जोहार लाइव ब्यूरो
झारखंड हाईकोर्ट ने दुष्कर्म के आरोप में करीब छह महीने से ऑब्जर्वेशन होम में रह रहे 15 वर्षीय नाबालिग को जमानत दे दी है. कोर्ट ने कहा कि किशोर न्याय अधिनियम के तहत नाबालिग को जमानत देना सामान्य नियम है, जबकि जमानत से इनकार करना अपवाद है. केवल इस आशंका के आधार पर जमानत से इनकार नहीं किया जा सकता कि रिहा होने के बाद नाबालिग का संपर्क अपराधियों से हो सकता है. इसके लिए ठोस आधार और साक्ष्य होना जरूरी है.
जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की अदालत ने 14 अक्टूबर 2026 को यह फैसला सुनाया. अदालत ने किशोर न्याय बोर्ड, रांची और विशेष न्यायाधीश, पॉक्सो, रांची के जमानत खारिज करने संबंधी आदेशों को रद्द कर दिया. साथ ही नाबालिग को उसके पिता की जिम्मेदारी और शर्तों के आधार पर जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया.
कोर्ट ने एक खास बात कही. हाईकोर्ट ने नाबालिग को उसके प्राकृतिक अभिभावक यानी पिता की जमानत और आश्वासन पर रिहा करने का निर्देश दिया. इसके लिए पिता को लिखित आश्वासन देना होगा कि वह बेटे को ज्ञात अपराधियों के संपर्क में नहीं आने देंगे, उसे किसी भी नैतिक, शारीरिक या मानसिक खतरे से बचाएंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि वह दोबारा ऐसा अपराध न करे.
पिता को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि नाबालिग अपनी पढ़ाई जारी रखे और रचनात्मक गतिविधियों में हिस्सा ले. इस फैसले के साथ हाईकोर्ट ने नाबालिग की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका स्वीकार करते हुए निचली अदालतों के आदेश रद्द कर दिए.
क्या है पूरा मामला?
मामला रांची के सदर थाना कांड संख्या 189/2026 से जुड़ा है. नाबालिग के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 64(1) और पॉक्सो एक्ट की धारा 4 के तहत मामला दर्ज है. आरोप है कि शादी का भरोसा देकर पीड़िता के साथ शारीरिक संबंध बनाए गए. याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि घटना के समय उसकी उम्र करीब 15 साल पांच महीने थी. वह और पीड़िता एक ही स्कूल में पढ़ते थे और एक-दूसरे को पसंद करते थे. याचिका में यह भी कहा गया कि दोनों शादी करना चाहते थे.
नाबालिग 19 अप्रैल 2026 से ऑब्जर्वेशन होम में रह रहा था. किशोर न्याय बोर्ड ने 24 जून 2026 को उसकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी. इसके बाद अतिरिक्त न्यायिक आयुक्त-सह-विशेष न्यायाधीश, पॉक्सो, रांची ने 31 जुलाई 2026 को अपील भी खारिज कर दी. इसके बाद नाबालिग ने हाईकोर्ट में आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दायर की.
सोशल इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट में मिला अच्छा व्यवहार
हाईकोर्ट में नाबालिग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता बीएम त्रिपाठी ने दलील दी कि सामाजिक जांच रिपोर्ट में उसके खिलाफ कोई प्रतिकूल बात सामने नहीं आई है. रिपोर्ट के मुताबिक, नाबालिग छात्र है और इलाके में उसका व्यवहार अच्छा पाया गया है. यह भी बताया गया कि उसका यह पहला अपराध है और रिपोर्ट में उसे अपनी पढ़ाई जारी रखने देने की सिफारिश की गई है.
वहीं, राज्य सरकार की ओर से जमानत का विरोध करते हुए कहा गया कि शादी का भरोसा देकर शारीरिक संबंध बनाने का आरोप है. निचली अदालतों ने इस आशंका के आधार पर जमानत देने से इनकार किया था कि रिहा होने पर किशोर नैतिक, शारीरिक या मानसिक खतरे में पड़ सकता है अथवा अपराधियों के संपर्क में आ सकता है.

