Ranchi : रांची के धुर्वा इलाके में बने झारखंड हाई कोर्ट के नए परिसर को देखकर पहली नजर में लगता है जैसे किसी आधुनिक इमारत में आ गए हों। लेकिन इसी आधुनिक बिल्डिंग के अंदर एक ऐसी गैलरी तैयार की गई है, जो आपको करीब 100 साल पीछे ले जाती है। यह म्यूजियम सिर्फ पुरानी चीजों का संग्रह नहीं है, बल्कि झारखंड और अविभाजित बिहार की न्यायिक विरासत की पूरी कहानी समेटे हुए है। यहां कदम रखते ही ऐसा लगता है जैसे आप किसी “लीगल टाइम मशीन” में आ गए हों।
100 साल की न्यायिक यात्रा एक ही जगह
इस गैलरी का मकसद साफ है – आज की युवा पीढ़ी के वकीलों और न्यायिक कर्मचारियों को यह दिखाना कि न्याय व्यवस्था आज जहां है, वहां तक पहुंचने में कितनी मेहनत, परंपरा और संघर्ष लगे हैं। दीवारों पर सजे दस्तावेज, कांच की अलमारियों में रखे पुराने टाइपराइटर, भारी-भरकम फाइलें और ऐतिहासिक घड़ियां यह बताती हैं कि एक दौर ऐसा भी था जब हर फैसला हाथ से लिखा जाता था और हर दस्तावेज को सहेजकर रखना अपने आप में बड़ी जिम्मेदारी होती थी।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद की ऐतिहासिक एंट्री
इस म्यूजियम का सबसे खास आकर्षण हजारीबाग स्थित जयप्रकाश नारायण सेंट्रल जेल का पुराना एंट्री रजिस्टर है। इसी रजिस्टर में देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के जेल में दाखिल होने का रिकॉर्ड दर्ज है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जब सेनानियों को जेल भेजा जाता था, तब किस तरह बारीकी से उनका रिकॉर्ड रखा जाता था, यह रजिस्टर उसी का जीवंत उदाहरण है। यह सिर्फ एक कागज नहीं, बल्कि आजादी की लड़ाई और न्याय व्यवस्था के रिश्ते की अहम कड़ी है।
जब फैसले कलम से लिखे जाते थे
आज के दौर में फैसले कंप्यूटर पर टाइप होते हैं, लेकिन इस गैलरी में 1941 के दौर के हस्तलिखित जजमेंट भी रखे गए हैं। उस समय के जजों की साफ-सुथरी लिखावट और भाषा की गंभीरता देखकर कोई भी हैरान रह जाए। एक दिलचस्प परंपरा भी यहां दिखाई गई है – कहा जाता है कि जब कोई जज फांसी की सजा सुनाता था, तो वह अपनी कलम की निब तोड़ देता था। गैलरी में उस दौर की कलमें भी सहेजकर रखी गई हैं। यह इस बात का प्रतीक था कि जिस कलम से किसी की जिंदगी खत्म करने का आदेश दिया गया, उसका दोबारा इस्तेमाल नहीं होना चाहिए।
टाइपराइटर से डिजिटल दौर तक
कांच की अलमारियों में रखे पुराने टाइपराइटर, दीवार घड़ियां और कानूनी दस्तावेज साफ बताते हैं कि तकनीक ने न्यायपालिका को किस तरह बदल दिया है। पहले जहां हर कागज टाइप करने में घंटों लगते थे, वहीं आज डिजिटल सिस्टम ने काम को आसान और तेज बना दिया है।
हफ्ते में दो दिन खुलता है म्यूजियम
यह म्यूजियम आम लोगों के लिए फिलहाल खुला नहीं है। शुक्रवार को हाई कोर्ट के वकीलों को यहां आने की अनुमति दी जाती है, जबकि शनिवार को वर्किंग डे के दौरान स्टाफ यहां आ सकता है।
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