Palamu : झारखंड के पलामू जिले में जंगलों और वन्यजीवों से जुड़े प्राकृतिक संसाधनों का आंकलन करने के लिए एक बड़ा सर्वे किया जाएगा। इस सर्वे का मुख्य उद्देश्य इन संसाधनों का सही आंकड़ा जुटाना और जंगलों के संरक्षण के लिए एक कार्य योजना तैयार करना है। अगले साल 2025-26 में होने वाले इस सर्वे से पहले, फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया ने 2023 में पलामू के जंगलों का डाटा जारी किया था। इसके अनुसार, पलामू के जंगलों का इलाका 2.36 वर्ग किलोमीटर बढ़ा है।
इस सर्वे के दौरान जल स्रोतों, वन्यजीवों, पेड़ों, पौधों और नदियों की स्थिति का पता लगाया जाएगा। खासकर नीलगाय से प्रभावित इलाकों में आंकड़े जुटाए जाएंगे। साथ ही, कृत्रिम जल स्रोतों की संभावनाओं का भी आकलन किया जाएगा। जंगलों में मौजूद घास और उसकी स्थिति पर भी जानकारी ली जाएगी।
नीलगाय समस्या से निपटने की योजना
पलामू में नीलगाय एक बड़ी समस्या बन गई है, खासकर सोन, कोयल और अमानत नदियों के आसपास के इलाकों में। कई किसान नीलगाय के कारण अपनी फसलें नहीं उगा पा रहे हैं और कुछ ने तो खेती ही छोड़ दी है। इस समस्या से निपटने के लिए एक विशेष वर्किंग प्लान तैयार किया जाएगा, जिसमें जंगलों में नीलगाय के लिए घास और पानी की सुविधा सुनिश्चित की जाएगी।
नीलगाय से मुआवजा
2024-25 में नीलगाय से होने वाली क्षति के कारण सरकार ने पलामू के किसानों को 62.7 लाख रुपये का मुआवजा दिया। इस दौरान 586 किसानों ने नीलगाय के कारण हुए नुकसान की जानकारी सरकार को दी थी। पलामू के कई इलाकों में 1.54 लाख हेक्टेयर जमीन पर नीलगाय का हमला हुआ है।
पलामू के जंगलों की स्थिति
पलामू जिले में कुल 1,158 वर्ग किलोमीटर जंगल है, जिसमें से 650 वर्ग किलोमीटर हिस्सा खुला जंगल है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में जंगल के क्षेत्र में 2.23 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि हुई है। पलामू के जंगलों में साल, पलाश, महुआ जैसे कई पेड़ पाए जाते हैं, और हिरण, नीलगाय, हाथी जैसे जंगली जानवर भी यहाँ मौजूद हैं।
जल संकट का खतरा
पलामू के जंगलों और वहाँ रहने वाले जीवों के लिए बारिश के पानी पर निर्भरता है। जैसे ही मार्च और अप्रैल के महीने आते हैं, जल स्रोत सूखने लगते हैं। बरसात के दौरान जल स्रोतों में पानी जमा होता है, लेकिन जैसे ही बारिश खत्म होती है, यह पानी बह जाता है। इस कारण जंगल में पानी की कमी हो जाती है, और कई बार हिरण पानी की तलाश में गांवों में आ जाते हैं, जिससे शिकार का खतरा बढ़ जाता है। इस समस्या के समाधान के लिए भी सर्वे के दौरान जल स्रोतों का खास ध्यान रखा जाएगा।


