में कहा था कि दुर्घटना के समय वाहन खड़ा था और उससे सामान उतारा जा रहा था. हाईकोर्ट ने कहा कि वाहन मालिक की इस गवाही को तीन प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही के मुकाबले देखा जाना चाहिए. कोर्ट के अनुसार तीन स्वतंत्र या स्वाभाविक गवाहों की गवाही अधिक विश्वसनीय और संभावित थी.

    कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर वाहन वास्तव में खड़ा था और उससे सामान उतारा जा रहा था, तो इसके समर्थन में मजदूरों की गवाही, कोई दस्तावेज या अन्य स्वतंत्र साक्ष्य पेश किया जा सकता था. लेकिन अपीलकर्ता की ओर से ऐसा कोई ठोस समर्थन नहीं दिया गया.
    सिर्फ वाहन खड़ा होने की बात से पीड़ित की गलती साबित नहीं होती.

    हाईकोर्ट ने contributory negligence के मुद्दे पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की. कोर्ट ने कहा कि अगर वाहन मालिक की यह बात मान भी ली जाए कि वाहन उस समय खड़ा था, तब भी इससे यह साबित नहीं होता कि दुर्घटना के लिए पीड़ित भी जिम्मेदार था.

    कोर्ट के अनुसार सहायक लापरवाही का आरोप लगाने वाले पक्ष को यह साबित करना होता है कि पीड़ित ने भी लापरवाही से वाहन चलाया या उसकी किसी हरकत ने दुर्घटना में योगदान दिया. इस मामले में अपीलकर्ता ऐसा कोई सकारात्मक साक्ष्य पेश नहीं कर सका.
    कोर्ट ने यह भी साफ किया कि केवल आमने-सामने की टक्कर हो जाने से अपने आप पीड़ित की contributory negligence नहीं मानी जा सकती. इसके लिए पीड़ित की लापरवाही का ठोस प्रमाण जरूरी है.

    ड्राइविंग लाइसेंस पेश नहीं करने पर भी अहम टिप्पणी

    मामले में अपीलकर्ता की ओर से यह तर्क भी दिया गया कि पीड़ित का ड्राइविंग लाइसेंस अदालत में पेश नहीं किया गया था. इसलिए इसे contributory negligence या मुआवजा कम करने के आधार के तौर पर देखा जाना चाहिए.

    हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया. कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि केवल किसी वैधानिक प्रावधान का उल्लंघन, जिसमें वैध ड्राइविंग लाइसेंस का अभाव भी शामिल है, अपने आप contributory negligence साबित नहीं करता.

    इसके लिए यह दिखाना जरूरी है कि लाइसेंस का अभाव दुर्घटना का कारण बना या दुर्घटना में लगी चोटों के परिणाम को और गंभीर किया. इस मामले में ऐसा कोई साक्ष्य सामने नहीं आया. इसलिए पीड़ित के ड्राइविंग लाइसेंस को पेश नहीं किए जाने को मुआवजे की जिम्मेदारी या उसकी राशि तय करने के लिए अप्रासंगिक माना गया.

    मेडिकल खर्च के दस्तावेज भी कोर्ट ने सही माने

    मुआवजे की गणना में मेडिकल खर्च को लेकर भी अपीलकर्ता ने सवाल उठाया था. हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रिब्यूनल ने पीड़ित की ओर से पेश किए गए मेडिकल बिलों को देखने के बाद उचित राशि निर्धारित की थी.

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