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    Home»जोहार ब्रेकिंग»डेंजर ज़ोन में भारत के 90 प्रतिशत उपग्रह : कैसे अपनी सैटेलाइट्स को सुरक्षित बचा रहा है इसरो?
    जोहार ब्रेकिंग

    डेंजर ज़ोन में भारत के 90 प्रतिशत उपग्रह : कैसे अपनी सैटेलाइट्स को सुरक्षित बचा रहा है इसरो?

    joharlive NetworkBy joharlive NetworkSeptember 18, 2026Updated:September 18, 2026No Comments4 Mins Read13
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    सैटेलाइट्स
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    विजय उरांव

    पृथ्वी से 400 से 600 किलोमीटर ऊपर, जहां हमारी मौसम, संचार और रणनीतिक आंखें तैनात हैं, वहां बंदूक की गोली से भी 10 गुना तेज रफ्तार से हजारों अदृश्य खतरे चक्कर काट रहे हैं. 28,000 किमी/घंटा की गति से तैरता हुआ महज 1 सेंटीमीटर का एक छोटा सा टुकड़ा भी किसी सक्रिय उपग्रह के परखच्चे उड़ाने के लिए टीएनटी (TNT) बम जितना घातक साबित हो सकता है. यह किसी साइंस-फिक्शन फिल्म का दृश्य नहीं, बल्कि लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) में भारत की करोड़ों रुपये की अंतरिक्ष संपत्तियों पर हर सेकंड मंडराता असल खतरा है.

    डेंजर जोन में भारत के 90 प्रतिशत उपग्रह

    पृथ्वी की निचली कक्षा (LEO) इस समय इंसानी गतिविधियों के मलबे से पटी पड़ी है—पुराने रॉकेट्स के टुकड़े, काम करना बंद कर चुके मृत उपग्रह और अंतरिक्ष में हुए विखंडनों का कचरा. स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस समय LEO में तैनात भारत के 22 सक्रिय उपग्रहों में से 20 सीधे तौर पर इसी ‘हाई-रिस्क जोन’ में अपनी सेवाएं दे रहे हैं.

    अंतरिक्ष में ‘आपातकालीन ब्रेक’: CAM का गणित

    जब भी कोई मलबा किसी भारतीय उपग्रह के तय सुरक्षा घेरे में प्रवेश करने लगता है, तो वैज्ञानिक हाथ पर हाथ धरकर नहीं बैठते. वैज्ञानिक तुरंत अलर्ट मोड में आकर उपग्रह की कक्षा (Orbit) खिसकाने का ऑपरेशन शुरू करते हैं. इस प्रक्रिया को तकनीकी भाषा में Collision Avoidance Manoeuvre (CAM) कहा जाता है.

    सीधे शब्दों में कहें तो, यह सैटेलाइट के ऑन-बोर्ड थ्रस्टर्स को दागकर उसकी कक्षा (Orbit) को कुछ समय के लिए थोड़ा खिसका देने की तकनीक है ताकि टक्कर टाली जा सके:

    * वर्ष 2025: ISRO को 20 बार अपनी सैटेलाइट्स का रास्ता बदलना पड़ा.
    * वर्ष 2026 (अगस्त तक): 9 बार यह आपातकालीन ऑर्बिटल बदलाव किया जा चुका है.

    अदृश्य आर्थिक चोट: ईंधन और उम्र का खेल

    हर बार जब उपग्रह की दिशा बदलने के लिए थ्रस्टर्स जलते हैं, तो उसका बेहद कीमती ऑन-बोर्ड ईंधन खर्च होता है. उपग्रहों में ईंधन सीमित होता है; जैसे ही ईंधन खत्म, सैटेलाइट का जीवन समाप्त. लगातार कक्षा बदलने की इस मजबूरी से उपग्रहों की कार्यशील उम्र (Lifespan) घट रही है, जिससे सैकड़ों करोड़ रुपये का सीधा परोक्ष नुकसान होता है. इसके अलावा, वैश्विक स्तर पर सैटेलाइट्स के थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस का प्रीमियम भी तेजी से बढ़ रहा है.

    भारत का त्रिस्तरीय रडार कवच (SSA)

    कचरे के इस समंदर में अपने उपग्रहों को सुरक्षित रखने के लिए भारत ने Space Situational Awareness (SSA) का तीन-स्तरीय रक्षा तंत्र खड़ा किया है:

    * MOTR (Multi-Object Tracking Radar): श्रीहरिकोटा में स्थित यह स्वदेशी रडार LEO में मौजूद कई मलबों और वस्तुओं को एक साथ ट्रैक करता है.

    * NETRA (बेंगलुरु): यह ISRO का केंद्रीय कमांड सेंटर है, जहां उपग्रहों और मलबे के डेटा का 24 घंटे रियल-टाइम विश्लेषण कर खतरे की चेतावनी जारी की जाती है.

    * हनले (लद्दाख) की ऑप्टिकल दूरबीन: जियोस्टेशनरी ऑर्बिट (लगभग 36,000 किमी ऊंचाई) में मौजूद 30 सेमी या उससे बड़े कचरे की टोह लेने के लिए लद्दाख के हनले में अत्याधुनिक ऑप्टिकल टेलीस्कोप तैनात किया जा रहा है.

    2030 का विजन: कचरा-मुक्त अंतरिक्ष और निजी जवाबदेही

    समस्या से केवल बचने के बजाय भारत अब इसके जड़ से समाधान पर काम कर रहा है. Debris Free Space Mission (DFSM) के तहत भारत ने 2030 तक ‘Zero Debris’ अंतरिक्ष अभियानों का लक्ष्य तय किया है, ताकि भविष्य में कोई भी भारतीय रॉकेट या सैटेलाइट अंतरिक्ष में कचरा न छोड़े.
    साथ ही, IN-SPACe के जरिए निजी स्पेस कंपनियों के लिए सख्त दिशा-निर्देश और नुकसान की कानूनी जिम्मेदारी (Liability Framework) तय की जा रही है.

    इतना ही नहीं, गगनयान मिशन के लिए बन रहे एडवांस्ड लाइफ-सपोर्ट और बायोमेडिकल सिस्टम्स की ग्राउंड टेस्टिंग पूरी होने के बाद इन स्पेस-ग्रेड तकनीकों को देश के नागरिक अस्पतालों और क्रिटिकल हेल्थकेयर सिस्टम में इस्तेमाल करने की तैयारी है.

    चुनौती अब केवल नए उपग्रह छोड़ने की नहीं, बल्कि अंतरिक्ष के इस ‘कब्रिस्तान’ के बीच अपनी संपत्तियों को सुरक्षित बचाकर देश को जोड़े रखने की है.

    Also Read : ISRO अब खुद नहीं बनाएगा रॉकेट, प्राइवेट सेक्टर को सौंपी जाएगी पूरी लॉन्च व्हीकल टेक्नोलॉजी

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