किसी आंदोलन से डरना नहीं चाहिए, लेकिन आंदोलन के पीछे खड़ी राजनीति से सवाल जरूर पूछना चाहिए. इतिहास में ऐसे कई आंदोलन हुए हैं जिनकी शुरुआत किसी वास्तविक शिकायत से हुई, लेकिन धीरे-धीरे उनका एजेंडा उस शिकायत से बड़ा हो गया. मीडिया की व्यूअरशिप, राजनीतिक महत्वाकांक्षा और कुछ चेहरों की अपनी जगह बनाने की कोशिश जब एक साथ आती है, तो आंदोलन का असली मुद्दा पीछे छूट सकता है.
आज बुद्धदेव भट्टाचार्य की पुण्यतिथि है. उन्हें याद करते हुए सिंगूर को याद करना इसलिए जरूरी है क्योंकि सिंगूर सिर्फ जमीन का विवाद नहीं था. उसने बंगाल की राजनीति की दिशा बदल दी. एक ऐसा आंदोलन खड़ा हुआ जिसने बुद्धदेव भट्टाचार्य की पूरी राजनीति को सिंगूर और नंदीग्राम की असफलता तक समेट दिया.
बुद्धदेव की सबसे बड़ी त्रासदी उनकी सरकार की हार नहीं, बल्कि उनके राजनीतिक प्रयोग की हार थी.
आर्थिक उदारीकरण के बाद भी वामपंथ का एक बड़ा हिस्सा पूंजी, उद्योग और निजी निवेश को संदेह की नजर से देख रहा था. बुद्धदेव इससे अलग सोच रहे थे. वे समझ रहे थे कि अगर लेफ्ट को भविष्य की राजनीति करनी है तो उसे मजदूर और किसान के सवालों के साथ उद्योग, रोजगार, तकनीक और शिक्षा के सवालों पर भी अपनी नीति बनानी होगी.
वे लेफ्ट को पूंजी के हवाले नहीं करना चाहते थे. वे औद्योगिकीकरण को सामाजिक विकास के अपने मॉडल का हिस्सा बनाना चाहते थे. उनका ‘Do It Now’ इसी सोच का प्रतीक था.
उनके दौर को सिर्फ सिंगूर और नंदीग्राम से देखने पर बंगाल में हुए कई महत्वपूर्ण बदलाव छूट जाते हैं. 2000 से 2010 के बीच प्रोफेशनल और वोकेशनल शिक्षा के लिए सरकारी और निजी संस्थानों का विस्तार हुआ. छोटे शहरों तक इंजीनियरिंग और तकनीकी शिक्षा पहुंची. कोलकाता को IT और आधुनिक उद्योगों के लिए तैयार करने की कोशिश हुई. पारंपरिक शिक्षा व्यवस्था में बदलाव और मदरसों में आधुनिक शिक्षा की वकालत भी इसी सोच का हिस्सा थी.

आज जब झारखंड के युवा नौकरी और बेहतर शिक्षा के लिए बाहर जाने को मजबूर हैं, तब बुद्धदेव की यह सोच और प्रासंगिक लगती है. सवाल सिर्फ नौकरियों का नहीं है. सवाल यह है कि क्या कोई राज्य अपने युवाओं के लिए शिक्षा, कौशल और रोजगार का ऐसा ढांचा बना रहा है, जहां उन्हें अवसर की तलाश में अपना राज्य छोड़ना न पड़े.
यहीं से आज के झारखंड के आंदोलन को भी देखना चाहिए.
छात्र आंदोलन कर रहे हैं. उनकी शिकायतें हैं, उनके सवाल हैं और सरकार से जवाब मांगना उनका अधिकार है. लेकिन आंदोलन के बीच यह सवाल भी होना चाहिए कि इसका लक्ष्य क्या है – सिर्फ सत्ता को घेरना या व्यवस्था को बदलना?
अगर परीक्षा में गड़बड़ी है तो उसका समाधान क्या है? नियुक्ति में देरी है तो समयबद्ध रास्ता क्या है? शिक्षा व्यवस्था कमजोर है तो उसे सुधारने का मॉडल क्या है?

किसी आंदोलन की सफलता भीड़, कैमरों और वायरल नारों से तय नहीं होती. यह देखना होता है कि उसके बाद छात्रों और युवाओं की जिंदगी में क्या बदला.
सिंगूर और अन्ना आंदोलन दोनों से यही सवाल निकलता है. वास्तविक शिकायतों को राजनीतिक ऊर्जा मिलना लोकतंत्र के लिए जरूरी है, लेकिन वही ऊर्जा अगर सिर्फ सत्ता विरोध या नए राजनीतिक चेहरों की जमीन तैयार करने में खर्च हो जाए तो अंततः नुकसान उसी समाज का होता है जिसके नाम पर आंदोलन खड़ा किया गया था.
बुद्धदेव की गलतियां थीं. सिंगूर और नंदीग्राम पर उनकी सरकार की आलोचना होनी चाहिए. लेकिन उनकी पूरी राजनीति को वहीं खत्म कर देना इतिहास को बहुत आसान बना देना है.
अगर उनका औद्योगिकीकरण, आधुनिक शिक्षा और तकनीक से जुड़ा प्रयोग सफल होता, तो शायद भारतीय वामपंथ के पास आज भविष्य की राजनीति के लिए एक अलग आर्थिक मॉडल होता.
दुर्भाग्य से बुद्धदेव हार गए. उनके साथ वामपंथ के भीतर भविष्य की ओर देखने वाली एक संभावना भी कमजोर हुई.
यही सबक हेमंत सोरेन को बुद्धदेव के पतन से लेना चाहिए. झारखंड में चल रहे इस आंदोलन का जल्द से जल्द समाधान निकालना जरूरी है. छात्रों के सवालों को लंबा खींचना या यह मान लेना कि समय के साथ आंदोलन खत्म हो जाएगा, सरकार के लिए महंगा पड़ सकता है.
आंदोलन को खत्म करने का सबसे बेहतर रास्ता उसे दबाना नहीं, उसके मूल सवाल का समाधान करना है.
बुद्धदेव को याद करने का अर्थ सिर्फ अतीत को याद करना नहीं है. यह समझना भी है कि कभी-कभी एक फर्जी आंदोलन सिर्फ एक सरकार को नहीं हराता, वह पूरी राजनीतिक दिशा को वर्षों पीछे धकेल देता है.
(सचिन झा शेखर, लेखर वरिष्ठ पत्रकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)
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