विजय उराँव
झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के संस्थापक और दिवंगत दिशोम गुरु शिबू सोरेन की पत्नी तथा मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की मां रूपी सोरेन का 7 अक्टूबर 2026 को रांची में निधन हो गया. वह लंबे समय से अस्वस्थ थीं और बरियातू स्थित हिल व्यू अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था. सांस लेने में परेशानी के बाद उन्हें 18 सितंबर को अस्पताल में भर्ती कराया गया था. बुधवार को उनकी हालत अचानक गंभीर हो गई और उन्हें जीवनरक्षक प्रणाली पर रखा गया. बाद में चिकित्सकों ने उनके निधन की पुष्टि की.
रूपी सोरेन की पहचान सिर्फ शिबू सोरेन की पत्नी और हेमंत सोरेन की मां के रूप में नहीं थी. शिबू सोरेन के लंबे राजनीतिक और आंदोलनकारी जीवन के दौरान उन्होंने परिवार की जिम्मेदारी संभाली. खुद एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि शादी के बाद जब शिबू सोरेन आंदोलन के सिलसिले में घर से दूर रहते थे और कई बार फरारी में रहते थे, तब परिवार और बच्चों की जिम्मेदारी उनके ऊपर थी. कठिन परिस्थितियों में उन्होंने घर और खेत संभाले और बच्चों की परवरिश की.
रूपी सोरेन का राजनीतिक जीवन भी रहा. 1999 के लोकसभा चुनाव में झामुमो ने उन्हें दुमका (एसटी) सीट से भाजपा के बाबूलाल मरांडी के खिलाफ मैदान में उतारा. वह चुनाव बेहद करीबी रहा. निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार बाबूलाल मरांडी को 2,01,141 वोट और रूपी सोरेन किस्कू को 1,96,493 वोट मिले. वह 4,648 वोटों के अंतर से चुनाव हार गईं.
चांडिल में था मायका, आठ साल की उम्र में तय हुई थी शादी की बात
रूपी सोरेन का मायका चांडिल में था. अपने एक इंटरव्यू में उन्होंने शिबू सोरेन से मुलाकात और विवाह की कहानी खुद बताई थी. उनके मुताबिक, करीब 60 साल पहले जब वह केवल आठ साल की थीं, तब दुर्गा पूजा के दौरान शिबू सोरेन उनके गांव चांडिल आए थे.
उनके गांव में रहने वाले एक राजपूत परिवार के शिबू सोरेन से संबंध थे. इसी परिवार के लोग उन्हें दुर्गा पूजा के दौरान चांडिल लेकर आए थे. पूजा के बाद परिवार के एक बुजुर्ग ने शिबू सोरेन के सामने गांव की एक लड़की से रिश्ता करने का प्रस्ताव रखा. वह लड़की रूपी थीं.

शिबू सोरेन ने उस समय कहा था कि उनके बड़े भाई की अभी शादी नहीं हुई है. इसके बाद पहले उनके बड़े भाई की शादी हुई और फिर कुछ वर्षों के इंतजार के बाद शिबू सोरेन और रूपी का विवाह हुआ. रूपी सोरेन ने उस बातचीत में कहा था कि इसके बाद दोनों हर सुख-दुख के साथी रहे.
राज्यसभा के आधिकारिक रिकॉर्ड में शिबू सोरेन की वैवाहिक स्थिति में 1 जनवरी 1962 को विवाह और पत्नी के नाम के रूप में श्रीमती रूपी सोरेन दर्ज है.
शिबू आंदोलन में रहे, रूपी ने संभाला घर
शादी के बाद शिबू सोरेन झारखंड के आंदोलन और आदिवासी अधिकारों से जुड़े संघर्ष में सक्रिय रहे. इस दौर में उन्हें पुलिस और कानूनी कार्रवाई का सामना भी करना पड़ा. रूपी सोरेन ने 2023 में दिए इंटरव्यू में उस समय की कई घटनाएं साझा की थीं. यह इंटरव्यू प्रभात खबर में छपी थी और इसका इंटरव्यू अनुज कुमार सिन्हा ने ली थी.
उन्होंने बताया था कि करीब 1970 के आसपास पुलिस उनके घर आती थी और उनसे शिबू सोरेन के बारे में पूछताछ करती थी. एक बार पुलिस के आने पर उन्होंने साफ तौर पर कहा था कि यह शिबू सोरेन का घर नहीं, बल्कि रूपी सोरेन का घर है और जहां शिबू हैं, वहां जाकर उन्हें खोजा जाए.
उन्होंने यह भी बताया था कि जब शिबू सोरेन टुंडी के आसपास जंगल और पहाड़ों में फरारी के दौरान रहते थे और उनका पता नहीं चल रहा था, तब वह अपनी सास और ननद के साथ उन्हें खोजने जंगल तक गई थीं. उस समय उनके गोद में उनका बेटा दुर्गा था. उन्होंने इसे अपने परिवार के कठिन दौर में से एक बताया था.
एक अन्य घटना का जिक्र करते हुए रूपी सोरेन ने बताया था कि शिबू सोरेन के जेल जाने के बाद उन्हें बाहर निकालने के लिए पैसे की जरूरत पड़ी थी. परिवार के लोगों की मदद से पैसे जुटाए गए और शिबू सोरेन को जेल से बाहर लाया गया.
उनके इंटरव्यू में यह भी सामने आता है कि परिवार की जमीन पर कब्जा करने की कोशिश करने वाले महाजनों का उन्होंने विरोध किया था. यानी शिबू सोरेन के राजनीतिक संघर्ष के समानांतर घर और परिवार की कई जिम्मेदारियां रूपी सोरेन ने संभालीं.
चार बच्चों की परवरिश की
शिबू और रूपी सोरेन के तीन बेटे और एक बेटी हैं. इनमें दुर्गा सोरेन, हेमंत सोरेन, बसंत सोरेन और अंजनी सोरेन शामिल हैं. शिबू सोरेन के राजनीतिक जीवन के दौरान परिवार की जिम्मेदारियों में रूपी सोरेन की भूमिका महत्वपूर्ण रही.
उनके सबसे बड़े बेटे दुर्गा सोरेन झामुमो के प्रमुख नेताओं में शामिल हुए. वह जामा से विधायक रहे और पार्टी के महासचिव भी रहे. मई 2009 में 39 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया.
दूसरे बेटे हेमंत सोरेन आगे चलकर झारखंड की राजनीति के प्रमुख नेताओं में शामिल हुए और राज्य के मुख्यमंत्री बने. छोटे बेटे बसंत सोरेन भी राजनीति में सक्रिय रहे. बेटी अंजनी सोरेन भी झामुमो से जुड़ी रही हैं.
1999 में बाबूलाल मरांडी के खिलाफ लड़ा चुनाव
रूपी सोरेन ने परिवार की जिम्मेदारियों तक खुद को सीमित नहीं रखा. साल 1999 में वह सीधे चुनावी राजनीति में उतरीं. झामुमो ने उन्हें दुमका लोकसभा सीट से भाजपा के बाबूलाल मरांडी के खिलाफ उम्मीदवार बनाया.
निर्वाचन आयोग के आधिकारिक परिणाम के अनुसार, दुमका लोकसभा सीट पर बाबूलाल मरांडी को 2,01,141 वोट मिले, जबकि रूपी सोरेन किस्कू को 1,96,493 वोट मिले. यानी दोनों के बीच केवल 4,648 वोट का अंतर रहा. कुल वैध मतों के आधार पर जीत का अंतर 0.85 प्रतिशत था.

चुनाव 18 सितंबर 1999 को हुआ था और मतगणना तथा परिणाम की घोषणा 6 अक्टूबर 1999 को हुई. इस चुनाव के बाद रूपी सोरेन लगातार चुनावी राजनीति में सक्रिय नहीं रहीं.
शिबू सोरेन के निधन के बाद भी परिवार के साथ रहीं
शिबू सोरेन का 4 अगस्त 2025 को निधन हुआ. राज्यसभा के शोक संदर्भ के अनुसार, वह लंबे समय तक झारखंड की राजनीति और आदिवासी अधिकारों के आंदोलन से जुड़े रहे. वह तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री रहे और केंद्र में कोयला मंत्री भी रहे.
शिबू सोरेन के निधन के बाद रूपी सोरेन परिवार की वरिष्ठ सदस्य के रूप में रहीं. जून 2026 में शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्म भूषण से सम्मानित किया गया. राष्ट्रपति भवन में आयोजित समारोह में रूपी सोरेन ने उनकी ओर से यह सम्मान ग्रहण किया. उस समय वह व्हीलचेयर पर थीं. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने प्रोटोकॉल से हटकर मंच से नीचे आकर उन्हें सम्मान प्रदान किया.
सितंबर से चल रहा था इलाज
रूपी सोरेन की तबीयत सितंबर 2026 में बिगड़ी थी. 18 सितंबर को सांस लेने में परेशानी के बाद उन्हें रांची के हिल व्यू अस्पताल में भर्ती कराया गया था. शुरुआती जानकारी में डॉक्टरों ने उनकी स्थिति को नियंत्रित बताया था.
इसके बाद उनकी तबीयत में उतार-चढ़ाव बना रहा. 22 सितंबर की रिपोर्ट में उनके इलाज और विशेषज्ञ डॉक्टरों की निगरानी की जानकारी सामने आई थी. इससे पहले वह दूसरे शहर में भी इलाज करा चुकी थीं.
7 अक्टूबर को उनकी हालत फिर गंभीर हो गई. अस्पताल के अनुसार उन्हें कई जटिलताओं का सामना करना पड़ा और जीवनरक्षक प्रणाली पर रखा गया. उसी दिन उनका निधन हो गया.
रूपी सोरेन का सार्वजनिक जीवन शिबू सोरेन की तरह सक्रिय राजनीतिक पदों से भरा नहीं रहा, लेकिन झारखंड आंदोलन के एक लंबे दौर में उन्होंने परिवार की जिम्मेदारी संभाली. उन्होंने अपने जीवन में राजनीतिक संघर्ष, पति का जेल और फरारी का दौर, बच्चों की परवरिश, बड़े बेटे दुर्गा सोरेन की असमय मृत्यु और फिर शिबू सोरेन का निधन देखा. 1999 में उन्होंने खुद चुनाव लड़कर अपनी राजनीतिक मौजूदगी भी दर्ज कराई. 7 अक्टूबर 2026 को उनके निधन के साथ सोरेन परिवार की उस पीढ़ी का एक महत्वपूर्ण अध्याय समाप्त हो गया, जो शिबू सोरेन के शुरुआती संघर्ष के दौर से उनके साथ रही थी.
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