साल 1946 की बात है. इंग्लैंड के कैम्ब्रिज स्थित कैवेंडिश प्रयोगशाला में दुनिया भर के वैज्ञानिकों का जमावड़ा लगा था. मंच पर थे वोल्फगैंग पाउली, मशहूर भौतिक विज्ञानी और नोबेल पुरस्कार विजेता. सामने बैठे वैज्ञानिकों के बीच एक युवा भारतीय भी मौजूद था, जिसका नाम था हरीश चंद्र.
व्याख्यान के अंत में इस युवा ने पाउली के काम में एक गलती की ओर ध्यान दिलाया. यह आपत्ति पाउली को उस समय पसंद नहीं आई, लेकिन आगे चलकर दोनों के बीच आजीवन मित्रता हो गई. यही हरीश चंद्र आगे चलकर गणित की दुनिया के बड़े नामों में शामिल हुए. आज उसी युवा के सिद्धांतों का उपयोग क्वांटम फिजिक्स से लेकर स्पेस साइंस में हो रहा है. उन्हें वर्ष 1954 में प्रतिष्ठित कोल पुरस्कार मिला और वर्ष 1973 में ब्रिटेन की रॉयल सोसाइटी का फेलो चुना गया. आखिर कौन थे हरीश चंद्र और कैसे भौतिकी से शुरू हुआ उनका सफर गणित की दुनिया में मिसाल बन गया?
व्यक्तिगत जीवन
हरीश चंद्र का जन्म 11 अक्टूबर 1923 को उत्तर प्रदेश के कानपुर में हुआ था. उनके पिता चंद्रकिशोर सिविल इंजीनियर थे. बचपन से ही हरीश चंद्र की पढ़ाई में गहरी रुचि थी. नौ साल की उम्र में उन्होंने सातवीं कक्षा में प्रवेश लिया और 14 साल की उम्र में स्कूल की पढ़ाई पूरी कर ली.

इसके बाद उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दाखिला लिया और भौतिकी की पढ़ाई शुरू की. वर्ष 1943 में उन्होंने भौतिकी में मास्टर डिग्री हासिल की. उस समय उनकी दिलचस्पी सैद्धांतिक भौतिकी में थी. मास्टर डिग्री के बाद वह बेंगलुरु स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस पहुंचे. वहां उन्होंने महान वैज्ञानिक होमी जहांगीर भाभा के मार्गदर्शन में सैद्धांतिक भौतिकी पर शोध किया.
उनकी प्रतिभा को देखते हुए उन्हें आगे की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय जाने की सलाह दी गई. वर्ष 1945 में वह कैम्ब्रिज पहुंचे, जहां उन्होंने नोबेल पुरस्कार विजेता भौतिक विज्ञानी पॉल डिराक के निर्देशन में शोध शुरू किया.
हरीश चंद्र का विवाह ललिता काले से हुआ था. उनकी दो बेटियां थीं. दिन 16 अक्टूबर 1983 को अमेरिका के प्रिंस्टन में एक सम्मेलन के दौरान दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया. वह 60 वर्ष के थे. प्रयागराज में स्थित हरिश्चंद्र रिसर्च इंस्टीट्यूट का नाम उनके सम्मान में रखा गया है, जो गणित और सैद्धांतिक भौतिकी में शोध के लिए जाना जाता है.
भौतिकी से गणित की ओर और आधुनिक तकनीक की नींव
हरीश चंद्र ने वर्ष 1947 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से पीएचडी पूरी की. उनका शुरुआती शोध भौतिकी से जुड़ा था, लेकिन इसी दौरान गणित में उनकी रुचि लगातार बढ़ती गई. पॉल डिराक के साथ काम करने और हरमन वेल तथा क्लाउड चेवेली जैसे गणितज्ञों के विचारों से परिचित होने के बाद उनका झुकाव गणित की ओर अधिक हो गया.
इसके बाद वह अमेरिका चले गए और प्रिंस्टन में पॉल डिराक के साथ काम किया. धीरे-धीरे उन्होंने गणित को अपना मुख्य शोध क्षेत्र बना लिया. वर्ष 1950 में उन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय में काम शुरू किया, जहां वह 1963 तक रहे. इसके बाद वह प्रिंस्टन स्थित इंस्टीट्यूट फॉर एडवांस्ड स्टडी से जुड़ गए. वर्ष 1968 में उन्हें आईबीएम वॉन न्यूमैन प्रोफेसर नियुक्त किया गया.
गणित में हरीश चंद्र का सबसे महत्वपूर्ण योगदान प्रतिनिधित्व सिद्धांत (Representation Theory) में रहा. यह गणित की ऐसी शाखा है, जो जटिल गणितीय संरचनाओं और सममितियों को समझने में मदद करती है. उनके प्रमुख योगदानों में निम्नलिखित शामिल हैं:
- Harish-Chandra Isomorphism: गणित की दो जटिल संरचनाओं के बीच संबंध स्थापित करता है और ली समूहों के अध्ययन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.
- Plancherel Formula: ली समूहों के हार्मोनिक विश्लेषण से जुड़े शोध में आधुनिक गणित के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया.
उनके आविष्कारों और सिद्धांतों का वर्तमान में उपयोग:
क्वांटम भौतिकी और आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स: हरीश चंद्र का अधिकांश गणितीय ढांचा इस बात को समझने के लिए इस्तेमाल होता है कि ब्रह्मांड के सबसे सूक्ष्म कण (जैसे इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन और फोटॉन) कैसे व्यवहार करते हैं. आज के क्वांटम कंप्यूटिंग, सेमीकंडक्टर चिप्स, और नैनोटेक्नोलॉजी के पीछे जो जटिल गणितीय मॉडल काम करते हैं, उनमें उनके द्वारा विकसित किए गए सिद्धांतों की बहुत बड़ी भूमिका है.
स्पेस साइंस और उपग्रह: अंतरिक्ष में घूमने वाले उपग्रहों (Satellites), रॉकेट और खगोलीय पिंडों की गति को समझने के लिए ‘सममिति’ (Symmetry) और घूर्णन (Rotation) के गणित की जरूरत होती है. अंतरिक्ष विज्ञान, अंतरिक्ष यान के नेविगेशन सिस्टम और ब्रह्मांड की पहेलियों को सुलझाने के लिए वैज्ञानिक उनके द्वारा दिए गए फार्मूलों और ‘ली समूहों’ (Lie Groups) के विश्लेषण का उपयोग करते हैं.
आधुनिक सिग्नल प्रोसेसिंग और डेटा एनालिसिस: उनके द्वारा किए गए हार्मोनिक विश्लेषण (Harmonic Analysis) के शोध आधुनिक डेटा साइंस की नींव का हिस्सा हैं. आज जो हम मोबाइल कम्युनिकेशन, वाई-फाई, डिजिटल इमेज प्रोसेसिंग, रडार तकनीक और ऑडियो-वीडियो कंप्रेसन का इस्तेमाल करते हैं, उसमें सिग्नल्स को डिकोड करने के लिए इन्हीं उच्च-स्तरीय गणितीय समीकरणों की पृष्ठभूमि का उपयोग किया जाता है.
क्रिप्टोग्राफी और साइबर सुरक्षा: इंटरनेट पर आज जो डेटा सुरक्षित भेजा जाता है (ऑनलाइन बैंकिंग, पासवर्ड, मैसेजिंग एन्क्रिप्शन), उसके पीछे जटिल बीजगणितीय संरचनाएं होती हैं. आधुनिक एन्क्रिप्शन एल्गोरिदम को समझने और उन्हें अधिक सुरक्षित बनाने के लिए अमूर्त बीजगणित (Abstract Algebra) और समरूपता के सिद्धांतों का उपयोग किया जाता है, जिनके विकास में हरीश चंद्र का योगदान मील का पत्थर माना जाता है.
प्रमुख सम्मान और पुरस्कार
गणित में उनके योगदान के लिए वर्ष 1954 में अमेरिकन मैथमेटिकल सोसाइटी ने उन्हें कोल पुरस्कार से सम्मानित किया. वर्ष 1973 में वह ब्रिटेन की प्रतिष्ठित रॉयल सोसाइटी के फेलो चुने गए. वर्ष 1974 में उन्हें भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी की ओर से श्रीनिवास रामानुजन मेडल मिला. वर्ष 1981 में वह अमेरिका की नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज के फेलो भी चुने गए.
Also Read : ‘शहर गैस चैंबर बन सकते हैं’, पटाखों पर रोक को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी


