“संताल 12 महीने मेहनत करता है, लेकिन भूखा रहता है और फसल महाजन ले जाते हैं, यह व्यवस्था बदलनी चाहिए.” सत्तर के दशक में दिशोम गुरु शिबू सोरेन ने महाजनी प्रथा के दौर में यह बात कही थी. यहीं से झारखंड की राजनीति का एक बड़ा टर्निंग पॉइंट आता है. इस दौर को धनकटनी आंदोलन के नाम से जाना जाता है.
झारखंड के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जिन्हें सिर्फ राजनीतिक नेताओं की सूची में नहीं रखा जा सकता. वे एक दौर, एक आंदोलन और एक सामाजिक चेतना का हिस्सा बन जाते हैं. शिबू सोरेन भी ऐसा ही एक नाम हैं.
आज शिबू सोरेन की पहली पुण्यतिथि है. यह दिन केवल श्रद्धांजलि का नहीं, बल्कि उस इतिहास को याद करने का मौका भी है, जिसने झारखंड की राजनीतिक चेतना को आकार दिया. झारखंड राज्य बनने की कहानी भले ही कई नेताओं, संगठनों और असंख्य अनाम संघर्षकर्ताओं के संघर्ष से लिखी गई हो, लेकिन इस आंदोलन को गांव-गांव तक पहुंचाने वाले चेहरों में शिबू सोरेन का नाम सबसे आगे है.
उन्हें “दिशोम गुरु” कहा गया. यह उपाधि किसी सरकार ने नहीं दी थी, बल्कि उन लोगों ने दी, जिनके बीच वे दशकों तक रहे. जंगलों, पहाड़ों और आदिवासी गांवों में उनका नाम सिर्फ एक नेता के तौर पर नहीं, बल्कि एक भरोसे के तौर पर लिया जाता था. लेकिन इस कहानी की शुरुआत किसी सत्ता के संघर्ष से नहीं, बल्कि एक हत्या से हुई थी.
एक हत्या, जिसने प्रतिरोध का बीज बोया
तत्कालीन बिहार, अब झारखंड के रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में 11 जनवरी 1944 को शिबू सोरेन का जन्म हुआ था. उनके पिता सोबरन मांझी शिक्षक थे और आदिवासी समाज में बढ़ते महाजनी शोषण के खिलाफ आवाज उठाते थे. उस समय छोटानागपुर और संताल परगना के कई इलाकों में महाजन और साहूकार कर्ज के बदले आदिवासियों की जमीन अपने कब्जे में ले रहे थे.
शोषण के खिलाफ आवाज उठाने के कारण 27 नवंबर 1957 को सोबरन सोरेन की हत्या कर दी गई. उस समय शिबू की उम्र करीब 13-14 वर्ष थी. परिवार पर दुख का पहाड़ टूट पड़ा, लेकिन इसी घटना ने एक किशोर के भीतर प्रतिरोध का बीज बो दिया.
बाद में शिबू सोरेन कई बार कहते थे कि पिता की हत्या ने उन्हें समझा दिया था कि लड़ाई केवल एक परिवार की नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था के खिलाफ है.
साल 1960 के दशक में उन्होंने संताल क्षेत्र के युवाओं को संगठित करना शुरू किया. संताल नवयुवक संघ के माध्यम से ग्रामीण युवाओं को जोड़ते हुए उन्होंने महाजनी प्रथा खत्म करने, आदिवासियों की जमीन वापस दिलाने और शोषण के खिलाफ संघर्ष को अपना मुख्य मुद्दा बनाया.
यहीं से शुरू हुआ वह आंदोलन, जिसे बाद में “धानकटनी आंदोलन” कहा गया. जिन खेतों पर महाजनों ने कब्जा कर लिया था, वहां आदिवासी किसान सामूहिक रूप से जाकर फसल काटते और उसे मूल जमीन मालिकों को सौंप देते. यह केवल आर्थिक प्रतिरोध नहीं था, बल्कि जमीन पर अपने अधिकार की घोषणा थी.
कई जगह टकराव हुए, मुकदमे दर्ज हुए, लेकिन आंदोलन फैलता गया. शिबू सोरेन की राजनीति की जड़ें यहीं थीं—जमीन, शोषण और अपने अधिकार के लिए खड़े होने की राजनीति.
सामाजिक आंदोलन से राजनीतिक संघर्ष तक
साल 1970 के दशक की शुरुआत तक यह साफ हो गया था कि केवल सामाजिक आंदोलन से अलग राज्य की मांग पूरी नहीं होगी. आंदोलन को एक राजनीतिक मंच की जरूरत थी.
2 फरवरी 1972 को शिबू सोरेन, ट्रेड यूनियन नेता ए.के. रॉय और कुर्मी नेता बिनोद बिहारी महतो ने मिलकर झारखंड मुक्ति मोर्चा की नींव रखी. 1973 में संगठन का गठन हुआ. तीनों नेताओं की सामाजिक और वैचारिक पृष्ठभूमि अलग थी, लेकिन लक्ष्य एक था—झारखंड की अलग पहचान और यहां के लोगों के अधिकार.
बिनोद बिहारी महतो सामाजिक आधार तैयार कर रहे थे. ए.के. रॉय मजदूर राजनीति की आवाज थे. शिबू सोरेन गांवों और आदिवासी समाज को जोड़ रहे थे. यही त्रिकोण झारखंड आंदोलन की बड़ी ताकत बना.
अलग झारखंड की मांग हालांकि नई नहीं थी. जयपाल सिंह मुंडा संविधान सभा से लेकर संसद तक यह मुद्दा उठा चुके थे. लेकिन 1970 के दशक में शिबू सोरेन ने इस आंदोलन को नई ऊर्जा दी. उन्होंने अलग राज्य की मांग को सिर्फ प्रशासनिक पुनर्गठन का सवाल नहीं रहने दिया. इसे जमीन, पहचान, संस्कृति, भाषा, रोजगार और प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार से जोड़ दिया. यही वह बदलाव था, जिसने आंदोलन को गांवों तक पहुंचाया और हजारों युवाओं को इससे जोड़ा. 1980 के लोकसभा चुनाव में शिबू सोरेन पहली बार दुमका से संसद पहुंचे. यह सिर्फ एक चुनावी जीत नहीं थी, बल्कि उस आंदोलन की राजनीतिक स्वीकार्यता थी, जिसे लंबे समय तक क्षेत्रीय असंतोष मानकर नजरअंदाज किया गया था.
संसद में उन्होंने अलग राज्य, आदिवासी अधिकार, विस्थापन और खनिज संपदा में स्थानीय लोगों की भागीदारी का मुद्दा उठाया. धीरे-धीरे झारखंड का सवाल राष्ट्रीय राजनीति के एजेंडे में शामिल होने लगा.
आंदोलन का सबसे कठिन दौर
साल 1980 और 1990 का दशक झारखंड आंदोलन के लिए संघर्ष का सबसे कठिन दौर था. आंदोलन कई बार बंटा, नए संगठन बने, नए नेतृत्व उभरे और रणनीतियों को लेकर मतभेद सामने आए. निर्मल महतो के नेतृत्व में आजसू का उदय हुआ. झारखंड समन्वय समिति बनी. आर्थिक नाकेबंदी, रेल रोको और बड़े जनप्रदर्शनों ने केंद्र और बिहार सरकार पर दबाव बढ़ाया. कई बार लगा कि आंदोलन बिखर जाएगा, लेकिन अलग राज्य की मांग खत्म नहीं हुई. इसी दौर में शिबू सोरेन की राजनीति भी आंदोलन और सत्ता के बीच आगे बढ़ती रही.
उन्होंने अलग-अलग राजनीतिक दलों के साथ गठबंधन किए. कांग्रेस के साथ भी चले और बाद में दूसरे दलों के साथ भी. आलोचकों ने इसे आंदोलन से समझौता बताया. लेकिन उनके समर्थकों का तर्क था कि संसद और सरकार के भीतर पहुंचे बिना अलग राज्य का सपना पूरा नहीं हो सकता था. यही वह दौर था, जब झारखंड का आंदोलन सड़क और सत्ता—दोनों मोर्चों पर लड़ा जा रहा था.
स्वायत्त परिषद से अलग राज्य तक
साल 1995 में बिहार सरकार ने झारखंड क्षेत्र स्वायत्त परिषद का गठन किया और शिबू सोरेन इसके अध्यक्ष बने. परिषद के अधिकार सीमित थे, लेकिन इसे अलग राज्य की दिशा में पहला संस्थागत कदम माना गया. साल 1997 में बिहार विधानसभा ने अलग झारखंड राज्य के पक्ष में प्रस्ताव पारित किया. इसके बाद राजनीतिक प्रक्रिया तेज हुई. संसद ने बिहार पुनर्गठन अधिनियम पारित किया और 15 नवंबर 2000 को भगवान बिरसा मुंडा की जयंती के दिन भारत के 28वें राज्य के रूप में झारखंड अस्तित्व में आया.
यह किसी एक व्यक्ति की जीत नहीं थी. इसमें जयपाल सिंह मुंडा से लेकर बिनोद बिहारी महतो, ए.के. रॉय, निर्मल महतो, सूरज मंडल और हजारों ज्ञात-अज्ञात आंदोलनकारियों का योगदान था. लेकिन आम लोगों की नजर में इस आंदोलन का सबसे बड़ा चेहरा शिबू सोरेन ही थे. यही वजह है कि राज्य बनने के बाद भी उनकी पहचान सिर्फ एक राजनेता की नहीं रही. वे “दिशोम गुरु” बने रहे—एक ऐसे नेता, जिनकी राजनीतिक पहचान सत्ता से ज्यादा आंदोलन से बनी थी.
सत्ता मिली, लेकिन संघर्ष खत्म नहीं हुआ
राज्य बनने के बाद शिबू सोरेन तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने. पहली बार मार्च 2005 में उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, लेकिन विधानसभा में बहुमत साबित नहीं कर पाने के कारण कुछ ही दिनों में इस्तीफा देना पड़ा. दूसरी बार अगस्त 2008 और तीसरी बार दिसंबर 2009 में उन्होंने मुख्यमंत्री पद संभाला. हालांकि गठबंधन की राजनीति और बदलते समीकरणों के कारण उनका कार्यकाल लंबा नहीं चला.
उनका मुख्यमंत्री कार्यकाल भले ही लंबा नहीं रहा, लेकिन उनकी राजनीतिक हैसियत कभी छोटी नहीं हुई. वे सत्ता में रहें या विपक्ष में, झारखंड की राजनीति के केंद्र में बने रहे. वे कई बार लोकसभा पहुंचे और केंद्र सरकार में कोयला मंत्री भी बने. यह मंत्रालय उस भूभाग से सीधे जुड़ा था, जिसके संसाधनों पर वे दशकों से स्थानीय लोगों के अधिकार की बात करते रहे थे. हालांकि केंद्रीय मंत्री बनने के कुछ ही समय बाद एक पुराने आपराधिक मामले के कारण उन्हें इस्तीफा देना पड़ा. यह उनके राजनीतिक जीवन के कठिन दौरों में से एक था.
अपने जीवन के अंतिम वर्षों में शिबू सोरेन सक्रिय राजनीति से धीरे-धीरे दूर होते गए. स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के कारण सार्वजनिक कार्यक्रमों में उनकी उपस्थिति कम हो गई. इस दौरान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने संगठन और सरकार की जिम्मेदारी संभाली. फिर उन्होंने दिल्ली के एक अस्पताल में 4 अगस्त 2025 को अंतिम सांस ली.
शिबू सोरेन के निधन के साथ झारखंड आंदोलन की वह पीढ़ी लगभग समाप्त हो गई, जिसने राज्य निर्माण की लड़ाई सड़क पर लड़ी थी. उनकी पहली पुण्यतिथि पर उन्हें याद करते हुए सवाल उठता है कि क्या झारखंड उस दिशा में आगे बढ़ रहा है, जिसका सपना उन्होंने देखा था? क्या जल, जंगल और जमीन पर स्थानीय समुदायों के अधिकार मजबूत हुए? क्या विस्थापन, बेरोजगारी और पलायन की समस्याएं कम हुईं? क्या आदिवासी भाषाओं और संस्कृति को उनका उचित स्थान मिला?
इन सवालों के जवाब अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन झारखंड की राजनीति और सामाजिक बहस में शिबू सोरेन का नाम आज भी केंद्रीय है. लोग उन्हें पूर्व मुख्यमंत्री से ज्यादा “दिशोम गुरु” के नाम से याद करते हैं. यह सम्मान किसी संवैधानिक पद से नहीं, बल्कि जनता की स्मृति से मिला है—और यही उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक विरासत हैं.
हालांकि, दिशोम गुरु के राजनीतिक जीवन के साथ कई विवाद और आलोचनाएं भी जुड़ी रहीं. 1975 के चिरूडीह कांड से लेकर 1994 के शशि नाथ झा प्रकरण और 1993 के जेएमएम रिश्वत कांड तक, इन मामलों ने उनके राजनीतिक सफर को कई बार सवालों के घेरे में रखा. चिरूडीह मामले में 2004 में केंद्रीय कोयला मंत्री रहते उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी होने के बाद उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था. वहीं, शशि नाथ झा हत्याकांड में निचली अदालत की सजा और बाद में उच्च न्यायालय से बरी होने तक चली लंबी कानूनी लड़ाई भी उनके राजनीतिक जीवन का अहम हिस्सा रही. इसके अलावा, गठबंधन राजनीति को लेकर भी उन पर अवसरवाद के आरोप लगते रहे. आलोचकों का कहना था कि उन्होंने कई मौकों पर विचारधारा से अधिक सत्ता के समीकरणों को प्राथमिकता दी. हालांकि, इन विवादों और आलोचनाओं के बावजूद झारखंड की राजनीति में उनका प्रभाव और आदिवासी अधिकारों के लिए उनकी भूमिका लंबे समय तक महत्वपूर्ण बनी रही.
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