आनंद दत्त
बीते 12 अक्टूबर को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने छह राज्यों के राज्यपालों के नामों की घोषणा की. लेकिन चर्चा में दो ही नाम रहे. पहला नाम उत्तराखंड के बीजेपी नेता दुष्यंत गौतम का और दूसरा नाम झारखंड के बीजेपी नेता ब्रजमोहन राम का.
दुष्यंत गौतम की चर्चा बाद में. फिलहाल हम यह देखने की कोशिश कर रहे हैं कि ब्रजमोहन राम आखिर किस वजह से चर्चा में आए और उनकी चर्चा में आने के बाद उनके शपथ लेने से पहले ओडिशा में क्या राजनीतिक माहौल है.
अप्रत्याशित चीजें कई बार अति उत्साहित भी कर देती है. लगभग बीस साल से चुनावी राजनीति से बार रहे तीन बार के सांसद और भाजपा नेता ब्रजमोहन राम के राज्यपाल बनने की घोषणा हुई. रांची के मोरहाबादी स्थित आवास पर लोगों का तांता लग गया. पार्टी कार्यालय में सम्मानित किया जाने लगा. परिजन खुश थे. वो खुद भी, कि बहुत बड़ा पद मिल गया है. बोला भी कि वफादारी का परिणाम है ये सब.
इसी बोलने में कुछ ऐसा बोल गए, जो शायद संवैधानिक तौर पर पूरी तरह गलत था.
राज्यपाल बनाए जाने की घोषणा के बाद झारखंड बीजेपी के एससी मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष ब्रजमोहन राम ने मीडिया से बाचतीत के दौरान कहा, मैं झारखंड में बीते 20 सालों से एससी मोर्चा का प्रदेश अध्यक्ष हूं. पार्टी में एससी समुदाय के अधिक-से-अधिक लोग जुड़ें, इसके लिए मैंने बहुत काम किया है. उसी का परिणाम है कि आज उन्हें इस पद के योग्य माना गया.
उन्होंने कहा, मैं ओडिशा जाउंगा, वहां देखूंगा कि एससी समुदाय की क्या स्थिति है. बीजेपी का एससी मोर्चा का संगठन वहां भी है. वहां भी लोगों को जोड़ेंगे. देखेंगे कि बीजेपी के पक्ष में वोट कैसे आए, उसकी चिंता करेंगे.
जाहिर है, जिस वफादारी के साथ बिना टिकट पाए, तीन बार सांसद रहने के बावजूद पार्टी के एससी मोर्चा का भार कंधे पर उठाए चल रहे थे, एक झटके में उस चिंता से कैसे बाहर आ जाते. उन्हें राज्यपाल बनाया गया, यह तो पता था. लेकिन शायद इसका भान न हो सका कि वह एक संवैधानिक पद है. कम से कम दिखने भर के लिए तो है ही. मतलब आप बीजेपी से हो या किसी अन्य राजनीतिक दल से, राज्यपाल बनाए जाने के बाद तो ऐसा नहीं ही कर सकते हैं कि वह देखेंगे कि उनके राज्यपाल बनने से पार्टी को किस तरह के फायदा हो सकता है.
जाहिर है, उनके राजनीतिक प्रतिबद्धता पर, पार्टी के प्रति वफादारी पर, संवैधानिक पद की समझदारी पर सवाल और कटाक्ष होने ही थे.
बीजेडी ने लिया आड़ों हाथ, पटनायक का तंज
ओडिशा के पूर्व सीएम और बीजू जनता दल के प्रमुख नवीन पटनायक ने कहा, ओडिशा के नए राज्यपाल के रूप में नामित ब्रज मोहन राम जी का हार्दिक स्वागत है. राज्यपाल के रूप में नामित होने के बावजूद पार्टी के कार्यों के प्रति उनके उत्साह को ओडिशा की जनता देख रही है. आशा है कि महाप्रभु श्री जगन्नाथ उन्हें ओडिशा की जनता की सेवा करने का उत्साह और शक्ति प्रदान करेंगे, ताकि वे संवैधानिक गरिमा बनाए रखते हुए निष्पक्षता के साथ अपने दायित्वों का निर्वहन कर सकें.
बीजेडी के ही नेता भृगु बक्सीपात्र ने कहा, “यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है और राज्यपाल के संवैधानिक पद पर एक तमाचे की तरह है. भारत के इतिहास में हमने कभी किसी राज्यपाल को नियुक्ति से पहले यह कहते नहीं सुना कि जब मैं किसी राज्य का राज्यपाल बनूंगा, तो यह सुनिश्चित करूंगा कि जिस पार्टी का मैं सदस्य हूं, उसकी जीत हो और उस पार्टी का संगठनात्मक ढांचा मजबूत हो.
उन्होंने कहा, यह राज्यपाल के पद की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाला है. भारत के राष्ट्रपति को उस नाम को वापस ले लेना चाहिए.”
बतौर विपक्षी, भला कांग्रेस कैसे चूकती. कांग्रेस नेता रजनी कुमार महंती ने कहा, “यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है. कोई राज्यपाल मनोनीत व्यक्ति मीडिया से यह कैसे कह सकता है कि ओडिशा का कार्यभार संभालने के बाद वह किसी पार्टी के लिए काम करेगा? यह एक संवैधानिक पद है. भारतीय संविधान के प्रावधानों के अनुसार, राज्यपाल किसी राजनीतिक दल का सदस्य नहीं होता.”
नेता तो नेता, आम जनता भी उनके इस बयान को अब संदेह की दृष्टि से देख रही है. भुवनेश्वर के आम नागरिक मोहन नायक कहते हैं, ओडिशा में भाजपा की सरकार आने के बाद से ऐसा लग रहा है कि राजभवन का अर्थ ही बदल गया है. राज्यपाल पद की गरिमा जिस तरह से कम हुई है, उससे ऐसा लगता है कि ब्रज मोहन राम को ओडिशा के राज्यपाल के रूप में कम, बल्कि भाजपा के संगठनकर्ता के रूप में ज्यादा काम करने के लिए नियुक्त किया गया है.
वहीं सुरेश पात्रा नाम के व्यक्ति ने कहा, एक राजनीतिक दल का समर्पित नेता अचानक निष्पक्ष राज्यपाल नहीं बन सकता, खासकर तब, जब उसकी पहली प्राथमिकता भाजपा के संगठन को मजबूत करना हो.
अब अपने बयान से पटल गए महामहिम
नवनियुक्त राज्यपाल ने मामला बिगड़ता देख सफाई भी दी है. खुद की कही बातों से 180डिग्री पर पलटते हुए उन्होंने कहा, मुझे एक जिम्मेदारी सौंपी गई है. मैं सभी के साथ समन्वय बनाकर इस जिम्मेदारी को निभाऊंगा. शुरुआत में थोड़ा सामंजस्य बिठाने में समय लगेगा, लेकिन मैं ऐसा जरूर करूंगा. मैं संवैधानिक पद की मर्यादा के दायरे में रहकर काम करूंगा. एक राजनेता और संवैधानिक पद के बीच अंतर होता है. मुझे इस अंतर को बनाए रखते हुए काम करना होगा.”
ओडिशा में भाजपा के संगठन को मजबूत करने के लिए काम करने संबंधी कथित बयान पर उन्होंने कहा, “नहीं, मैंने ऐसा नहीं कहा था. मैंने कहा था कि मैं सभी के साथ समन्वय बनाकर काम करूंगा. अब मैं दलगत राजनीति से ऊपर हूं, लेकिन जिस पार्टी से मैं जुड़ा रहा हूं, वह मेरी पूंजी है. उस पार्टी के प्रति मेरा लगाव और प्रेम हमेशा बना रहेगा. लेकिन मैं किसी एक राजनीतिक दल के लिए काम नहीं करूंगा. हम सबके हैं, सब हमारे हैं.”

