देश के पूर्व राष्ट्रपति और महान वैज्ञानिक डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की जयंती 15 अक्टूबर को मनाई जाती है. 15 अक्टूबर 1931 को तमिलनाडु के रामेश्वरम में जन्मे कलाम को देश ‘मिसाइल मैन’ और ‘पीपुल्स प्रेसिडेंट’ के नाम से याद करता है. विज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले कलाम की पहचान एक ऐसे राष्ट्रपति के रूप में भी रही, जिनकी दिलचस्पी बच्चों और युवाओं से संवाद करने में थी.
झारखंड के अलग-अलग हिस्सों से भी उनकी यादें जुड़ी हैं. वे 2001 में चंदनकियारी, 2002 में झरिया, फरवरी 2004 में राष्ट्रपति के रूप में रांची, जमशेदपुर और मरांगहातु तथा अगस्त 2007 में जमशेदपुर आए थे. राष्ट्रपति पद छोड़ने के बाद 24 फरवरी 2011 को वे बीआईटी मेसरा के दीक्षांत समारोह में भी शामिल हुए थे.
जब राष्ट्रपति ने बच्चों को देखकर रुकवा दी अपनी गाड़ी
फरवरी 2004 में मरांगहातु गांव पहुंचे डॉ. कलाम ने बच्चों को देखकर अपनी गाड़ी रुकवाई और उनसे बातचीत की. द टेलीग्राफ की 13 फरवरी 2004 की रिपोर्ट के अनुसार, गांव के प्राथमिक विद्यालय में उस समय 187 विद्यार्थी और तीन शिक्षक थे. विद्यालय के प्रधानाध्यापक गोपबंधु महतो ने उनसे ऑटोग्राफ मांगा, जिसे उन्होंने दिया.
गांव में रेशम उत्पादन की गतिविधियों ने भी उनका ध्यान खींचा था. स्कूल की स्थिति जानने के बाद उन्होंने इसे माध्यमिक स्तर तक विकसित करने और कंप्यूटर शिक्षा की सुविधा उपलब्ध कराने की जरूरत पर जोर दिया. तत्कालीन जिला प्रशासन की ओर से विद्यालय के उन्नयन और बुनियादी सुविधाओं को लेकर पहल की बात सामने आई थी.
कब-कब झारखंड आए थे डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम?
7-8 अक्टूबर 2001: बोकारो और चंदनकियारी
डॉ. कलाम के झारखंड दौरे का एक शुरुआती चर्चित प्रसंग अक्टूबर 2001 का है. उस समय वे देश के प्रमुख वैज्ञानिकों में शामिल थे. द टेलीग्राफ की 29 जुलाई 2015 को प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, 8 अक्टूबर 2001 को वे चंदनकियारी पहुंचे थे. यहां उन्होंने औषधीय पौधों की खेती और ग्रामीण विकास से जुड़ी गतिविधियों में रुचि दिखाई तथा विद्यार्थियों से बातचीत की.
जनवरी 2002: झरिया की भूमिगत आग देखने पहुंचे
राष्ट्रपति बनने से पहले डॉ. कलाम धनबाद के झरिया पहुंचे थे. उस समय वे तत्कालीन प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार के रूप में जाने जाते थे. झरिया की भूमिगत आग से प्रभावित क्षेत्र का निरीक्षण करते हुए उन्होंने इस समस्या को वैज्ञानिक तरीके से समझने और नियंत्रित करने की संभावनाओं पर बात की थी.
12-14 फरवरी 2004: राष्ट्रपति के रूप में रांची, जमशेदपुर और मरांगहातु
राष्ट्रपति बनने के बाद डॉ. कलाम का झारखंड का एक महत्वपूर्ण दौरा 12 से 14 फरवरी 2004 के बीच हुआ. 13 फरवरी को वे जमशेदपुर में औद्योगिक कार्यक्रमों में शामिल हुए. उन्होंने राष्ट्रीय धातुकर्म प्रयोगशाला का दौरा किया और रांची विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में विद्यार्थियों को संबोधित किया. इसी दौरान उन्होंने झारखंड विधानसभा के सदस्यों के सामने राज्य के विकास पर भी अपने विचार रखे.
इस दौरे के दौरान वे सरायकेला-खरसावां जिले के कुचाई प्रखंड स्थित आदिवासी बहुल मरांगहातु गांव पहुंचे. गांव के प्राथमिक विद्यालय में बच्चों से मुलाकात का यह प्रसंग उनकी सादगी और शिक्षा के प्रति प्रतिबद्धता की याद दिलाता है.
21 अगस्त 2007: जमशेदपुर में टाटा स्टील के कार्यक्रम में शामिल हुए
अगस्त 2007 में डॉ. कलाम के जमशेदपुर आने का उल्लेख भी समाचार रिपोर्टों में मिलता है. इस दौरे को टाटा स्टील के शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों से जोड़ा जाता है.
24 फरवरी 2011: बीआईटी मेसरा, रांची
राष्ट्रपति पद छोड़ने के बाद भी डॉ. कलाम का झारखंड आना जारी रहा. 24 फरवरी 2011 को वे रांची स्थित बिरला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (बीआईटी), मेसरा के 21वें दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए. संस्थान के आधिकारिक रिकॉर्ड में इसका उल्लेख है.
झारखंड के विकास पर भी रखी थी अपनी बात
डॉ. कलाम का झारखंड दौरा केवल गांव और बच्चों तक सीमित नहीं था. फरवरी 2004 में रांची में उन्होंने झारखंड विधानसभा के सदस्यों को संबोधित किया था. अपने संबोधन में उन्होंने राज्य के विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, उद्योग और तकनीक की भूमिका पर विचार रखे थे.
रांची के राजभवन में विद्यार्थियों से बातचीत के दौरान उन्होंने सीखने, रचनात्मकता और जिज्ञासा के महत्व पर जोर दिया. उनका मानना था कि युवाओं को सवाल पूछने, नए विचार विकसित करने और ज्ञान के आधार पर आगे बढ़ने के अवसर मिलने चाहिए.
जयंती पर मरांगहातु का यह प्रसंग महत्वपूर्ण क्यों?
डॉ. कलाम की जयंती पर अक्सर उनके प्रेरक विचारों, वैज्ञानिक उपलब्धियों और राष्ट्रपति के रूप में उनके कार्यकाल की चर्चा होती है. लेकिन मरांगहातु की यह घटना उनके व्यक्तित्व का एक अलग पहलू सामने लाती है. देश का सर्वोच्च संवैधानिक पद संभालने वाला व्यक्ति जब रास्ते में बच्चों को देखकर रुकता है, उनसे बातचीत करता है और उनके स्कूल की जरूरतों पर ध्यान देता है, तो शिक्षा के प्रति उसकी प्राथमिकता स्पष्ट होती है.
कलाम 27 जुलाई 2015 को इस दुनिया से विदा हो गए, लेकिन बच्चों को सपने देखने, सीखने और अपने ज्ञान का उपयोग समाज के विकास में करने की उनकी प्रेरणा आज भी प्रासंगिक है.

