आज से ठीक 28 साल पहले, 21 सितंबर 1998 का दिन झारखंड आंदोलन के इतिहास में एक बेहद जटिल और वैचारिक संघर्ष का गवाह बना था. राजधानी रांची से लेकर पटना के सत्ता के गलियारों तक इस बात को लेकर तीखा टकराव था कि जिस अलग राज्य की मांग लंबे समय से की जा रही है, उसका स्वरूप आखिर कैसा होगा.
उस दौर की सच्चाई यह थी कि विवाद केवल इस बात पर नहीं था कि अलग राज्य बनेगा या नहीं; असली विवाद इस बात पर था कि उस राज्य की सीमाएं कितनी बड़ी होंगी, उसका नाम क्या रखा जाएगा और उसे हासिल करने की राजनीतिक दिशा क्या होगी.
अलग राज्य की मांग, फिर सड़कों पर क्यों उतरा जनसैलाब?
दरअसल, 1998 में आंदोलनकारी अलग राज्य के विरोध में नहीं थे. उनका विरोध उस शर्त और सीमित दायरे के खिलाफ था, जिसे केंद्र और राज्य सरकारें अपनी सुविधानुसार तय करना चाहती थीं.
वर्ष 1997 में खुद बिहार विधानसभा ने अलग झारखंड राज्य के गठन के पक्ष में प्रस्ताव पारित किया था. परंतु, 1998 आते-आते राजनीतिक समीकरण बदले और तत्कालीन आरजेडी सरकार इस मुद्दे पर पीछे हटने लगी. सत्ता के इस टालमटोल रवैये ने झारखंड समर्थक ताकतों और आम जनता के भीतर गहरा आक्रोश पैदा कर दिया था. स्थिति यहां तक पहुंच गई थी कि झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) को तत्कालीन बिहार सरकार से समर्थन वापसी तक की घोषणा करनी पड़ी थी.
वनांचल बनाम झारखंड : अस्मिता और नाम की वैचारिक जंग
इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में एक बड़ा सवाल नाम का भी था. केंद्र सरकार द्वारा लाए गए ‘बिहार पुनर्गठन विधेयक, 1998’ में प्रस्तावित नए राज्य के लिए ‘वनांचल’ शब्द का प्रयोग किया गया था, जबकि दशकों से चल रहा पूरा संघर्ष ‘झारखंड’ की पारंपरिक और सांस्कृतिक पहचान के नाम पर लड़ा जा रहा था.
झारखंड पार्टी के वरिष्ठ नेता, लेखक और चिंतक लाल रणविजयनाथ शाहदेव ने इस प्रस्ताव के खिलाफ वैचारिक और राजनीतिक मोर्चा खोला. उन्होंने अपनी लेखनी, कविताओं और भाषणों के जरिए पुरजोर तरीके से यह स्थापित किया कि ‘वनांचल’ महज एक प्रशासनिक और थोपा गया शब्द है, जबकि इस क्षेत्र की ऐतिहासिक और मूल पहचान केवल ‘झारखंड’ नाम से ही जुड़ी हो सकती है.
18 जिलों का सीमित दायरा या वृहद झारखंड का वृहद सपना?
केंद्र सरकार के 1998 के प्रस्ताव में दक्षिण बिहार के महज 18 जिलों को शामिल कर नया राज्य बनाने की रूपरेखा थी.
इसके विपरीत, आंदोलन के भीतर एक बहुत बड़ा वर्ग ‘वृहद झारखंड’ की परिकल्पना पर अडिग था. आंदोलन के दिग्गज नेता एनई होरो जैसे विचारकों का स्पष्ट तर्क था कि झारखंड की भौगोलिक और सांस्कृतिक सीमाएं सिर्फ वर्तमान झारखंड तक सीमित नहीं हैं; इसमें पश्चिम बंगाल, ओडिशा और तत्कालीन मध्य प्रदेश के उन तमाम आदिवासी बहुल क्षेत्रों को भी समाहित किया जाना चाहिए, जिनका साझा इतिहास और संस्कृति इस क्षेत्र से जुड़ी है.
यही कारण था कि केंद्र का 18 जिलों वाला प्रस्ताव आंदोलन के भीतर पल रहे उस दूरगामी और बड़े सपने के मुकाबले बेहद सीमित और अधूरा प्रतीत हो रहा था. हालांकि, आंदोलन के भीतर रणनीतिक मतभेद भी थे—एक धड़ा मानता था कि “फिलहाल 18 जिलों का राज्य ही स्वीकार कर लिया जाए, ताकि आगे की राह खुले,” जबकि दूसरा धड़ा सीमा और नाम दोनों पर किसी भी प्रकार के समझौते के पक्ष में नहीं था.
वे चेहरे, जिन्होंने इतिहास को गढ़ा
- इस दौर के संघर्ष को दिशा देने वाले कई प्रमुख राजनीतिक और वैचारिक चेहरे एक साझा मंच पर आए थे:
- प्रमुख राजनीतिक हस्तियां: शिबू सोरेन, एनई होरो, सिमोन मरांडी, सूरज मंडल और सुधीर महतो.
- बौद्धिक व न्यायिक योगदान: न्यायविद् लाल पिंगले नाथ शाहदेव (लाल रणविजयनाथ शाहदेव से भिन्न व्यक्तित्व) ने बिखरे हुए क्षेत्रीय दलों और नेताओं को एक साझा मंच पर लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
- सक्रिय संगठन: झारखंड मुक्ति मोर्चा, झारखंड पार्टी, आजसू (AJSU) और झारखंड पीपुल्स पार्टी.
21 सितंबर 1998: राजनीतिक दबाव का दिन
21 सितंबर 1998 को झारखंड समर्थक संगठनों ने राज्यव्यापी बंद और तीखे विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया. इसका प्रत्यक्ष उद्देश्य बिहार सरकार के बदलते रुख और केंद्र के सीमित प्रस्ताव पर निर्णायक दबाव बनाना था. रांची समेत पूरे क्षेत्र में सड़कों पर उतरी जनता ने यह संदेश दिया कि वे किसी भी ऐसे अधूरे समझौते को स्वीकार नहीं करेंगे जो उनकी आकांक्षाओं के विपरीत हो.
साल 1998 का यह गतिरोध उस वक्त तुरंत समाप्त नहीं हुआ. राजनीतिक अनिश्चितता और वार्ताओं का दौर जारी रहा. अंततः, राष्ट्रीय राजनीति में अनुकूल परिस्थितियां बनने के बाद संसद ने ‘बिहार पुनर्गठन अधिनियम, 2000’ को पारित किया.
परिणामस्वरूप, 15 नवंबर 2000 को वह ऐतिहासिक क्षण आया जब प्रस्तावित और खारिज किया जा चुका नाम ‘वनांचल’ पीछे छूट गया और देश के मानचित्र पर ‘झारखंड’ नाम से एक स्वतंत्र राज्य का उदय हुआ.
(प्रस्तुति : विजय उरांव)
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