जोहार लाइव ब्यूरो
रांची: जमशेदपुर के बिष्टुपुर स्थित धातकीडीह हरिजन बस्ती में कल्लू घोष की गोली मारकर हत्या के मामले में झारखंड हाईकोर्ट ने चार भाइयों की उम्रकैद की सजा बरकरार रखी है. अदालत ने दोषियों की ओर से दायर दोनों आपराधिक अपीलों को खारिज कर दिया. कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष के गवाहों की गवाही और पोस्टमार्टम रिपोर्ट से घटना की पुष्टि होती है. ऐसे में निचली अदालत के फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई कानूनी आधार नहीं है.
जस्टिस आनंद सेन और जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने 15 अक्टूबर 2026 को यह फैसला सुनाया. अदालत ने ज्योति मुखी, होलिया मुखी, खून मुखी उर्फ विकास मुखी और टीका मुखी उर्फ गोपी मुखी की अपीलों पर सुनवाई की थी. इन सभी को कल्लू घोष की हत्या के मामले में दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी.
योग करने गए थे कल्लू घोष, तभी हुई थी गोलीबारी
मामला 18 मई 2016 की सुबह का है. अभियोजन पक्ष के अनुसार, सुबह करीब 6:45 बजे कल्लू घोष अपने घर के पास पीपल के पेड़ के नीचे बने चबूतरे पर योगाभ्यास करने गए थे. इसी दौरान गोली चलने की आवाज सुनाई दी. परिजनों और अन्य लोगों के बाहर निकलने पर कल्लू घोष गोली लगने से घायल अवस्था में मिले.
अभियोजन के मुताबिक, आरोपियों के पास पिस्तौल थीं और उन्होंने कल्लू घोष पर गोलियां चलाई थीं. घायल कल्लू घोष को इलाज के लिए टाटा मेन हॉस्पिटल (टीएमएच) ले जाया गया, जहां उसी दिन दोपहर करीब 2:30 बजे उनकी मौत हो गई.
इस मामले में पुरानी रंजिश को हत्या की वजह बताया गया था. आरोप था कि 26 सितंबर 2015 को भी कल्लू घोष पर तलवार से हमला किया गया था. इस घटना को लेकर पहले से एक मामला दर्ज था और वह लंबित था.

पांच गवाहों की गवाही को कोर्ट ने माना अहम
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयान और दूसरे साक्ष्यों का आकलन किया. अदालत ने पाया कि पीडब्ल्यू-1 अनिमेष घोष, पीडब्ल्यू-2 अंजन घोष, पीडब्ल्यू-4 परेश मुखी, पीडब्ल्यू-5 जूली घोष और पीडब्ल्यू-7 मुन्ना घोष की गवाही से घटना की परिस्थितियों की पुष्टि होती है.
इन गवाहों ने गोली चलने की आवाज सुनने के बाद बाहर आने, कल्लू घोष को घायल अवस्था में देखने और आरोपियों को हथियारों के साथ वहां से भागते देखने की बात कही थी. कुछ गवाहों ने यह भी बताया कि घायल कल्लू घोष ने अस्पताल ले जाते समय हमलावरों के नाम बताए थे.
अदालत ने कहा कि गवाहों के बयानों में ऐसी कोई महत्वपूर्ण विरोधाभासी बात सामने नहीं आई, जिससे अभियोजन के मामले पर संदेह हो. कोर्ट ने यह भी माना कि गवाहों के बयान मेडिकल साक्ष्यों से मेल खाते हैं.
पोस्टमार्टम रिपोर्ट से भी हुई पुष्टि
मामले में डॉक्टर लल्लन चौधरी ने कल्लू घोष का पोस्टमार्टम किया था. रिपोर्ट के अनुसार, मृतक के शरीर पर गोली लगने के कई घाव थे. पोस्टमार्टम के दौरान शरीर से दो धातु की गोलियां भी बरामद की गई थीं.
डॉक्टर ने मौत की वजह गोली से लगी चोटों के कारण अत्यधिक रक्तस्राव और शॉक बताया था. हाईकोर्ट ने माना कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयानों की पुष्टि करती है.
हत्या में सामूहिक भूमिका मानने से किया इनकार नहीं
अपीलकर्ताओं की ओर से दलील दी गई थी कि घटना का कोई विश्वसनीय प्रत्यक्षदर्शी नहीं था और उनके पास से हत्या में इस्तेमाल हथियार भी बरामद नहीं हुए थे. बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि सभी आरोपियों की भूमिका अलग-अलग स्पष्ट रूप से साबित नहीं हुई और उन्हें गलत तरीके से मामले में फंसाया गया.
हालांकि, राज्य सरकार और सूचक की ओर से इन दलीलों का विरोध किया गया. हाईकोर्ट ने साक्ष्यों के समग्र आकलन के बाद माना कि आरोपियों का साझा उद्देश्य हत्या करना था और वे गैरकानूनी जमावड़े के सदस्य के रूप में इस अपराध में शामिल थे.
अदालत ने कहा कि निचली अदालत ने मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों का उचित मूल्यांकन किया था. इसलिए दोषसिद्धि और सजा के फैसले में हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है.
क्या सजा मिली थी?
निचली अदालत ने चारों आरोपियों को भारतीय दंड संहिता की धारा 302/149 और 148 तथा आर्म्स एक्ट की धारा 27 के तहत दोषी ठहराया था. हत्या के मामले में सभी को आजीवन कारावास और 20 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई थी. इसके अलावा अन्य धाराओं में भी सजा और जुर्माना लगाया गया था.
हाईकोर्ट ने दोनों आपराधिक अपीलें खारिज करते हुए कहा था कि निचली अदालत के फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई कानूनी आधार नहीं है.
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