अभिनेता मुकेश खन्ना के ‘जन गण मन’ को लेकर दिए गए बयान ने एक बार फिर राष्ट्रगान और राष्ट्रीय गीत को लेकर बहस छेड़ दी है. खन्ना ने कहा है कि वह ‘जन गण मन’ को अपने देश का राष्ट्रगान नहीं मानते और उनकी इच्छा है कि इसकी जगह ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगान बनाया जाए.
खन्ना का विवादित बयान मुख्य रूप से ‘जन गण मन’ में इस्तेमाल किए गए ‘अधिनायक’ और ‘भारत भाग्य विधाता’ जैसे शब्दों को लेकर है. उनका सवाल है कि इन शब्दों में आखिर किसे संबोधित किया गया है. उनका तर्क है कि भारत माता या राष्ट्रीय ध्वज को ‘भाग्य विधाता’ नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ये राष्ट्र के प्रतीक हैं. इसी आधार पर वह ‘वंदे मातरम’ को ज्यादा उपयुक्त मानते हैं, क्योंकि इसमें मातृभूमि को मां के रूप में संबोधित किया गया है.
खन्ना ने अपने बयान में ‘जन गण मन’ के लिखे जाने के समय को भी मुद्दा बनाया. उनका कहना है कि यह गीत उस दौर में लिखा गया था जब भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था. इसी संदर्भ में उन्होंने ‘जन गण मन’ को लेकर सवाल उठाए और ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगान बनाए जाने की इच्छा जाहिर की.

यही बयान विवाद की सबसे बड़ी वजह बन गया है. ‘जन गण मन’ को लेकर लंबे समय से यह दावा किया जाता रहा है कि इसे ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज पंचम के सम्मान में लिखा गया था. हालांकि, इस दावे को ऐतिहासिक तथ्य के तौर पर सीधे स्वीकार करना विवादित है. रवींद्रनाथ टैगोर ने बाद में खुद इस व्याख्या को खारिज किया था और स्पष्ट किया था कि ‘भारत भाग्य विधाता’ से उनका आशय किसी ब्रिटिश राजा से नहीं था.
मुकेश खन्ना इससे पहले भी इसी तरह की मांग कर चुके हैं. 16 अगस्त को दिए गए एक इंटरव्यू में उन्होंने ‘जन गण मन’ को हटाकर ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगान बनाने की बात कही थी. उस दौरान उन्होंने ‘जन गण मन’ को क्वीन एलिजाबेथ के सम्मान में लिखा गया गीत बताया था, जिस पर भी सवाल उठे. अब 23 अगस्त को सामने आए उनके ताजा बयान के बाद यह मुद्दा फिर चर्चा में है.
खन्ना ‘वंदे मातरम’ की ऐतिहासिक भूमिका को भी अपने तर्क का आधार बना रहे हैं. ‘वंदे मातरम’ स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान राष्ट्रवादी भावना का बड़ा प्रतीक रहा है और ब्रिटिश शासन के खिलाफ आंदोलन में इसका व्यापक इस्तेमाल हुआ था. इसी वजह से खन्ना का मानना है कि राष्ट्रगान के लिए ‘वंदे मातरम’ ज्यादा उपयुक्त है.
हालांकि, मौजूदा आधिकारिक व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं हुआ है. ‘जन गण मन’ भारत का राष्ट्रगान है, जबकि ‘वंदे मातरम’ राष्ट्रीय गीत के रूप में मान्यता प्राप्त है. 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान स्वीकार किए जाने की घोषणा की थी और ‘वंदे मातरम’ को भी समान सम्मान देने की बात कही थी.
इसलिए मुकेश खन्ना का बयान सिर्फ दो गीतों में से किसी एक को बेहतर बताने तक सीमित नहीं है. उनके बयान ने ‘जन गण मन’ के इतिहास, रवींद्रनाथ टैगोर की मंशा, ब्रिटिश शासन के दौर की पृष्ठभूमि और स्वतंत्र भारत में राष्ट्रीय प्रतीकों की स्थिति को लेकर पुरानी बहस को फिर सामने ला दिया है.
फिलहाल खन्ना अपनी मांग पर कायम हैं और ‘जन गण मन’ की जगह ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगान बनाए जाने की वकालत कर रहे हैं. लेकिन आधिकारिक तौर पर राष्ट्रगान को बदलने को लेकर अब तक कोई फैसला नहीं हुआ है. यही वजह है कि उनका बयान समर्थन और विरोध, दोनों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है.


