रांची. झारखंड की आदिवासी नेत्री निशा भगत का निधन हो गया है. उन्होंने शुक्रवार को कथित तौर पर आत्महत्या करने से करीब दो घंटे पहले फेसबुक पर लाइव आकर अपनी पीड़ा जाहिर की थी. इस दौरान उन्होंने प्रशासन और अपनी सुरक्षा को लेकर कई गंभीर आरोप लगाए. लाइव वीडियो में वह भावुक नजर आईं और बार-बार अपने माता-पिता तथा आदिवासी समाज का जिक्र करती रहीं.
बता दें, पिठोरिया थाना क्षेत्र के दाहूटोली गांव में रह रही निशा भगत ने शुक्रवार को आत्महत्या कर ली, उसे ईलाज के लिए अस्पताल ले जाया गया था, लेकिन बचाया नहीं जा सका.
निशा भगत ने फेसबुक लाइव पर उन्होंने जो भी कहा वो आपके सामने है…..
जोहार. नमस्कार. जो लोग कहते हैं ना कि निशा भगत बहुत स्ट्रांग है. सरना सनातन की नींव है. सरना सनातन की प्रकांड वो मिशाल है. किसी का उजागर करना, मुझे ये बहुत पहले समझ आना चाहिए था कि षड़यंत्र साठ-गांठ जितने भी चमचे-दलाल हों, ये मुझे नहीं पता था कि मुझे अपनी मौत का आमंत्रण देना होगा आपके समक्ष.
मेरी मौत जो है, ये लोग कहते हैं ना बीजेपी है, कांग्रेस है. मेरे मां-बाप को बहुत दुख होगा. अह मेरे बाबा, जो झारखंड आंदोलनकारी हैं. उनको बहुत दुख होगा. मैं प्रशासन से भी बहुत लड़ने की कोशिश की. प्रशासन को भी बहुत अपनी सिक्योरिटी की मांग करने की कोशिश की, लेकिन आज मुझे इसलिए मौत को अपना गले लगाना पड़ रहा है कि जो औरतों को जलील कर सकता है, मैं ये नहीं बर्दाश्त कर सकती. मेरे मां-बाप कितना सुनेंगे जी? कितना सुनेंगे मेरे बाबा? मेरे पिताजी मेरे लिए कितना सुनेंगे? मेरी मां कितना सुनेगी? मेरी मां कितना सुनेगी, मेरी मां? मुझसे कितना प्यार करती है. लेकिन आज मेरी जीवन की लीला समाप्त करने की बारी आई और मुझे पता है कि ना मेरे साथ कोई था, ना कोई है.
ये RSS और बीजेपी वाले बोलते रह गए कि हम या ईसा-मूसा वाले बोलते रह गए कि ये RSS, बीजेपी के दलाल हैं, लेकिन मैं किसी की दलाल नहीं रही. मैं लड़ती रही, संघर्ष करती रही कि मेरा समाज बच पाए. मेरा जनजातीय समाज बच पाए. लेकिन नहीं कुछ हो रहा है. यक़ीन मानिए प्रशासन फ़ेल है. प्रशासन फ़ेल है क्योंकि प्रशासन ना ये आरजेडी के लोग हैं जैसे लोगों के पैदा. ये RSS और बीजेपी वाले मेरे साथ नहीं हैं, यक़ीन मानो.
(निशा भगत के पिता द्वारा फोन किया गया) मेरे पिताजी फोन कर रहे हैं. मेरे पिताजी को दुख होगा. झारखंड आंदोलनकारी हैं वो. शिबू सोरेन के पैरेलल.
मेरे पिताजी फोन कर रहे थे. मुझे नहीं पता फांसी कैसे लगाना होता है. जैसे तैसे भी आए, कोरा थाना प्रभारी को फोन करो.
(निशा भगत थाना प्रभारी को फोन करती हैं)
निशा भगत : हेलो. कोरा थाना प्रभारी को जोहार है, नमस्कार है. जोहार,
थाना प्रभारी : जोहार, नमस्ते, बताइए.
निशा : आपने तो मेरा घर का चोर को भी नहीं पकड़ पाए, मेरे को बदनाम करने वालों को भी नहीं पकड़ पाए.
थाना प्रभारी: आप कहां पे हैं अभी?
निशा: अब अपनी लीला मैं समाप्त कर रही हूं तो आपको फोन कर रही हूं.
थाना प्रभारी: हां?
निशा : अब अपनी लीला समाप्त कर रही हूं तो मैं आपको फोन कर रही हूं. मैं फांसी लगा रही हूं. तो मेरी अंतिम लीला आप यही देखना चाहते थे तो यही सही.
थाना प्रभारी: आप आइए ना एक बार मेरे पास.
निशा : मैं क्या आऊं? मेरी live चल रहा है, live! live! आप लोगों ने मेरे साथ जो किया… काट दिया फोन. उफ़,
फांसी कैसे लगाया जाता है? मुझे पता है मां-बाप ने बहुत नाज़ों से पाला था, लेकिन मैंने तो अपने आपको समाज के लिए छोड़ा था. मैंने कौन सा अपने किसी के लिए छोड़ा था? किसी के लिए छोड़ा था क्या? कोई आदिवासी समाज के अलावा किसी के लिए छोड़ा था क्या? हां? बताओ मुझे, छोड़ा था क्या? हां? हां? ये ये लोग… मैंने काका ताया को भी फ़ोन किया. वो ऑलरेडी ज़मींदार वालों के…
आदिवासी अधिकारों के आंदोलनों में रही थीं सक्रिय
निशा भगत झारखंड में आदिवासी अधिकारों, सरना धर्म कोड और धर्मांतरण से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय रही थीं. वह केंद्रीय सरना समिति की उपाध्यक्ष के रूप में भी काम कर चुकी थीं. दिसंबर 2025 में सरना धर्म कोड और डिलिस्टिंग की मांग को लेकर राजभवन के सामने आयोजित प्रदर्शन में बाल मुंडवाकर विरोध जताने के बाद वह चर्चा में आई थीं.
उन्होंने 2024 के झारखंड विधानसभा चुनाव में गुमला सीट से झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (JLKM) के टिकट पर चुनाव लड़ा था. रिम्स परिसर में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के विरोध के दौरान भी वह चर्चा में रही थीं. इस मामले में पुलिस ने उन्हें हिरासत में लिया था. जुलाई 2026 में झारखंड हाईकोर्ट से उन्हें अग्रिम जमानत मिली थी.


