रांची. झारखंड देश के बड़े खनिज और औद्योगिक राज्यों में शामिल है. कोयला, लौह अयस्क, चूना पत्थर, स्टील, सीमेंट और दूसरे औद्योगिक उत्पादों की बड़े पैमाने पर ढुलाई रेलवे के जरिए होती है. यानी झारखंड का रेलवे नेटवर्क सिर्फ यात्रियों के लिए नहीं, बल्कि रेलवे की फ्रेट कमाई का भी बड़ा आधार है.
लेकिन जब राज्यसभा में झारखंड से रेलवे को मिलने वाले कमर्शियल और फ्रेट रेवेन्यू तथा राज्य में रेलवे के कैपिटल री-इन्वेस्टमेंट का पिछले पांच वर्षों का साल-दर-साल हिसाब मांगा गया, तो रेल मंत्रालय ने झारखंड का अलग आंकड़ा देने के बजाय जवाब को तीन जोनल रेलवे तक सीमित कर दिया.
सांसद परिमल नथवाणी के सवाल के जवाब में रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बताया कि झारखंड का क्षेत्र पूर्वी रेलवे, पूर्व मध्य रेलवे और दक्षिण पूर्व रेलवे के अंतर्गत आता है. मंत्रालय के मुताबिक राजस्व और खर्च का सेगमेंट-वाइज ब्योरा जोनल स्तर पर उपलब्ध है.
झारखंड में रेलवे का बड़ा निवेश
रेल मंत्रालय ने झारखंड में रेलवे इंफ्रास्ट्रक्चर पर बढ़ते खर्च के आंकड़े जरूर सामने रखे हैं. वर्ष 2009-14 के दौरान झारखंड में पूरी या आंशिक रूप से आने वाली परियोजनाओं पर औसतन ₹457 करोड़ सालाना का आउटले था. वर्ष 2026-27 में यह बढ़कर करीब ₹7,536 करोड़ हो गया है. मंत्रालय इसे करीब 16 गुना बढ़ोतरी बता रहा है.
वित्त वर्ष 2009-14 के दौरान झारखंड में कुल 287 किमी नई रेल लाइन कमीशन हुई थी, यानी औसतन 57 किमी सालाना.
वर्ष 2014-26 के दौरान यह आंकड़ा बढ़कर 1,371 किमी हो गया. इस अवधि में औसतन 114 किमी प्रति वर्ष नई लाइन कमीशन हुई. मंत्रालय के अनुसार रफ्तार करीब दोगुनी हुई है.
36 परियोजनाएं, लागत ₹60,064 करोड़
एक अप्रैल 2026 तक झारखंड से पूरी या आंशिक रूप से जुड़ी 36 रेलवे परियोजनाएं स्वीकृत हैं. इनमें 10 नई लाइन और 26 डबलिंग/मल्टी-ट्रैकिंग परियोजनाएं शामिल हैं.
इनकी कुल लंबाई 2,887 किमी और अनुमानित लागत ₹60,064 करोड़ है. मार्च 2026 तक इनमें 615 किमी लाइन कमीशन हो चुकी है और ₹18,411 करोड़ खर्च किए जा चुके हैं.
नई लाइन की 10 परियोजनाओं की लंबाई 753 किमी है, जिसमें 156 किमी कमीशन हो चुकी है. इन पर ₹4,853 करोड़ खर्च हुए हैं. वहीं 26 डबलिंग/मल्टी-ट्रैकिंग परियोजनाओं की लंबाई 2,133 किमी है, जिसमें 458 किमी कमीशन हो चुकी है और ₹13,558 करोड़ खर्च किए गए हैं.
बड़ी परियोजनाओं पर जारी है काम
झारखंड से जुड़ी कई अहम परियोजनाएं फिलहाल निर्माणाधीन हैं. इनमें कोडरमा-तिलैया नई लाइन, बुरामारा-चाकुलिया नई लाइन, धनबाद-सोननगर तीसरी लाइन, बोंडामुंडा-रांची दोहरीकरण, खड़गपुर-आदित्यपुर तीसरी लाइन, चांडिल-बर्नपुर तीसरी लाइन, कोडरमा-बरकाकाना दोहरीकरण और भागलपुर-रामपुरहाट दोहरीकरण शामिल हैं.
इन परियोजनाओं की लागत हजारों करोड़ रुपये है और इनका मकसद झारखंड के खनिज और औद्योगिक इलाकों की रेल कनेक्टिविटी और माल ढुलाई क्षमता बढ़ाना है.
इसके अलावा कई नई परियोजनाओं के DPR और सर्वे का काम भी आगे बढ़ा है. वर्ष 2023-24 से 2026-27 के दौरान झारखंड से पूरी या आंशिक रूप से जुड़ी 25 सर्वे परियोजनाएं स्वीकृत हुई हैं. इनमें एक नई लाइन और 24 दोहरीकरण परियोजनाएं हैं, जिनकी कुल लंबाई 908 किमी है.
रेल मंत्रालय ने परियोजनाओं में देरी के लिए भूमि अधिग्रहण, वन स्वीकृति, यूटिलिटी शिफ्टिंग, वैधानिक मंजूरियां, भौगोलिक परिस्थितियां और कानून-व्यवस्था जैसी वजहें गिनाई हैं. इसके अलावा साल में काम के लिए उपलब्ध महीनों की संख्या भी समय और लागत को प्रभावित करती है.

लेकिन सबसे बड़ा सवाल कमाई पर
पूरे जवाब में सबसे अहम बात यही है कि झारखंड से रेलवे ने पिछले पांच वर्षों में कितना कमर्शियल और फ्रेट रेवेन्यू कमाया और उसके मुकाबले राज्य में कितना कैपिटल री-इन्वेस्टमेंट किया—इसका झारखंड-विशेष, साल-दर-साल आंकड़ा सामने नहीं आया.
सरकार ने झारखंड में बजट, नई रेल लाइन, डबलिंग और स्वीकृत परियोजनाओं के आंकड़े विस्तार से बताए हैं. लेकिन रेलवे की कमाई बनाम झारखंड में पुनर्निवेश का सीधा हिसाब नहीं दिया गया.
यानी संसद में सवाल था—झारखंड रेलवे को कितना देता है और बदले में झारखंड में कितना लौटता है?
जवाब में परियोजनाओं का पूरा ब्यौरा तो आया, लेकिन कमाई और पुनर्निवेश का सीधा पांच साल का हिसाब अब भी साफ नहीं हुआ.
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