मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर हुए विरोध प्रदर्शन और जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है. बीते 15 अक्टूबर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने भारत निर्वाचन आयोग, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी को नोटिस जारी किया. अदालत ने प्रदर्शन के दौरान कथित पुलिस ज्यादती के आरोपों के बीच सीसीटीवी फुटेज और अन्य डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रखने का निर्देश भी दिया. यह याचिका लोकसभा के विपक्ष के नेता राहुल गांधी समेत 11 नेताओं ने दायर की है.
सुप्रीम कोर्ट ने जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने के फैसले पर भी विचार करने पर सहमति जताई. अदालत के सामने सवाल उठाया गया कि राजधानी में विरोध प्रदर्शन के लिए पहले से निर्धारित स्थल को हटाने का फैसला किन आधारों पर लिया गया. इस मामले में केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस से जवाब मांगा गया है. हालांकि, अदालत ने अभी इस फैसले को रद्द नहीं किया है और न ही प्रदर्शनकारियों की ओर से लगाए गए आरोपों को सही ठहराया है.
जंतर-मंतर की जगह तीन वैकल्पिक स्थल तय
दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाते हुए बुराड़ी मैदान, रामलीला मैदान और पूर्वी दिल्ली के सीबीडी मैदान को वैकल्पिक स्थानों के रूप में निर्धारित किया था. इस फैसले को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं का कहना है कि वैकल्पिक स्थल शहर के केंद्र से दूर हैं और वहां पहुंचना प्रदर्शनकारियों के लिए मुश्किल हो सकता है. इससे शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार पर असर पड़ने की आशंका जताई गई है.

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि जंतर-मंतर को सूची से हटाने का फैसला गृह मंत्रालय की ओर से गठित समिति की सिफारिशों के आधार पर लिया गया था. उन्होंने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट की मौखिक टिप्पणियों से जोड़ने पर आपत्ति जताई.
पुलिस कार्रवाई के आरोप, सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखने का निर्देश
प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कार्रवाई को लेकर भी अदालत में शिकायतें की गईं. प्रदर्शनकारियों और पत्रकारों की ओर से कथित तौर पर जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग, हिरासत में लेने और रिपोर्टिंग में बाधा डालने के आरोप लगाए गए. इन आरोपों की जांच के लिए घटनास्थल के सीसीटीवी फुटेज और दूसरे डिजिटल साक्ष्य महत्वपूर्ण हो सकते हैं.
इसी को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित कानून प्रवर्तन एजेंसियों को प्रदर्शन से जुड़े सीसीटीवी फुटेज और डिजिटल सामग्री सुरक्षित रखने का निर्देश दिया.
पुलिस की शक्तियों और पत्रकारों की सुरक्षा का मुद्दा
सुनवाई में BNSS की धारा 172 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर भी नोटिस जारी किया गया. यह प्रावधान पुलिस के वैध निर्देशों का पालन करने की बाध्यता से संबंधित है. याचिकाकर्ताओं ने इसके दुरुपयोग की आशंका जताते हुए संवैधानिक अधिकारों के संदर्भ में सवाल उठाए हैं.
महिला पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार और रिपोर्टिंग के दौरान आई बाधाओं का मुद्दा भी अदालत में उठा. पत्रकारों की शिकायतों की जांच के लिए स्वतंत्र समिति गठित करने की मांग की गई.
प्रदर्शन के दौरान आम लोगों की आवाजाही और सार्वजनिक परिवहन पर लगाए गए प्रतिबंधों को लेकर भी अदालत में चर्चा हुई. दिल्ली पुलिस ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए उठाए गए कदमों का बचाव किया और अपने हलफनामे में अदालत के निर्देशों का जानबूझकर उल्लंघन करने से इनकार किया. दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन ने भी प्रतिबंधों के लिए माफी मांगी, लेकिन स्पष्ट किया कि पूरे मेट्रो नेटवर्क को बंद नहीं किया गया था.


