जोहार लाइव ब्यूरो
रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने साहिबगंज के करीब 11 साल पुराने हत्या मामले में अहम फैसला सुनाते हुए आरोपी बिल्ला यादव उर्फ जैदुलार यादव को बरी कर दिया है. कोर्ट ने गवाहों के बयानों में विरोधाभास, प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही की विश्वसनीयता पर संदेह और जब्त हथियार व खून लगी मिट्टी की फॉरेंसिक जांच नहीं कराए जाने को महत्वपूर्ण माना. अदालत ने कहा कि निचली अदालत ने साक्ष्यों का सही परिप्रेक्ष्य में मूल्यांकन नहीं किया और ऐसे साक्ष्यों के आधार पर दोषसिद्धि करना गंभीर कानूनी त्रुटि है.
हाईकोर्ट की खंडपीठ में न्यायमूर्ति आनंद सेन और न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव शामिल थे. न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव ने फैसला सुनाया, जबकि न्यायमूर्ति आनंद सेन ने इससे सहमति जताई. अदालत ने 15 अक्टूबर 2026 को फैसला सुनाते हुए बिल्ला यादव की दोषसिद्धि और सजा को रद्द कर दिया. आरोपी को निचली अदालत ने हत्या के मामले में उम्रकैद और 10 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी.

2011 में हुई थी हत्या
मामला 14 मई 2011 का है. अभियोजन पक्ष के अनुसार, शाम करीब छह बजे साहिबगंज के सकरीगली क्षेत्र में सुचन मंडल अपने पड़ोसी को बांस खींचने में मदद के लिए बुलाने जा रहे थे. इसी दौरान आरोप लगाया गया कि बिल्ला यादव ने धारदार हथियार झोरनी से उनकी गर्दन पर वार कर दिया. गंभीर चोट लगने के बाद सुचन मंडल की मौके पर ही मौत हो गई.
मृतक के बेटे जगदीश मंडल के बयान पर साहिबगंज मुफस्सिल थाना में प्राथमिकी दर्ज की गई थी. जांच के बाद आरोपी के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल हुआ. दिसंबर 2016 में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश-प्रथम, साहिबगंज की अदालत ने बिल्ला यादव को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी. इसके खिलाफ आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील की थी.
गवाहों के बयानों में मिला विरोधाभास
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि मामले के प्रमुख गवाहों के बयानों में महत्वपूर्ण अंतर था. प्राथमिकी में पुरानी दुश्मनी को हत्या की वजह बताया गया था, लेकिन मृतक के बेटे और परिवार के अन्य सदस्यों ने जिरह के दौरान आरोपी से पहले किसी तरह की दुश्मनी होने से इनकार किया.
अदालत ने प्रत्यक्षदर्शी होने का दावा करने वाले गवाहों की गवाही पर भी सवाल उठाए. एक गवाह के बयान और उसकी जिरह में अंतर था, जबकि दूसरे गवाह के घटना के समय मौके पर मौजूद होने को लेकर भी संदेह सामने आया. कोर्ट के अनुसार, इन परिस्थितियों में गवाहों की गवाही को पूरी तरह विश्वसनीय नहीं माना जा सकता.
हथियार की फॉरेंसिक जांच नहीं, बरामदगी भी संदिग्ध
अदालत ने जांच की कमियों को भी महत्वपूर्ण माना. मामले में कथित हत्या के हथियार और खून लगी मिट्टी को जब्त किया गया था, लेकिन दोनों को रासायनिक जांच के लिए फॉरेंसिक प्रयोगशाला नहीं भेजा गया. साथ ही, हथियार कहां से और किन परिस्थितियों में बरामद हुआ, इसे लेकर भी स्पष्टता नहीं थी.
हाईकोर्ट ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्य आरोपी की हत्या में प्रत्यक्ष संलिप्तता साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं. गवाहों के बयानों में विरोधाभास और जांच की कमियों के कारण अभियोजन का मामला संदेह के घेरे में आ गया.
संदेह का लाभ देकर किया बरी
अदालत ने कहा कि गंभीर अपराध में दोषसिद्धि के लिए ठोस, विश्वसनीय और स्पष्ट साक्ष्य जरूरी हैं. निचली अदालत ने गवाहों के बयानों में मौजूद महत्वपूर्ण विरोधाभासों पर उचित विचार नहीं किया था. ऐसे में आरोपी को संदेह का लाभ दिया जाना जरूरी है.
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने बिल्ला यादव की दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा रद्द करते हुए उसे आरोप से बरी कर दिया. अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि यदि आरोपी किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है, तो उसे तत्काल रिहा किया जाए.
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