कनिका राणा, जोहार लाइव संवाददाता
राजनीति सिर्फ मंचों, भाषणों और चुनावी नारों की कहानी नहीं होती. इसके पीछे कई ऐसे पल भी छुपे होते हैं, जिनसे आम जनता कभी रूबरू नहीं हो पाती. सत्ता के गलियारों में कभी-कभी ऐसे संवाद हो जाते हैं, जो न अखबारों की सुर्खियां बनते हैं, न किसी बयान का हिस्सा- मगर वो पल राजनीति की असली प्रवृत्ति, को उजागर कर देती हैं. ऐसा ही एक किस्सा है, जो सत्ता के गलियारों में कभी-कभी सुनने को मिलता है.
बात उन दिनों की है, जब देश के एक बड़े रणनीतिकार को, जो चुनावी रणनीति बनाने में माहिर माने जाते थे, प्रधानमंत्री कार्यालय में एक साधारण भोज पर आमंत्रित किया गया था. भोज में कई बड़े नेता और अधिकारी मौजूद थे. माहौल हल्का-फुल्का था, बातचीत इधर-उधर की चल रही थी.
तभी खाने की मेज़ पर प्रधानमंत्री ने अचानक उस रणनीतिकार से एक अनौपचारिक-सा सवाल पूछ लिया –
“अच्छा बताइए, शादी में क्या-क्या होता है?”
सवाल थोड़ा अटपटा ज़रूर था, पर रणनीतिकार ने बिना झिझके जवाब दिया –
“शादी में ढोल बजते हैं, नाच-गाना होता है, रिश्तेदार आते हैं, खाना-पीना होता है, रौनक रहती है…”
प्रधानमंत्री ने इस जवाब पर हल्की मुस्कान दी और तुरंत एक और सवाल दाग दिया –
“और ये बैंड बाजा वाले शादी में करते क्या हैं?”
इस बार भी रणनीतिकार का जवाब बड़ा सहज और सीधा था –
“जब तक दूल्हा मंडप तक नहीं पहुंच जाता, तब तक बैंड बजता रहता है. जैसे ही दूल्हा मंडप तक पहुंचता है, बैंड बाजा वाले अपना काम खत्म करके वापस चले जाते हैं.”
दोनों जवाब सुनने के बाद प्रधानमंत्री कुछ पल के लिए खामोश रहे, हल्के से मुस्कुराए और बिना कुछ कहे वहां से उठकर चले गए. वहां मौजूद लोग इस छोटे से वाकये का मतलब समझने की कोशिश करते रह गए. किसी ने इसे हल्के मज़ाक की तरह लिया, तो किसी ने इसमें कोई गहरा राजनीतिक संकेत ढूंढने कि कोशिश की.
शायद यह इशारा था कि जिस तरह बैंड बाजा वाले दूल्हे को मंडप तक पहुंचाकर विदा हो जाते हैं, उसी तरह राजनीति में भी कुछ भूमिकाएं एक तय मुकाम तक ही सीमित होती हैं. किसी ने इसे किसी आने वाले फैसले या बदलाव का संकेत माना, तो किसी ने इसे सिर्फ एक सामान्य बातचीत समझकर भुला दिया.
सच्चाई जो भी हो, यह किस्सा इस बात की मिसाल है कि राजनीति की असली कहानियां अक्सर मंचों पर नहीं, बल्कि बंद कमरों और खाने की मेज़ों पर लिखी जाती हैं, जिनसे हम कभी रूबरू ही नहीं हो पाते.
(नोट : इस कहानी से प्रशांत किशोर का कोई वास्ता नहीं हैं.)
ऊपर वाला किस्सा भले ही एक अलग प्रसंग था, लेकिन अब बारी है उस असली सफर की, जिसने प्रशांत किशोर को भारत का सबसे बड़ा चुनावी रणनीतिकार बनाया.
प्रशांत किशोर राजनीति में कैसे आए? पहला असाइनमेंट, जो राजनीति से जुड़ा भी नहीं था. प्रशांत किशोर की शुरुआत राजनीति से नहीं, बल्कि स्वास्थ्य क्षेत्र से हुई थी. साल 2010 में संयुक्त राष्ट्र ने उन्हें अफ्रीकी देश चाड में अपने सहायता मिशन में तैनात किया, जहां वे यूनिसेफ में सामाजिक नीति और योजना के प्रमुख के तौर पर काम कर रहे थे. वहीं उन्होंने भारत के पिछड़े राज्यों के खराब स्वास्थ्य आंकड़ों पर एक योजना आयोग की रिपोर्ट पढ़ी और तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर बताया कि देश के अपेक्षाकृत समृद्ध राज्य भी सार्वजनिक स्वास्थ्य के मामले में पिछड़े हुए हैं.
दिलचस्प बात यह रही कि पीएमओ में उनकी इस रिपोर्ट का कोई खास असर नहीं हुआ, लेकिन वही रिपोर्ट जब गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी तक पहुंची, जिनका राज्य भी उस अध्ययन का हिस्सा था, तो नतीजा बिल्कुल अलग निकला. माना जाता है कि मोदी इन निष्कर्षों से इतने प्रभावित हुए कि अक्टूबर 2011 के आसपास गांधीनगर में हुए एक इंटरव्यू के बाद उन्होंने किशोर को सामाजिक क्षेत्र नीति सलाहकार के तौर पर नियुक्त कर लिया.
यही वह मोड़ था, जहां से एक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की राजनीति में एंट्री हुई. यानी उनका ये पहला बड़ा राजनीतिक असाइनमेंट था. साल 2012 का गुजरात विधानसभा चुनाव, जिसमें उन्होंने मोदी को तीसरी बार मुख्यमंत्री बनवाने में मदद की थी. इसके बाद प्रशांत किशोर का सफर लगातार आगे बढ़ता गया. उनकी प्रमुख चुनावी परियोजनाओं की सूची कुछ इस तरह रही:

2012- गुजरात विधानसभा चुनाव (नरेंद्र मोदी) — जीत
2014 – लोकसभा चुनाव, “अबकी बार मोदी सरकार” अभियान (BJP) — जीत
2015 – बिहार विधानसभा चुनाव (नीतीश कुमार, महागठबंधन) — जीत
2017 – पंजाब विधानसभा चुनाव (कैप्टन अमरिंदर सिंह, कांग्रेस) — जीत
2017 – उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव (कांग्रेस) — हार
2019 – आंध्र प्रदेश विधानसभा चुनाव (YSRCP, जगनमोहन रेड्डी) — जीत
2021- पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव (TMC, ममता बनर्जी) — जीत
2021- तमिलनाडु विधानसभा चुनाव (DMK, एम.के. स्टालिन) — जीत
इस तरह के आंकड़ों के विश्लेषण बताते हैं कि उनकी सलाह वाली सीटों में सक्सेस रेशियो अक्सर 70 प्रतिशत से ऊपर रही. यानी दर्जन भर से ज्यादा बड़े चुनावी अभियानों में सिर्फ एक-दो मौकों (जैसे 2017 का यूपी चुनाव) को छोड़ दें, तो ज़्यादातर जगह उनकी रणनीति कामयाब रही.
यहीं पर वह बात भी सामने आई जब बिहार चुनाव में वे कभी मंच पर भाषण देते या उम्मीदवार के तौर पर नज़र नहीं आए. लेकिन पर्दे के पीछे, यानी “बैकएंड” पर, पूरी रणनीति उन्हीं की बनाई हुई थी. 2015 में उन्होंने नीतीश कुमार का साथ दिया और महागठबंधन के लिए बिहार विधानसभा चुनाव का पूरा अभियान तैयार किया. डेटा एनालिसिस से लेकर जातीय समीकरण, माइक्रो-मैसेजिंग से लेकर सोशल मीडिया रणनीति तक, हर चीज़ के पीछे उनका ही दिमाग काम कर रहा था.
नतीजा यह हुआ कि जिस गठबंधन को कमज़ोर आंका जा रहा था, उसने भारी बहुमत से जीत दर्ज की. श्रेय पर्दे के पीछे के इस रणनीतिकार को मिला. भले ही नाम मंच पर किसी और का लिया गया हो. यही प्रशांत किशोर के काम करने का तरीका रहा है. नेता आगे, नाम आगे, लेकिन जीत की स्क्रिप्ट अक्सर पीछे से लिखी गई.
और अब रणनीतिकार से सीधे चुनावी मैदान में

पर्दे के पीछे से रणनीति बनाने वाला यह शख्स आखिरकार खुद मैदान में उतर आया है. हाल ही में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रशांत किशोर ने ऐलान किया कि वे बांकीपुर विधानसभा सीट से उपचुनाव लड़ेंगे. यह सीट बीजेपी अध्यक्ष नितिन नबीन के इस्तीफे से खाली हुई है, जो हाल ही में राज्यसभा सांसद चुने जाने के बाद अपनी विधायकी छोड़ चुके हैं. नितिन नबीन 2006 से इस सीट पर काबिज़ थे, यानी यह सीट लंबे समय से बीजेपी का गढ़ मानी जाती रही है.
प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रशांत किशोर ने इसे सीधे तौर पर बिहार की मौजूदा बीजेपी सरकार की लोकप्रियता पर एक “जनमत संग्रह” करार दिया. उन्होंने कहा कि बांकीपुर के लोग बिहार के सबसे शिक्षित और संपन्न मतदाताओं में से हैं. इसलिए वे सही उम्मीदवार को चुनेंगे. अपने चिर-परिचित आत्मविश्वास भरे अंदाज़ में उन्होंने यहां तक कह दिया कि- “अगर मैं अकेला विधायक बनकर भी विधानसभा पहुंचा, तो बाकी 242 विधायकों पर भारी पडूंगा.”
गौर करने वाली बात यह है कि जो शख्स वर्षों तक दूसरों को चुनाव जिताता रहा. गुजरात से लेकर बंगाल, तमिलनाडु और खुद बिहार तक, वह अब पहली बार खुद अपने लिए वोट मांग रहा है. यही वह पल है, जहां रणनीतिकार की कहानी नेता की कहानी में बदलती नज़र आती है. आने वाला यह उपचुनाव बताएगा कि क्या पर्दे के पीछे का जादू मंच पर भी उतना ही असरदार साबित होता है या नहीं.
“अर्श या फर्श”- जब दांव उल्टा पड़ गया
चुनाव से पहले प्रशांत किशोर के हौसले आसमान छू रहे थे. वे मंचों पर बार-बार एक ही बात दोहराते थे- “मेरी पार्टी या तो अर्श पर होगी, या फर्श पर. इसमें कोई बीच का रास्ता नहीं है.” यह कोई हल्का बयान नहीं था, बल्कि एक ऐसे शख्स का आत्मविश्वास था, जिसने वर्षों तक भारत की सबसे बड़ी-बड़ी चुनावी जीतें रची थीं- नरेंद्र मोदी को 2014 में सत्ता तक पहुंचाया था, ममता बनर्जी और एम.के. स्टालिन जैसे दिग्गजों को जीत दिलाई थी. तो भला बिहार, जो उनकी अपनी जन्मभूमि थी, वहां वे क्यों पीछे रहते?
2024 में उन्होंने अपनी पार्टी “जन सुराज” खड़ी की और ऐलान किया कि इस बार बिहार बदलेगा. जाति और वंशवाद की राजनीति से ऊपर उठकर शिक्षा, रोज़गार और सुशासन के नाम पर वोट मांगे जाएंगे. पूरे 243 विधानसभा सीटों में से 238 पर उम्मीदवार उतारे गए. पदयात्रा हुई, हज़ारों किलोमीटर पैदल चले, सोशल मीडिया पर ज़बरदस्त चर्चा बनी. हर तरफ माहौल ऐसा बना मानो सचमुच कोई नई राजनीतिक लहर उठ रही हो.
लेकिन जब नतीजे आए, तो कहानी पूरी तरह पलट गई. कुल 238 सीटों पर लड़कर जन सुराज पार्टी ने एक भी सीट जीती. वोट शेयर सिमटकर महज़ 3.5-4 प्रतिशत रह गया. ज़्यादातर उम्मीदवारों की तो ज़मानत तक ज़ब्त हो गई. जिस “अर्श या फर्श” की बात प्रशांत किशोर ने खुद कही थी, नतीजों ने उसे “फर्श” में बदलकर रख दिया और वह भी बुरी तरह.
आखिर ऐसा क्यों हुआ? दरअसल, बिहार की राजनीति सिर्फ भाषणों और वादों से नहीं चलती. यहां दशकों से जाति, सामाजिक गठबंधन और ज़मीनी पकड़ ही असली ताकत रही है. एनडीए और महागठबंधन, दोनों के पास पहले से मज़बूत वोट बैंक और बूथ स्तर तक फैला संगठन था. जन सुराज के उम्मीदवार ज़्यादातर डॉक्टर और प्रोफेशनल थे. पढ़े-लिखे ज़रूर, लेकिन गांव-गांव, गली-गली में पकड़ बनाने का अनुभव उनके पास नहीं था. पार्टी ने शराबबंदी हटाने का वादा किया, जो महिला मतदाताओं को नाराज़ कर गया. ठीक वही वर्ग, जो नीतीश कुमार की सबसे मज़बूत ताकत रहा है.
शायद सबसे बड़ी चूक यह रही कि प्रशांत किशोर खुद चुनावी मैदान में नहीं उतरे. रघोपुर से तेजस्वी यादव के खिलाफ लड़ने की चर्चा तो चली, लेकिन आखिरी वक़्त पर वे यह कहकर पीछे हट गए कि उन्हें बाकी उम्मीदवारों का प्रचार संभालना है. नेता ही जब मैदान में नहीं, तो कार्यकर्ताओं का हौसला कैसे बना रहता?
नतीजा यह हुआ कि जिस “चक्रव्यूह” को तोड़ने का दावा प्रशांत किशोर ने किया था, उसमें सातवां क्या, पहला घेरा भी वो तोड़ नहीं पाए. राजनीतिक विश्लेषकों ने इस हार को एक वाक्य में समेट दिया कि “दूसरों को चुनाव जितवाना और खुद चुनाव लड़ना, दोनों में ज़मीन-आसमान का फर्क है.”
यह कहानी सिर्फ एक हार की नहीं है, यह इस बात की मिसाल है कि रणनीति बनाना अलग हुनर है, और उस रणनीति पर खुद भरोसा जिताकर जनता का दिल जीतना बिल्कुल अलग चुनौती. प्रशांत किशोर ने “अर्श या फर्श” कहकर जो बड़ा दांव खेला था, बिहार की जनता ने उसका जवाब बिल्कुल साफ़ शब्दों में दे दिया और वह जवाब “फर्श” ही निकला.
लौटते हैं खबर के ऊपरी हिस्से पर और छोड़ते हैं सवाल कि क्या अबकी बार बैंड बाजा वाले से दूल्हा तक का सफर तय कर पाएंगे प्रशांत किशोर?
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