झारखंड पुलिस की जद में नक्सलियों का गढ़ “बूढ़ा पहाड़”, ऐसे फंस रहे नक्सली

प्रशांत सिंह

रांची। झारखंड में दशकों से जिस जगह पर माओवादी अपना पांव पसार एक अलग दुनिया बसाए हुए थे, उस जगह पर आज झारखंड पुलिस और सुरक्षाबलों का वर्चस्व कायम है। नक्सलियों के प्रभाव वाला अब ऐसा कोई इलाका नहीं बचा है, जो सुरक्षाबलों के दायरे से बाहर हो। उक्त बातें सीआरपीएफ के एक अधिकारी ने कहा है। उन्होंने कहा कि झारखंड का ‘बूढ़ा पहाड़’ इलाका, जो नक्सलियों का एक बड़ा गढ़ रहा है, उसे भी ढहा दिया गया है। ‘सीआरपीएफ’ व झारखंड पुलिस, यहां कैंप स्थापित कर रही है। पिछले दिनों यहां से नक्सलियों को खदेड़ने के लिए ‘ऑपरेशन ऑक्टोपस’ शुरू किया था। झींकपानी, पीपरढाब व पुंदाग आदि जगहों से नक्सली भाग खड़े हुए। कहीं पर ‘लव एंगल’ तो कहीं सुरक्षा बलों द्वारा खत्म की गई रसद व अन्य सामग्री की सप्लाई चेन, टॉप नक्सलियों के खात्मे की वजह बनती रही है।

झारखंड में बूढ़ा पहाड़ को नक्सलियों का आखिरी किला बताया जा रहा है। यहां पर कई वर्षों से नक्सलियों ने पांव जमा रखे थे। इस सुरक्षित गढ़ तक सुरक्षा बलों का पहुंचना, एक बड़ी चुनौती रहा है। सात-आठ साल पहले नक्सलियों ने ‘बूढ़ा पहाड़’ को झारखंड-बिहार व उत्तरी छत्तीसगढ़ सीमांत एरिया स्पेशल कमेटी का मुख्यालय घोषित किया था। मारे जा चुके नक्सली कमांडर अरविंद, जिस पर एक करोड़ रुपय का इनाम था, उसने एक बड़ी रणनीति के साथ ‘बूढ़ा पहाड़’ को ही अपना ठिकाना बनाया था। यहां ट्रेनिंग सेंटर भी तैयार किया गया। अरविंद की मौत के बाद सुधाकरण को बूढ़ा पहाड़ की कमान सौंपी गई। सुरक्षा बलों के दबाव के चलते जब सुधाकरण ने आत्मसमर्पण किया, तो 25 लाख रुपये के इनामी नक्सली व टॉप कमांडर विमल उर्फ राधे श्याम यादव को बूढ़ा पहाड़ की जिम्मेदारी मिली। सुरक्षा बलों ने इंटेलिजेंस के जरिए पता लगाया कि विमल को छत्तीसगढ़ के पिपरढाब इलाके में रहने वाली एक लड़की से प्यार हो गया था। सुरक्षा बलों की नई रणनीति शुरू हुई। माओवादियों के शीर्ष नेतृत्व ने विमल यादव का कद घटा दिया और बूढ़ा पहाड़ की कमान मिथिलेश मेहता के हाथ में दे दी गई। गत वर्ष हार्डकोर नक्सली विमल यादव ने अपने प्रेमिका के साथ सुरक्षा बलों के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया।

  • केंद्रीय गृह मंत्री ले रहे नियमित रिपोर्ट

सीआरपीएफ मुख्यालय के अधिकारी बताते हैं कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, नक्सल प्रभावित क्षेत्रों की नियमित रिपोर्ट ले रहे हैं। कहां पर सुरक्षा बलों का कैंप स्थापित हुआ है, कितने हार्डकोर नक्सली बचे हैं और ऑपरेशन का स्टेट्स, आदि बातों का गहराई से विश्लेषण करते हैं। झारखंड के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सीआरपीएफ व स्थानीय पुलिस की पहुंच होने के बाद अब छत्तीसगढ़ के इलाकों पर फोकस किया जाएगा। बस्तर सहित कई क्षेत्रों में अभी तक माओवादियों का प्रभाव कायम है। आईजी ‘आपरेशन’ राजीव सिंह बताते हैं, सुरक्षा बलों ने जिस तरह से झारखंड में अपनी पहुंच बनाई है, वैसे ही नक्सल प्रभावित दूसरे राज्यों से भी माओवादियों को खदेड़ा जाएगा। माइनिंग, ये नक्सलियों की कमाई का प्रमुख स्रोत रहा है। अब इस पर काफी हद तक रोक लगी है। सुरक्षा बलों के पहुंचने के बाद माइनिंग साइट पर नक्सलियों को टका सा जवाब दे दिया जाता है। इससे पैसे का संकट खड़ा हो गया। दूसरा, उनकी सप्लाई चेन को बाधित किया जा रहा है। नतीजा, अनेक नक्सली सरेंडर करने लगे हैं। सीआरपीएफ को अपने मजबूत ‘इंटेलिजेंस’ तंत्र का बड़ा फायदा मिल रहा है।

  • एक-दूसरे के मददगार बन रहे सुरक्षा बल एवं स्थानीय लोग

आईजी राजीव सिंह के मुताबिक, बूढ़ा पहाड़ इलाके में अब कैंप स्थापित किया जा रहा है। यहां के अनेकों गांव ऐसे हैं, जहां लोगों ने विकास को नहीं देखा है। अब सरकारी योजनाएं यहां पर आ सकेंगी। सड़के, स्कूल, मेडिकल सुविधा व रोजगार से लोगों का जीवन स्तर ऊपर उठेगा। यहां पर सुरक्षा बल और स्थानीय लोग, एक दूसरे के मददगार बन रहे हैं। सीआरपीएफ ने गांव में टीवी मुहैया कराया है। कहीं पर रेडियो भी वितरित किए गए हैं। जल्द ही चिकित्सा सहायता व शिक्षा को लेकर भी काम शुरु होगा। कैंप बन रहा है तो स्थानीय लोगों को रोजगार मिल गया है। जब दूसरे सरकारी विभाग यहां काम शुरू करेंगे तो उन्हें और ज्यादा रोजगार मिलेगा। बिहार के इलाकों में भी इस साल सुरक्षा बलों की जबरदस्त घेराबंदी के चलते छह कुख्यात नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है। इनमें पांच लाख रुपये का इनामी व एरिया कमांडर अर्जुन कोड़ा, जोनल कमांडर बालेश्वर कोड़ा, नागेश्वर कोड़ा और दो अन्य नक्सलियों ने सरेंडर किया था।

ऑपरेशन ‘डबल बुल व ऑक्टोपस’ ने तोड़ी नक्सलियों की कमर
साल के शुरू में लातेहार-लोहरदगा सीमा पर बुलबुल जंगल में ऑपरेशन डबल बुल को अंजाम दिया गया था। इसके बाद बूढ़ा पहाड़ पर ऑपरेशन ऑक्टोपस शुरू किया गया। सीआरपीएफ कोबरा ने लोहरदगा जिले के ‘बुलबुल’ गांव के घने जंगलों के भीतरी हिस्से में छिपे नक्सलियों को बाहर आने पर मजबूर कर दिया था। उस इलाके में टॉप नक्सली छिपे थे। उनमें कई जोनल और सब जोनल कमांडर भी शामिल थे। 18 दिन चले ‘ऑपरेशन’ में 14 एनकाउंटर हुए थे। मुठभेड़ वाले इलाके से 16 ‘आईईडी’ बरामद हुई। 196 डेटोनेटर एवं 28 घातक हथियारों से लैस 14 हार्डकोर नक्सली धरे गए। ऑपरेशन ऑक्टोपस में चीनी ग्रेनेड सहित सौ से अधिक आईईडी बरामद की गईं।
1200 जवानों को नुकसान पहुंचाने की ताक में थे नक्सली
गया और औरंगाबाद स्थित घने जंगलों में ‘कोबरा’ दस्ते ने नक्सलियों को अपना ठिकाना छोड़कर भागने के लिए मजबूर कर दिया। इस इलाके में कई दिनों से नक्सली, सुरक्षा बलों पर बड़े हमले की फिराक में थे। फरवरी में सीआरपीएफ ने यहां पर एफओबी ‘फारवर्ड ऑपरेटिंग बेस’ स्थापित किया था। नक्सली जानते थे कि कोबरा दस्ता, यहां पर बड़ा ऑपरेशन कर रहा है। जब नक्सलियों को लगा कि वे अब तीन तरफ से घिर चुके हैं तो उन्होंने गोला बारूद, 500 डेटोनेटर, एक हजार आईईडी (इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस), प्रेशर बम, केन आईईडी और एक एके-47 राइफल को मौके पर छोड़ कर, भागना ठीक समझा। नक्सलियों के पास से जितना गोला बारूद व आईईडी बरामद हुई हैं, उसके जरिए 1200 से ज्यादा जवानों को नुकसान पहुंचाया जा सकता था। 19 फरवरी के ऑपरेशन के दौरान अमेरिका निर्मित राइफल बरामद हुई। पांच लाख रुपये का इनामी नक्सली बालक गंझू उर्फ बाला गंझू मारा गया। 10 लाख रुपये के इनामी भाकपा (माओवादी) जोनल कमांडर बलराम उरांव सहित 9 नक्सलियों को गिरफ्तार कर लिया गया।

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