दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है कि किसी महिला पर भी गैंगरेप का आरोप लगाया जा सकता है, भले ही उसने खुद शारीरिक रूप से रेप नहीं किया हो. यदि वह समूह के साथ मिलकर अपराध कराने की साझा मंशा से काम करती है, तो उसके खिलाफ गैंगरेप का मुकदमा चल सकता है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून में इस्तेमाल किए गए शब्द ‘व्यक्ति’ को केवल पुरुषों तक सीमित नहीं किया जा सकता.
जस्टिस अनूप जयराम भंभानी की अदालत ने गुरुवार, 15 अक्टूबर को एक महिला की याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की. महिला पर अपनी नाबालिग बेटी को दूसरे आरोपी के साथ यौन संबंध बनाने के लिए कथित रूप से मजबूर करने का आरोप है. महिला ने निचली अदालत के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसके खिलाफ गैंगरेप समेत अन्य धाराओं में आरोप तय किए गए थे. हाई कोर्ट ने 17 जनवरी 2025 के उस आदेश को बरकरार रखा.
क्या है पूरा मामला?
यह मामला दिल्ली के भलस्वा डेयरी थाने में जुलाई 2024 में दर्ज एफआईआर से जुड़ा है. शुरुआत में नाबालिग लड़की की मां ने उसके अपहरण की शिकायत दर्ज कराई थी. बाद में लड़की के बयान के आधार पर यौन अपराधों के आरोप सामने आए.

लड़की ने आरोप लगाया कि उसकी मां उसे दूसरे आरोपी के साथ शारीरिक संबंध बनाने के लिए मजबूर करती थी. लड़की ने यह भी कहा कि विरोध करने पर उसे जान से मारने की धमकी दी जाती थी. आरोप है कि उसकी मां कथित यौन हमलों के दौरान मौजूद रहती थी और उसे आरोपी के साथ संबंध बनाने के लिए दबाव डालती थी.
पीड़िता के बयान के मुताबिक, कथित घटनाएं दिसंबर 2023 से जुलाई 2024 के बीच हुईं. उसने यह भी आरोप लगाया कि 23 दिसंबर 2023 की एक घटना का वीडियो उसकी मां के मोबाइल फोन में मौजूद था. जुलाई 2024 में दोबारा धमकी मिलने के बाद वह घर छोड़कर चली गई.
कोर्ट के अनुसार, गैंगरेप से संबंधित प्रावधान में ‘एक या अधिक व्यक्तियों के समूह’ का उल्लेख है. इस शब्द को केवल पुरुषों के समूह तक सीमित रखने का कोई तार्किक या कानूनी आधार नहीं है. अदालत ने यह भी कहा कि साझा मंशा से अपराध को अंजाम देने की अवधारणा को केवल पुरुषों की मंशा तक सीमित नहीं किया जा सकता.
अदालत ने स्पष्ट किया कि गैंगरेप के अपराध में यह जरूरी नहीं है कि साझा मंशा के तहत काम करने वाला प्रत्येक व्यक्ति खुद शारीरिक रूप से रेप करे. यदि कोई व्यक्ति पीड़िता के साथ रेप कराने के उद्देश्य से साझा मंशा के तहत काम करता है और मामले में कानून की आवश्यक शर्तें पूरी होती हैं, तो उस पर भी गैंगरेप का आरोप लगाया जा सकता है.
इसी आधार पर हाई कोर्ट ने महिला की यह दलील स्वीकार नहीं की कि उसे केवल महिला होने के कारण गैंगरेप के आरोप से बाहर रखा जाना चाहिए.
महिला की ओर से सुप्रीम कोर्ट के 2006 के प्रिया पटेल बनाम मध्य प्रदेश राज्य फैसले का हवाला दिया गया था. उस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने तत्कालीन कानूनी प्रावधानों के तहत रेप और गैंगरेप में महिला की आपराधिक जिम्मेदारी पर विचार किया था.
हालांकि, हाई कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि किसी महिला पर अकेले गैंगरेप का आरोप नहीं लगाया जा सकता. गैंगरेप के लिए कानून में निर्धारित समूह और अपराध से जुड़ी दूसरी आवश्यक शर्तों का पूरा होना जरूरी है.
मामले में नाबालिग पीड़िता होने के कारण यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम यानी पॉक्सो एक्ट के प्रावधान भी लागू किए गए. निचली अदालत ने महिला के खिलाफ पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत भी आरोप तय किया था.


