मुस्कान चौधरी
कल्पना कीजिए… रात के दो बजे हैं. पहाड़ों पर कड़ाके की ठंड पड़ रही है. घने जंगलों में हर कदम पर खतरा है. कहीं गोलियों की आवाज गूंज रही है, तो कहीं बारूदी सुरंग का डर है. देश के किसी कोने में हजारों श्रद्धालु सुरक्षित अपनी यात्रा पूरी कर रहे हैं. कहीं चुनाव शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो रहे हैं, तो कहीं बाढ़ में फंसे लोगों को बचाया जा रहा है.
इन तमाम परिस्थितियों में एक चीज हमेशा समान होती है. सबसे आगे खड़ी होती है एक वर्दी, जिस पर लिखा होता है CRPF. इन जवानों के लिए ड्यूटी सिर्फ नौकरी नहीं, बल्कि जिम्मेदारी होती है. कई बार महीनों तक घर लौटना नहीं होता. बच्चों का जन्मदिन, माता-पिता की बीमारी, त्योहारों की खुशियां और परिवार के साथ बिताने वाले पल, सब कुछ देश की सुरक्षा के लिए पीछे छूट जाता है. शायद यही वजह है कि जब भी देश किसी बड़े संकट में फंसता है, सबसे पहले जिस बल का नाम लिया जाता है, वह है सेंट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स (CRPF).
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि दुनिया के सबसे बड़े केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल की शुरुआत आखिर कैसे हुई? जिस संगठन पर आज देश की आंतरिक सुरक्षा का सबसे बड़ा दायित्व है, उसकी कहानी आजादी से पहले शुरू होती है. आज सीआरपीएफ में 247 बटालियन और 3 लाख से अधिक कर्मी हैं, जो इसे भारत का सबसे बड़ा केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल बनाते हैं. यह गृह मंत्रालय के अधीन कार्य करता है और हर साल 27 जुलाई को अपना स्थापना दिवस यानी CRPF Raising Day मनाता है.
1936: एक विशेष पुलिस बल की जरूरत महसूस हुई
1930 के दशक में तत्कालीन रियासतों में राजनीतिक आंदोलन और कानून-व्यवस्था की चुनौतियां लगातार बढ़ रही थीं. इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए 1936 में एक विशेष केंद्रीय पुलिस बल बनाने का प्रस्ताव सामने आया, जो रियासतों और संवेदनशील इलाकों में कानून-व्यवस्था बनाए रखने में मदद कर सके.
1939: क्राउन रिप्रेजेंटेटिव्स पुलिस की स्थापना
27 जुलाई 1939 को ब्रिटिश शासन ने क्राउन रिप्रेजेंटेटिव्स पुलिस (Crown Representative’s Police – CRP) का गठन किया. इसका उद्देश्य उन क्षेत्रों में शांति और कानून-व्यवस्था बनाए रखना था, जो ब्रिटिश क्राउन के प्रतिनिधियों के अधीन थे. शुरुआत में यह बल आकार में छोटा था, लेकिन आने वाले वर्षों में यही संगठन भारत की आंतरिक सुरक्षा की सबसे मजबूत ताकत बन गया.
1949: आजादी के बाद मिला नया नाम और नई पहचान
1947 में देश आजाद हुआ. विभाजन, सांप्रदायिक हिंसा और रियासतों के एकीकरण जैसी चुनौतियों के बीच एक मजबूत केंद्रीय सुरक्षा बल की जरूरत महसूस हुई. 28 दिसंबर 1949 को संसद ने सीआरपीएफ अधिनियम पारित किया और क्राउन रिप्रेजेंटेटिव्स पुलिस का नाम बदलकर सेंट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स (CRPF) कर दिया गया. तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने इस बल को नवस्वतंत्र भारत की जरूरतों के अनुरूप नई और बहुआयामी जिम्मेदारियां सौंपीं.
1950: रियासतों के एकीकरण में निभाई अहम भूमिका
आजादी के बाद कई रियासतें भारतीय संघ में शामिल होने के लिए तैयार नहीं थीं. जूनागढ़ और गुजरात के कठियावाड़ क्षेत्र की कुछ रियासतें भी उनमें शामिल थीं. ऐसे समय में सीआरपीएफ ने केंद्र सरकार के साथ मिलकर कानून-व्यवस्था बनाए रखने और रियासतों के शांतिपूर्ण एकीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
1959: सीमा सुरक्षा और पहला बड़ा बलिदान
आजादी के बाद कच्छ, राजस्थान और सिंध सीमा पर घुसपैठ और सीमा पार अपराधों पर नजर रखने की जिम्मेदारी भी सीआरपीएफ को सौंपी गई. बाद में पाकिस्तान से लगती जम्मू-कश्मीर सीमा पर भी इसकी तैनाती की गई. 21 अक्टूबर 1959 को लद्दाख के हॉट स्प्रिंग क्षेत्र में चीनी सैनिकों ने सीआरपीएफ के एक गश्ती दल पर हमला किया. इस हमले में बल के 10 जवान शहीद हो गए. इन्हीं शहीदों की याद में हर वर्ष 21 अक्टूबर को पूरे देश में पुलिस स्मृति दिवस मनाया जाता है.
1962, 1965 और 1971: युद्धों में भी निभाई जिम्मेदारी
1962 के भारत-चीन युद्ध में सीआरपीएफ ने भारतीय सेना के साथ कंधे से कंधा मिलाकर दुश्मन का सामना किया. अरुणाचल प्रदेश समेत कई इलाकों में इसके जवानों ने बहादुरी दिखाई और इस युद्ध में बल के आठ जवान शहीद हुए. इसके बाद 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान भी सीआरपीएफ ने पश्चिमी और पूर्वी सीमाओं पर भारतीय सेना का महत्वपूर्ण सहयोग किया.
1987 और 1996: महिला बटालियन की शुरुआत
सीआरपीएफ देश का पहला केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल बना जिसने महिला बटालियन का गठन किया. मार्च 1987 में पहली महिला बटालियन ने प्रशिक्षण पूरा करने के बाद मेरठ दंगों के दौरान अपनी पहली बड़ी जिम्मेदारी निभाई. 1996 में दूसरी महिला बटालियन का गठन हुआ, जिसने लोकसभा चुनावों में अहम भूमिका निभाई. आज महिला जवान जम्मू-कश्मीर, अयोध्या, मणिपुर, असम सहित देश के कई हिस्सों में तैनात हैं.
बढ़ता गया दायरा
समय के साथ सीआरपीएफ की जिम्मेदारियां लगातार बढ़ती गईं. आज यह जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद विरोधी अभियानों, उत्तर-पूर्व में उग्रवाद से निपटने, नक्सल प्रभावित इलाकों में ऑपरेशन चलाने, संसद और महत्वपूर्ण संस्थानों की सुरक्षा, चुनावों में सुरक्षा व्यवस्था, धार्मिक यात्राओं और बड़े आयोजनों की सुरक्षा तथा प्राकृतिक आपदाओं के दौरान राहत एवं बचाव कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. यानी जहां चुनौती सबसे बड़ी होती है, वहां सीआरपीएफ की मौजूदगी लगभग तय होती है.
नक्सलवाद के खिलाफ सबसे मजबूत ताकत
सीआरपीएफ ने सबसे कठिन लड़ाई नक्सलवाद के खिलाफ लड़ी है. छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र और तेलंगाना के घने जंगलों में वर्षों से इसके जवान अभियान चला रहे हैं. यहां हर कदम पर बारूदी सुरंग का खतरा होता है और दुश्मन सामने दिखाई नहीं देता. इसी चुनौती से निपटने के लिए सीआरपीएफ ने कमांडो बटालियन फॉर रिजॉल्यूट एक्शन (CoBRA) का गठन किया, जिसे जंगलों में गुरिल्ला युद्ध के लिए विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है.
जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ मजबूत मोर्चा
जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद विरोधी अभियानों में भी सीआरपीएफ की भूमिका बेहद अहम रही है. अमरनाथ यात्रा की सुरक्षा, संवेदनशील इलाकों में कानून-व्यवस्था बनाए रखना, आतंकवाद विरोधी अभियानों में सेना और जम्मू-कश्मीर पुलिस के साथ समन्वय करना और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना, इसकी प्रमुख जिम्मेदारियों में शामिल है.
लोकतंत्र की सुरक्षा का सबसे बड़ा प्रहरी
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है. यहां हर चुनाव में करोड़ों लोग मतदान करते हैं. देश के सबसे दूरस्थ गांवों से लेकर नक्सल प्रभावित इलाकों तक निष्पक्ष चुनाव कराना आसान नहीं होता. ऐसे में चुनाव आयोग सबसे अधिक भरोसा सीआरपीएफ पर करता है.
हर चुनाव में हजारों जवान महीनों तक अलग-अलग राज्यों में तैनात रहते हैं ताकि मतदाता बिना किसी डर के अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर सकें. सीआरपीएफ सिर्फ सुरक्षा बल नहीं, बल्कि संकटमोचक भी है. बाढ़, भूकंप, भूस्खलन और अन्य प्राकृतिक आपदाओं के दौरान इसके जवान राहत और बचाव कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं और अपनी जान जोखिम में डालकर लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाते हैं.
बलिदान जिसकी पहचान है
सीआरपीएफ का इतिहास सिर्फ उपलब्धियों का नहीं, बल्कि बलिदानों का भी इतिहास है. हजारों जवान देश की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दे चुके हैं. 2019 का पुलवामा आतंकी हमला आज भी देश की स्मृति में दर्ज है, जिसमें सीआरपीएफ के 40 जवान शहीद हुए थे. लेकिन इस घटना के बाद भी बल के जवान अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटे. यही सीआरपीएफ की सबसे बड़ी ताकत है. हर चुनौती के बाद और अधिक मजबूती से खड़ा होना.
बदलते समय के साथ सीआरपीएफ ने भी खुद को आधुनिक बनाया है. बेहतर हथियार, आधुनिक संचार प्रणाली, ड्रोन तकनीक, बुलेटप्रूफ वाहन, निगरानी उपकरण और अत्याधुनिक प्रशिक्षण के जरिए यह बल नई सुरक्षा चुनौतियों के अनुरूप खुद को लगातार तैयार कर रहा है.
सीआरपीएफ की संरचना
आज सीआरपीएफ का नेतृत्व एक महानिदेशक (Director General) करते हैं. पूरे बल को चार प्रमुख जोन में बांटा गया है. इनके अंतर्गत कई सेक्टर, रेंज और ग्रुप सेंटर काम करते हैं. 247 बटालियनों में सामान्य ड्यूटी बटालियन के अलावा रैपिड एक्शन फोर्स (RAF), कोबरा (CoBRA), महिला बटालियन और वीआईपी सुरक्षा इकाइयां भी शामिल हैं. RAF दंगा नियंत्रण और भीड़ प्रबंधन में विशेषज्ञ है, जबकि CoBRA नक्सल प्रभावित इलाकों में गुरिल्ला ऑपरेशन के लिए प्रशिक्षित विशेष कमांडो यूनिट है.
सिर्फ एक सुरक्षा बल नहीं, भरोसे का नाम
87 वर्षों के इस सफर में सीआरपीएफ ने कई रूप देखे हैं. अंग्रेजों के दौर में बने एक छोटे सुरक्षा बल से लेकर स्वतंत्र भारत की आंतरिक सुरक्षा की सबसे मजबूत रीढ़ बनने तक.
जब देश में चुनाव होते हैं, जब किसी शहर में दंगा होता है, जब जंगलों में नक्सल विरोधी अभियान चलता है, जब किसी तीर्थयात्रा को सुरक्षित बनाना होता है या जब प्राकृतिक आपदा लोगों की जिंदगी को संकट में डाल देती है, तब सबसे पहले जिस वर्दी पर देश भरोसा करता है, वह सीआरपीएफ की होती है.
यह सिर्फ वर्दी पहनने वाले जवानों का संगठन नहीं है. यह उन हजारों परिवारों की कहानी भी है, जो अपने बेटे, बेटी, पति, पत्नी या पिता को महीनों तक देश की सेवा के लिए दूर भेजते हैं. यह उन अनगिनत बलिदानों की कहानी है, जिनकी वजह से करोड़ों भारतीय हर दिन सुरक्षित जीवन जी पाते हैं. इसीलिए सीआरपीएफ सिर्फ भारत का सबसे बड़ा केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल नहीं, बल्कि देश के विश्वास, साहस, सेवा और समर्पण का जीवंत प्रतीक है.
Also Read : झारखंड: JPSC घोटाला, ट्रांसफर होने के बावजूद श्वेता कुमारी करती थी परीक्षा नियंत्रक का काम

