झारखंड में पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा के खिलाफ भ्रष्टाचार की जांच करने वाले पूर्व ईडी अफसर राजेश्वर सिंह के ससुर की 24 साल पहले हत्या कर दी गई थी. पहले लखनऊ पुलिस और बाद में सीबीआई ने मामले की जांच की और अब आरोपियों को सजा सुनाई है. राजेश्वर सिंह ने ईडी में अपने कार्यकाल के दौरान मधु कोड़ा और उनके कैबिनेट सहयोगियों के खिलाफ कार्रवाई की थी. उनकी पत्नी लक्ष्मी सिंह अभी नोएडा की पुलिस कमिश्नर हैं. जबकि सिंह वर्तमान में सरोजनीनगर से विधायक हैं.
पूरा मामला लक्ष्मी सिंह और उनके परिजनों के लिए महत्वपूर्ण है समझिये: यह सिर्फ एक अदालती फैसले की कानूनी कहानी नहीं है. यह कहानी है एक बेबस पत्नी के 24 साल लंबे संघर्ष की, एक आईपीएस बिटिया के अपने पिता को खोने के दर्द की जो बाद में खुद उत्तर प्रदेश के सबसे रसूखदार पुलिस अफसरों में से एक (गौतमबुद्ध नगर/नोएडा की पुलिस कमिश्नर) बनीं, और उस मानवीय पहलू की जो सत्ता और खाकी के पीछे छिपे आंसुओं को बयां करता है.
7 जुलाई 2026 को लखनऊ की विशेष सीबीआई अदालत में जब जज वायु नंदन मिश्रा ने पूर्व लखनऊ बार एसोसिएशन के अध्यक्ष इंद्रदेव सिंह की हत्या के मामले में तीन दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई, तो अदालत कक्ष में एक भारी सन्नाटा पसर गया. इस सन्नाटे के बीच दो महिलाएं बेहद शांत लेकिन दृढ़ खड़ी थीं. दिवंगत इंद्रदेव सिंह की पत्नी नयनतारा और उनकी बेटी लक्ष्मी सिंह (IPS अधिकारी और नोएडा की पुलिस कमिश्नर).
जब फैसला आया, तो दोनों मां-बेटी बिना कुछ बोले चुपचाप कोर्ट रूम से बाहर निकलीं. आईपीएस लक्ष्मी सिंह ने अपनी बूढ़ी मां का हाथ थाम रखा था, जिन्हें अब चलने में भी तकलीफ होती है. वह मां जो 24 साल से अपनी आंखों में न्याय की उम्मीद लिए बूढ़ी हो चुकी थी, आज उसकी बेटी, जो खुद कानून की रक्षक है, उसका सहारा बनकर खड़ी थी.
वो खौफनाक दोपहर. जब बिखर गया था परिवार
बात 8 अगस्त 2002 की दोपहर की है. 57 वर्षीय वरिष्ठ वकील इंद्रदेव सिंह अपनी पत्नी नयनतारा और 24 साल के बेटे दिग्विजय (जो अब एक शिक्षक हैं) के साथ त्योहारों की खरीदारी के लिए अमीनाबाद जाने वाले थे. इंद्रदेव सिंह अपनी बाइक से आगे निकले, और पत्नी व बेटा दूसरी बाइक से उनके पीछे-पीछे चल रहे थे.
कोर्ट से बमुश्किल 500 मीटर दूर कैसरबाग टेलीफोन एक्सचेंज के पास पहुंचते ही, एक बाइक पर आए दो बदमाशों ने उन्हें घेर लिया. इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, बदमाशों ने बेहद करीब से इंद्रदेव सिंह पर गोलियां बरसा दीं. एक गोली सीधे उनकी गर्दन में लगी. पत्नी और बेटे की आंखों के सामने इंद्रदेव लहूलुहान होकर सड़क पर गिर पड़े. राहगीरों की मदद से उन्हें अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. इस हत्याकांड ने पूरे लखनऊ के कानूनी गलियारे को हिलाकर रख दिया था.
उस वक्त लक्ष्मी सिंह 2000 बैच की युवा आईपीएस अधिकारी थीं और पश्चिम बंगाल कैडर में तैनात थीं. पिता की मौत के बाद, अपनी मां और भाई को संभालने के लिए उन्होंने उत्तर प्रदेश ट्रांसफर की मांग की. तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने संवेदनशीलता दिखाते हुए उन्हें 3 साल के डेपुटेशन पर यूपी भेजा, ताकि वह इस संकट की घड़ी में अपने परिवार के साथ खड़ी रह सकें.
हत्या की वजह एक जमीन का विवाद थी. इंद्रदेव सिंह ने सीतापुर रोड पर एक जमीन खरीदी थी और अपने पुराने सहयोगी मन्ना लाल गुप्ता (पूर्व लेखपाल और वकील) को उसे बेचने का काम सौंपा था. जब पैसों के लेनदेन में गड़बड़ी सामने आई, तो विवाद बढ़ गया. सीबीआई जांच में सामने आया कि मन्ना लाल ने ही इंद्रदेव सिंह को रास्ते से हटाने के लिए शूटरों को मोटी रकम देकर भाड़े पर रखा था.
मामले की गंभीरता को देखते हुए 2002 में ही जांच सीबीआई को सौंप दी गई थी. करीब 24 साल तक चले इस लंबे ट्रायल के दौरान 50 गवाहों से पूछताछ हुई. वक्त का पहिया ऐसा घूमा कि इस साजिश के मुख्य सूत्रधार मन्ना लाल गुप्ता समेत तीन आरोपियों की तो ट्रायल के दौरान ही मौत हो गई.
बाकी बचे तीन दोषियों. विक्रम यादव (जिसने गोली चलाई थी), पन्ना सिंह और बृजेश यादव को कोर्ट ने दोषी पाते हुए उम्रकैद और डेढ़ लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनाई. कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि जुर्माने की 80 फीसदी राशि पीड़ित परिवार को मुआवजे के तौर पर दी जाए.
24 साल के इस लंबे सफर ने परिवार से बहुत कुछ छीन लिया. बेटा शिक्षक बन गया, बेटी राज्य की सबसे बड़ी पुलिस अधिकारियों में शुमार हो गई, लेकिन पिता की कमी कभी पूरी नहीं हो सकी. अदालत से बाहर निकलते वक्त मां-बेटी का मौन और एक-दूसरे का हाथ थामे रखना यह बयां कर रहा था कि भले ही इंसाफ़ की लड़ाई बहुत लंबी और थका देने वाली थी, लेकिन आखिरकार सच्चाई और कानून की जीत हुई.
Also Read : आरजी कर रे’प पीड़िता की मां के बयान से नाराज क्यों हुए लोग?

