सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस अभय ओक ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर मई 2026 में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर पुनर्विचार की जरूरत बताई है. उन्होंने कहा कि केवल प्री-फिल्ड एन्यूमरेशन फॉर्म जमा नहीं करने के आधार पर किसी मतदाता का नाम सूची से नहीं हटाया जा सकता. एक मीडिया इंटरव्यू में उन्होंने निर्वाचन आयोग के अधिकारों और SIR लागू करने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए.
जस्टिस ओक ने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले पर आपत्ति जताई, जिसमें CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(3) के तहत सभी निर्वाचन क्षेत्रों में एक साथ मतदाता सूची के पुनरीक्षण की अनुमति दी थी.
उनके मुताबिक, कानून में गहन और आंशिक पुनरीक्षण की व्यवस्था है, लेकिन धारा 21(3) के तहत एक बार में केवल एक निर्वाचन क्षेत्र की सूची का गहन पुनरीक्षण किया जा सकता है. उन्होंने कहा कि इस फैसले पर दोबारा विचार होना चाहिए.
फॉर्म नहीं भरने पर नाम हटाना गलत
जस्टिस ओक ने कहा कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स, 1960 में केवल एन्यूमरेशन फॉर्म जमा नहीं करने पर नाम हटाने का प्रावधान नहीं है. किसी मतदाता का नाम हटाने से पहले उसे नोटिस देना और अपना पक्ष रखने का अवसर देना जरूरी है.
उन्होंने फॉर्म-6 और फॉर्म-8 में अतिरिक्त घोषणा जोड़ने के अधिकार पर भी सवाल उठाया. उनके मुताबिक, इससे जुड़े नियम बनाने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है, निर्वाचन आयोग अपनी ओर से बदलाव नहीं कर सकता.
नागरिकता तय करना आयोग का अधिकार नहीं
जस्टिस ओक ने कहा कि SIR की वैधता बरकरार रहने का अर्थ यह नहीं है कि इसे मनमाने तरीके से लागू किया जा सकता है. प्रक्रिया में कानून का उल्लंघन होने पर अदालत हस्तक्षेप कर सकती है.
उन्होंने यह भी कहा कि किसी व्यक्ति की भारतीय नागरिकता तय करना निर्वाचन आयोग के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता. उनके मुताबिक, मतदाता सूची के पुनरीक्षण में कानूनी प्रक्रिया का पालन जरूरी है और केवल फॉर्म जमा नहीं करने के आधार पर किसी को मताधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता.

