किसलय शानू, रांची
झारखंड सीआईडी द्वारा दर्ज बहुचर्चित 95.65 एकड़ कथित वन भूमि हस्तांतरण एवं जालसाजी मामले में रांची स्थित सीआईडी की विशेष अदालत ने आरोपी शैलेश कुमार सिंह की नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी है.
अतिरिक्त न्यायायुक्त-सह-विशेष न्यायाधीश (सीआईडी/एटीएस) कुलदीप की अदालत ने माना कि मामले की जांच अभी जारी है और उपलब्ध सामग्री प्रथम दृष्टया गंभीर आपराधिक साजिश की ओर संकेत करती है. अदालत ने कहा कि इस स्तर पर आरोपी को जमानत देना जांच को प्रभावित कर सकता है.
सीआईडी के अनुसार, मामला बोकारो जिले के चास थाना क्षेत्र के मौजा टेटुलिया स्थित प्लॉट संख्या 426, 450 समेत लगभग 95.65 एकड़ भूमि से जुड़ा है. जांच एजेंसी का आरोप है कि यह भूमि पहले निजी संरक्षित वन और बाद में संरक्षित वन के रूप में अधिसूचित थी. बाद में यह भूमि बोकारो स्टील प्लांट के लिए हस्तांतरित की गई, लेकिन उपयोग नहीं होने के कारण वर्षों तक विवाद बना रहा.
फर्जी दस्तावेजों के आधार पर 95.65 एकड़ भूमि पर कब्जे का आरोप
जांच में आरोप लगाया गया है कि वर्ष 2012 के आसपास इजहार हुसैन और अख्तर हुसैन ने 1933 के कथित नीलामी बिक्री प्रमाणपत्र के आधार पर स्वयं को भूमि का उत्तराधिकारी बताते हुए जमाबंदी और अन्य राजस्व अभिलेख अपने पक्ष में तैयार करा लिए. सीआईडी का दावा है कि यह बिक्री प्रमाणपत्र संदिग्ध एवं जाली है. पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिला निबंधन कार्यालय से मूल अभिलेख उपलब्ध नहीं होने तथा संबंधित दस्तावेजों के अस्तित्व पर प्रश्न उठने के बाद जालसाजी की आशंका और गहरी हो गई.
अभियोजन का आरोप है कि बाद में इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर यह भूमि उमायुष मल्टीकॉम प्राइवेट लिमिटेड के नाम बेची गई. कंपनी का गठन बिक्री से कुछ समय पहले ही हुआ था. जांच एजेंसी का कहना है कि शैलेश कुमार सिंह इस पूरे लेन-देन में पावर ऑफ अटॉर्नी धारक थे और उनके पुत्र कंपनी के निदेशक हैं. कंपनी का पंजीकृत पता भी उनके परिवार से जुड़ा बताया गया है. सीआईडी ने उन्हें पूरे कथित षड्यंत्र का प्रमुख साजिशकर्ता बताया है.
वहीं, बचाव पक्ष ने अदालत में दलील दी कि संबंधित भूमि को लेकर झारखंड उच्च न्यायालय पहले ही अपने आदेशों में इसे रैयती भूमि मान चुका है और राज्य सरकार की अपील भी खारिज हो चुकी है. बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने भी उच्च न्यायालय के निर्णय में हस्तक्षेप नहीं किया. इसलिए भूमि को वन भूमि बताकर दर्ज किया गया आपराधिक मामला टिकाऊ नहीं है. याचिकाकर्ता ने यह भी दावा किया कि उनके विरुद्ध पहले भी इसी प्रकार के मामले दर्ज हुए थे, जिन्हें अदालतों ने खारिज कर दिया था या वे उनमें बरी हो चुके हैं.
अदालत बोली- जांच जारी, जमानत देने से हो सकती है प्रभावित
हालांकि, अदालत ने इन दलीलों से सहमति नहीं जताई. न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि उच्च न्यायालय के पूर्व आदेश मुख्य रूप से जमाबंदी रद्द करने के अधिकार क्षेत्र से संबंधित थे, न कि भूमि के अंतिम स्वामित्व या कथित जालसाजी की आपराधिक जांच से. अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री से यह भी संकेत मिलता है कि कथित बिक्री प्रमाणपत्र और उससे जुड़े दस्तावेजों की सत्यता गंभीर जांच का विषय है.
अदालत ने सह-आरोपियों के कथित बयान, पावर ऑफ अटॉर्नी, कंपनी के गठन, भूमि हस्तांतरण और अन्य परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया आरोपी की भूमिका महत्वपूर्ण प्रतीत होती है. आदेश में यह भी कहा गया कि भूमि घोटालों से जुड़े मामलों में व्यापक जांच आवश्यक होती है. न्यायालय ने इस संबंध में सर्वोच्च न्यायालय के प्रतिभा मंचंदा बनाम हरियाणा राज्य फैसले का हवाला देते हुए कहा कि भूमि घोटाले संगठित अपराध का रूप ले चुके हैं, जिनमें फर्जी दस्तावेज, जाली स्वामित्व और सरकारी अभिलेखों से छेड़छाड़ जैसे गंभीर आरोप शामिल रहते हैं.
इन सभी तथ्यों, मामले की गंभीरता और जांच की वर्तमान स्थिति को देखते हुए अदालत ने शैलेश कुमार सिंह की नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी. अदालत ने स्पष्ट किया कि जांच अभी जारी है और इस चरण में आरोपी को राहत देना उचित नहीं होगा.
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