जोहार लाइव ब्यूरो
झारखंड हाईकोर्ट ने पूर्वी सिंहभूम के पटमदा थाना क्षेत्र में एक महिला के साथ सामूहिक दुष्कर्म के मामले में चार दोषियों की सजा बरकरार रखी है. अदालत ने दोषियों की ओर से दायर दोनों आपराधिक अपीलों को खारिज करते हुए निचली अदालत के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया. चारों को 20-20 साल के कठोर कारावास और 40-40 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई थी. हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि मेडिकल जांच में शुक्राणु नहीं मिलने या जांच में कुछ कमियां होने मात्र से पीड़िता की विश्वसनीय गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता.
न्यायमूर्ति आनंद सेन और न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने 15 अक्टूबर 2026 को यह फैसला सुनाया. मामला क्रिमिनल अपील (डीबी) संख्या 1283/2018 और 1337/2018 से संबंधित था. अपीलें जमशेदपुर के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश-X सह फास्ट ट्रैक कोर्ट के 23 अगस्त 2018 के दोषसिद्धि आदेश और 29 अगस्त 2018 की सजा के खिलाफ दायर की गई थीं.

जंगल में महिला के साथ सामूहिक दुष्कर्म का आरोप
अभियोजन के अनुसार, 5 नवंबर 2013 को करीब दोपहर तीन बजे महिला अपने ससुराल से मायके जा रही थी. इसी दौरान लापित छेंचा जंगल के पास चार आरोपियों ने उसे पकड़ लिया और जंगल के भीतर नाले के पास ले जाकर बारी-बारी से दुष्कर्म किया. महिला के शोर मचाने पर आसपास लकड़ी काट रहे लोगों की गतिविधि सुनकर आरोपी मौके से भाग गए.
इसके बाद महिला को लागु हांसदा ने उसके भाई प्रकाश हेंब्रम के घर पहुंचाया, जहां वह रात में रुकी. अगले दिन गांव में पंचायत बुलाने की बात सामने आई. आरोपियों के नहीं पहुंचने के बाद 8 नवंबर 2013 को पटमदा थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई गई.
मेडिकल रिपोर्ट में क्या मिला?
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने दलील दी कि मेडिकल जांच में शुक्राणु नहीं मिले, निजी अंगों पर चोट के निशान नहीं थे और पीड़िता के कपड़े जब्त कर डीएनए जांच नहीं कराई गई. बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि घटना के तीन दिन बाद प्राथमिकी दर्ज हुई और आरोपियों की पहचान को लेकर संदेह है.
हाईकोर्ट ने मेडिकल रिपोर्ट पर विचार करते हुए पाया कि पीड़िता की पीठ और दोनों स्तनों पर कई खरोंच के निशान थे. डॉक्टर ने चोटों की उम्र तीन से चार दिन बताई थी. रिपोर्ट में शुक्राणु नहीं मिलने के बावजूद चिकित्सक ने यौन संबंध होने की बात कही थी.
अदालत ने माना कि घटना और मेडिकल जांच के बीच लगभग 72 घंटे का अंतर था. ऐसे में शुक्राणु नहीं मिलने को अपने आप में दुष्कर्म के आरोप को गलत साबित करने वाला आधार नहीं माना जा सकता. पीड़िता के शरीर पर मिले चोटों के निशान भी उसके बयान की पुष्टि करते हैं.
पीड़िता की गवाही को माना भरोसेमंद
खंडपीठ ने कहा कि पीड़िता ने अदालत में घटना का विस्तार से वर्णन किया और आरोपियों को चेहरे से पहचाना. वह उनके नाम सही ढंग से नहीं बता सकी, लेकिन इससे उसकी पहचान संबंधी गवाही अविश्वसनीय नहीं हो जाती.
अदालत ने प्राथमिकी दर्ज कराने में तीन दिन की देरी को भी स्वीकार्य माना. पीड़िता ग्रामीण क्षेत्र की विधवा और अशिक्षित महिला थी. घटना के बाद गांव में पंचायत के माध्यम से मामला सुलझाने की कोशिश की गई थी. अदालत के अनुसार, इस परिस्थिति में देरी को संदेह का आधार नहीं बनाया जा सकता.
हाईकोर्ट ने चारों दोषियों की दोषसिद्धि और सजा बरकरार रखते हुए अपीलें खारिज कर दीं. हेमंत सिंह उर्फ हेमंत सिंह उर्फ हाटो सिंह पहले से जेल में है. वहीं, रामनाथ सिंह उर्फ मुंडा सिंह, विभीषण सिंह उर्फ पंचू सिंह और फागु हांसदा उर्फ सुफल हांसदा जमानत पर थे.
अदालत ने इन तीनों की जमानत रद्द करते हुए उन्हें फैसले की तारीख से दो महीने के भीतर संबंधित ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है. ऐसा नहीं करने पर निचली अदालत को उन्हें हिरासत में लेने के लिए आवश्यक कार्रवाई करने का आदेश दिया गया है.
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